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Tuesday, 14 January 2014

सेना में मुसलमान सच्चर की गिनती से लश्कर तक :

डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

पिछले दिनों सोनिया गांधी की सरकार ने वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने के लिये राजेन्द्र सच्चर के जिम्मे एक विशेष काम लगाया था। वह काम था प्रत्येक स्थान पर इस बात की जांच करना की वहां कितने मुसलमान हैं, उनके साथ वहां क्या व्यावहार हो रहा है ? यदि किसी स्थान पर मुसलमान कम हैं तो इसका क्या कारण है? क्या उन्हें इस स्थान पर उचित अवसर व वातावरण न देकर उनके अधिकारों को ठेस नही पहुंचाई जा रही? ऊपर मैंने वर्ग संघर्ष शब्द का जान-बूझकर प्रयोग किया है। क्योंकि आज कल सरकार माक्र्सवादियों के दिये गये माक्र्स पर ही फल फू ल रही है और माक्र्सवादी जहां ी जाते हैं और जिस देश में  ी रहते हैं यह मान कर ही चलते हैं कि वहां दो वर्ग अवश्य ही विद्यमान हैं। दोनों में निरंतर संघर्ष ी चलता रहता है। यदि कहीं नही ी चलता तो माक्र्सवादियों की दृष्टि में वह समरसता नही है बल्कि एक वर्ग का बल पूर्वक दूसरे वर्ग को दबाय रखने का साम्राज्यवादी, पूंजीवादी और संर्कीण राष्ट्रवादी ष्ड्यन्त्र है। माक्र्सवादियों की दृष्टि में ारत वर्ष में दो स्पष्ट वर्ग हैं। एक हिन्दू और दूसरा मुस्लिम । उनकी दृष्टि में इन दोनों की राष्ट्रीयता ी अलग-अलग है। अपने देश में जब इस प्रकार के प्रश्नों पर विवाद खड़ा होता है तो ज्यादा विद्वान प्रमाण के लिये वेदों और पुराणों की ओर ागते हैं। लेकिन माक्र्सवादी ऐसे संकट काल में तर्क और प्रमाण के लिये माक्र्स, लेनिन और माओ की पोथियों को उलटते पलटते हैं । इन पोथियों में ारत वर्ष में हिन्दुओं और मुसलमानों की राष्ट्रीयता को अलग-अलग बताने वाले ढेरों प्रमाण मिल जाते हैं। इन प्रमाणों के बाद माक्र्सवादियों के लिये चिंतन और मनन का दरवाज बन्द हो जाता है। इसीलिये जब मुस्लिम लीग ने द्वि राष्ट्र के सिद्धांत की कल्पना करके मुस्लिम राष्ट्रीयता के लोगों के लिये अलग देश की मांग की तो माक्र्सवादी उनके सर्मथन में जी जान से जुट गये। अलग देश की मांग करने के कारण माक्र्सवादियों की दृष्टि में मुस्लिम लीग कार्ल माक्र्स और लेनिन के ज्यादा नजदीक हो गई। इस नजदीकी के कारण कम्युनिस्टों की नजर में मुस्लिम समाज शोषित वर्ग बन गया। महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों द्वारा ारत विाजन का विरोध करने के कारण हिन्दू वर्ग पूंजीवाद और शोषक के पाले में आ गया। ारत विाजन के लिये कूटनीति ब्रिटिश सरकार ने दी, गुण्डा बल मुस्लिम लीग ने मुहैया करवाया और उसके लिये तर्किक आधार की रचना माक्र्सवादियों ने की।
माक्र्सवादी उसी तर्किक आधार रचना पर खड़े हो कर बचे खुचे ारत में ी उसी प्रकार हिन्दू वर्ग और मुस्लिम वर्ग में संघर्ष निर्माण के कार्य में लगे हुये हैं। उनकी दृष्टि में अब ी हिन्दू शोषक है और मुसलमान शोषित, जिसे ारत में न तो समान अवसर उपलब्ध हो रहे हैं और न ही उन्हें सामान्य मानव अधिकार दिये जा रहे हैं। माक्र्सवादियों के लिये यह सारा ‘‘सैद्धांतिक फे्रम वर्क’’ है। उन्होंने अपने थीसिस में विशेष परिस्थितियों की कल्पना कर ली है और यदि यथार्थ में ऐसी परिस्थितियां नही हैं तो वे वैसी पैदा करने में जुट गयें हैं। ऐसा नही है कि यह कार्य उन्होंने अी शुरू किया है। वे अरसे से इस काम में लगे हुये हैं। इसे देश का दुर्ाग्य कहना चाहिये कि उन्हें पहली बार केन्द्रीय सरकार के आपरेट्स पर कब्जा करने का मौका मिल गया है।  इससे ी बड़ा दुर्ाग्य यह है कि जिसने 150 साल से ी पुरानी कांग्रेस पार्टी पर कब्जा कर लिया है, वह एक विदेशी महिला है। जिन माक्र्सवादियों के बल बूते पर वह सरकार चला रही हैं वे विदेशों से संचालित होते हैं। बहुत साल पहले ारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य रहे रमेश शर्मा ने लिखा था कि जब चीन की शह पर सी.पी.एम. बनी थी तो पीकिंग ने उसे जो तीन महत्वपूर्ण काम दिये थे उन में से एक ारत सरकार और उसकी सŸाा को ीŸार से कमजोर करना ी था। सोनिया गांधी और माक्र्सवादी आज इक्कठे हो गये हैं। यह एक बार फिर ारत के लिये दर्रा खैवर के पुराने इतिहास के खुल जाने का डर पैदा करता है। राजेन्द्र सच्चर इसी सरकार के कहने पर ारतीय सेना में मुसलमानों की गिनती करवा रहे थे। इसके पीछे उनके मनसूबे क्या हैं, ये तो सोनिया गांधी जानती होंगी या फिर सीताराम येचुरी । राजेन्द्र सच्चर ने तो अी अपने इस ऐतिहासिक शोध के आंकड़े ी प्रस्तुत नही किये हैं, परन्तु उसके परिणाम आने शुरू हो गये हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सहलाकार नारायणन् ने सी प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को सावधान किया है। कि ारतीय सेना में लश्करे तोयबा के लोग सफलता पूर्वक घुसपैठ कर चुके हैं। संसद में इसका खंडन करते हुये गृह मंत्री शिवराज पाटिल का चेहरा देखकर क्रोध कम आ रहा था और तरस ज्यादा। क्योंकि उधर जम्मू कश्मीर में सेना के लोग उन काली ेडों को पकड़ने में लगे हुये थे जो ारतीय सेना में रह कर ी लश्करे तोयबा के साथ हम बिस्तर थे। राजेन्द्र सच्चर को क्या इस विषय में कुछ कहना है ? यकीन मानिए चन्द हफ्तों बाद मानवाधिकारवादी इन गिरफ्तार किये गये सैनिकों के पक्ष में खड़े हो ही जायेंगे, क्योंकि ये आखिर मुसलमान हैं। मुसलमान हैं तो सीताराम येचुरी के हैवज नाॅट हैं। इनकी रक्षा करना दोनों का कर्तव्य है। सोनिया गांधी का ी और सीता राम येचुरी का ी। लेकिन प्रश्न है-ारत की रक्षा कौन करेगा?
प्रश्न मुसलमानों पर शक करने का नही है और न ही मुसलमानों की निष्ठा पर संदेह का है। मुसलमान शायद उस दृष्टि से कटघरे में ी नही खड़े हैं। सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह तो उन लोगों, दलों और गिरोहों की मंशा पर है जो जानबूझकर मुसलमानों के मनोविज्ञान को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।  उनके साथ अन्याय हो रहा है, और वह ी इसलिये हो रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं-सबसे पहले उनके मन में यह ावना री जा रही है जिस वक्त उनके अन्दर यह ावना र जाती फिर उनके तुष्टीकरण के प्रयास किये जाते हैं। पहले यह कार्य अंग्रेज सरकार करती थी अब उनकी विरासत को संाले शासक वर्ग ने शुरू कर दिया है। मुसलमानों के तुष्टीकरण कर यह प्रयास महात्मा गांधी ने ी ारत में खिलाफत आंदोलन को स्वीकार करके दिया था।  लेकिन महात्मा गांधी के बारे में कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनका तरीका गलत था किन्तु मंशा गलत नही थी। मुसलमानों के इन डोंगी रहबरों की तो मंशा ही संदेहास्पद है।            बाबा साहब अम्बेडकर ने अरसा पहले यह प्रश्न उठाया था कि ारतीय सेना में लश्करे तोयबा की ज़हनियत वाले लोग रहेंगे तो शत्रु के आक्रमण पर देश की रक्षा की स्थिति क्या होगी ? उस वक्त लश्करे तोयबा नही था, इसलिये उन्होंने इस शब्द का प्रयोग नही किया था। लेकिन इस ज़हनियत को वे अच्छी तरह पहचान गये थे । दुर्ाग्य है कि आज कुछ लोग इसे पहचान ही नही रहें हैं, कुछ पहचान कर अनजान ी बन रहें हैं और कुछ अपने निहित  स्वार्थों या फिर अपने आकाओं के स्वार्थों की खातिर इसे हवा दे रहें हैं।
(हिन्दुस्थान समाचार)  



कैकेयी की शिनाख्त की नरेन्द्र मोदी ने तो मची आपाधापी:न

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
गुजरात को लेकर पत्रकारिता जगत दुविधा में है। वह दो खेमों में बंटा हुआ है। एक खेमा वह है जिसकी धारा गुजरात की जनता के बीच में से होकर गुजरती है। इस कारण से उसके सुख-दुःख से आप्लावित होती है। यह धारा उन तमाम गुण दोषों को अपने साथ लेकर चलती हैजो गुण दोष गुजरात की जनता में पाए जाते है। साधारणीकरण किया जाए तो गुजरात की जनता से ारत की जनता ही अिप्रेत है। इस खेमे में पत्रकार और पत्रकारिता का वह समूह है जो अपनी ाषा में लिखता ी हैऔर अपनी ाषा में सोचता ी है।
पत्रकारों का दूसरा खेमा वह है जो ारतीय जनता के सुख-दुःख के बीच से होकर नहीं गुजरता। इसलिए इसकी अिव्यक्ति में सामान्य जनता का हर्ष-शोक, सुख-दुःख, उल्लास-निराशा ऐसा कुछ ी नहीं है। लेकिन वह चाहता कि ारतीय जन उसकी अवधारणाओं के अनुसार ही आचरण करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो इनकी दृष्टि में वह सबसे बड़ा अपराधी है। यह खेमा अपने बनाए हुए या किसी के सिखाए हुए या फिर लम्बे प्रशिक्षण से प्राप्त चिन्तन के स्वनिर्मित धरातल पर दृढ़ता से अवस्थित है। इस खेमे की कुछ अपनी निश्चित अवधारणाएं हैं, दिशाएं हैं और दृष्टि है। यह खेमा ारतीयता का ोक्ता नहीं हैंबल्कि दूर बैठा द्रष्टा है जो केवल देखता हैऔर वह ी तटस्थ ाव से । ारतीय जनता का आचरण और व्यवहार उसके लिए दोनों ही हेय हैं। इस जनता के लिए यह समूह आमतौर पर अनपढ़ ारतीय जनता, पिछड़ी हुई ारतीय जनता, अन्धविश्वासों से घिरी हुई ारतीय जनता, और कहीं ऐसे समूह को बहुत क्रोध आ गया। तो मूर्ख ारतीय जनता जैसे शब्दों का प्रयोग ी करता है। यदि इस खेमे के लिए किसी को प्रतीक के रूप में चुनना होतो नीरद चैधुरी से अच्छा प्रतीक और कोई नहीं मिलेगा। इनकी दृष्टि में ारत लोकतंत्र के काबिल है ही नहीं । लेकिन इनका दुर्ाग्य है कि इन बेचारों को लोकतंत्र झेलना पड़ रहा है। जिस प्रकार की माॅल, माॅडल टाउन और वाईट क्लब में बैठे फिरंगियों को फटे हाल ारतीय जनता को झेलना पड़ता था। लोकतंत्र का तो ये लोग कुछ बिगाड़ नहीं सकते लेकिन नरेन्द्र मोदी को तो घेर ही सकते हैं। क्योंकि नरेन्द्र मोदी इसी लोक की शक्ति से उपजा है। यदि किसी ढंग से नरेन्द्र मोदी को घेर लिया जाए तो कालांतर में लोक को मारना ी आसान हो जाएगा। ेजरा कल्पना कीजिए जब दिल्ली से ये पत्रकार वाशिंगटन पोस्ट या न्यूयार्क टाइम्स को ये खबर ेजेंगेतो वहां किस प्रकार खुशी का आलम छा जाएगा।
लेकिन इतनी बड़ी लड़ाई बोरी बंदर की बुढिया या फिर अंग्रेजी की पुडि़या अकेले थोड़े ही लड़ सकती है। गोरों का धर्म हैकि वे रणूमि में अपने सिपाहियों को अकेला नहीं छोड़ते। हर संकट में उनका साथ देते है। जब तक निता रहे तब तक पर्दे के पीछे से और जब संकट गहरा हो जाएतो टाट का पर्दा ी उठा देते है। न्यूयार्क टाइम्स के देश ने ऐसा ही किया है। अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी को वीजा देने से इन्कार कर दिया था। चाहे यह घटना पुरानी हो गई है परन्तु इसके पीछे के कारण पुराने नहीं हुए है। वे अी ी उतने प्रासंगिक हैं और शायद आने वाले समय में और ी अधिक प्रासंगिक हो जाएंगे। अमेरिका का कहना है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात में उस ढंग से राज्य नहीं कर रहे जिस ढंग से अमेरिका चाहता है। आखिर अमेरिका बड़ा देश है। वह बाकी देशों को इतना बताने का अधिकार तो रखता ही है कि उन्हें किस प्रकार से राज्य चलाना चाहिए। अमेरिका ारत के राज्यों में बने कानूनों का पुनरीक्षण करने का अधिकार ले रहा है। नरेन्द्र मोदी को वीजा न देने में एक कारण गुजरात विधानसा में पारित कुछ अधिनियमों को हवाला ी दिया गया थाऔर शायद गुजरात की पाठ्य पुस्तकों में शामिल कुछ अध्यायों पर आपŸिा ी की गई थी। आखिर अमेरिका को ारत के कानूनों के पुनरीक्षण का अधिकार किसने दिया? ारतीयों को लग रहा था कि ारत सरकार एक मत से अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दे देगी कि अमेरिका ारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे। लेकिन लोग स्तब्ध रह गए जब कांग्रेस, साम्यवादी और पत्रकार जगत की बोरी बंदर वाली लाॅबी हिजड़ों की तरह हाथ हिला-हिला कर प्रसन्नता जाहिर करने लगी - अब पता चलेगा नरेन्द्र मोदी को । अब उसका वास्ता पड़ा हैअमेरिका से । महमूद गजनबी की सेनाएं जब गुजरात में सोमनाथ मंदिर की ओर बढ़ रहीं थीं तो रास्ते के छोटे-छोटे राजा ी हिजड़ों की तरह ही तालियां बजा रहे थे- अब पता चलेगा सोमनाथ नरेश ीमपाल को ।
यदि अमेरिका केवल बंदर घुड़की ही दे रहा होता तो शायद लोग उसकी अवहेलना ी कर देते। लेकिन उसकी घुड़की के पीछे तो बम बरसाते जहाज हैं और बुश के हाथ का इंतजार कर रहे बटन हैं। अब बहुत लोगों को यह रहस्य समझ में आ रहा है कि बुश अिवादन करते हुए हाथ क्यों हिलाते हैं। जानकारों का कहना है कि हाथ दिखाते हैं। ईराक धोखा खा गया। अमेरिका ने उसे बताया कि राज्य किस प्रकार करना चाहिए। सद्दाम हुसैन नहीं माना । ईराक का जो हश्र अमेरिका ने किया है उससे अनेक देश हिलने लगे हैं। अलबŸाा यह निर्णय प्रत्येक देश को स्वयं ही करना है कि ऐसे संकट काल में उसे हिलना है या स्थिर खड़े रहना है। चीन स्थिर खड़ा है। लेकिन दुर्ाग्य से ारत हिलने लगा है। विश्वास नहीं होता कि इतना पुराना राष्ट्र जिसका इतना गौरवशाली इतिहास है, वह ेइस प्रकार हिलना शुरू कर देगा। ेअमेरिका ी यह जानता होगा इसलिए उसने इसका बंदोबस्त ी समय रहते ही कर लिया था। उसने पहले ही ऐसे समय की कल्पना करके ारत की बागडोर सोनिया गांधी के हाथों में थमा दी थी। अब यह ारत चंद्रगुप्त और चाणक्य का ारत नहीं है। विजय नगर साम्राज्य के संस्थापकों का ारत नहीं है। शिवाजी और महाराणा प्रताप का राज्य नहीं है। लचित बडफूकन और गुरू गोबिन्द सिंह का ारत नहीं है। सरदार पटेल और लाल बहादुर शाóी का ारत ी नहीं है। यह ारत सोनिया गांधी का ारत है। इसे सोनिया गांधी का ारत बनाया ही इसलिए गया है ताकि ठीक समय पर यह हिलना शुरू कर दे। सचमुच ारत हिल रहा है। अमेरिका की छाया में हिल रहा है। जब गुरू गोबिन्द सिंह और लाल बहादुर शाóी का ारत पाकिस्तान के आतंकवाद से रोज लहू-लुहान हो रहा हैऔर जी जान से उसका मुकाबला कर रहा ेहै तो सोनिया गांधी का इंडिया पाकिस्तान के परवेज मुशर्रफ के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का पाखंड ेकर रहा है। अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है, इंग्लैण्ड को ी पाकिस्तान की जरूरत है, चीन को ी पाकिस्तान की जरूरत है। इसलिए ये देश पाकिस्तान को गोद में लिए घूमेंगे। रही बात आतंकवाद की । अमेरिका ने मुशर्रफ को स्पष्ट बता दिया है कि इधर अमेरिका की ओर आतंकवादी क्यों ेजते हो? साहब की नींद में खलल पड़ता है। उधर पड़ोस में हिन्दुस्तान है न, उसमें खेलो। परवेज मुशर्रफ आदमी समझदार है। वह जानता है कि गोरों ने पाकिस्तान बनाया ही इसलिए था ताकि वह ारत के आंगन में खेल-खेलकर बम फोड़ता रहे। इसलिए उसने अंक्ल सैम के सामने कान पकड़े और फिर अपने पुराने ेखेल में मशगूल हो गया । अंक्ल सैम का दिल बहुत बड़ा है। एक बार गलती मान ली तो उन्होंने फिर गोदी में उठा लिया। उधर वह बेवकूफ सद्दाम हुसैन। अंक्ल सैम को ही आँखे दिखाने लगा । अब कम्बख्त जेल में सड़ रहा है।
साहब के बच्चे को सब प्यार करते हैं। पाकिस्तान गोरे साहिबों का बच्चा है । गोरी नस्ल के तौर तरीकों को सोनिया गांधी से ज्यादा कौन जान सकता है। इसलिए सोनिया गांधी का ारत और अंक्ल सैम की गोद में खेल रहे परवेज मुशर्रफ का पाकिस्तान मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ेंगे। लगता है अमेरिका की रणनीति ठीक उसी प्रकार चल रही है जैसे उसने बहुत साल पहले बनाई होगी। लेकिन बीच में नरेन्द्र मोदी आ गया। जब सोनिया गांधी का ारत अमेरिका के एक इशारे पर हिलता है तो नरेन्द्र मोदी सोमनाथ के आगे अटल खड़ा रहता है । अपने लोकसा वाले सोमनाथ दा नहीं बल्कि गुजरात ही नहीं, सारे ारत खंड के श्रद्धा केन्द्र सोमनाथ । वही ोले शिव बाबा । नरेन्द्र मोदी हिलता नहीं है । यह अमेरिका की समस्या ी है, इटली की सोनिया गांधी की समस्या ी हैऔर बोरी बंदर की बुढिया की समस्या ी है । नरेन्द्र मोदी आतंकवाद से सचमुच लड़ रहा है और सोनिया गांधी की योजना आतंकवाद से पाकिस्तान से मिलकर लड़ने की है। नरेन्द्र मोदी ने चोर को पहचान लिया हैऔर वह री दोपहरी में चिल्लाता हुआ सड़कों पर उतर आया है। चोर की शिनाख्त हो जाने के बाद सोनिया गांधी की सरकार उस चोर को छिपाना ी चाहती है और बचाना ी। मुम्बई के बम धमाकों में पुलिस को पाकिस्तान के शामिल होने के प्रमाण मिल रहे हैं। लेकिन अपने प्रधानमंत्री पाकिस्तान के साथ मिलकर संयुक्त रूप से आतंकवादी गतिविधियों की जांच के समझौते कर रहे है। हो सकता हैकल सोनिया गांधी की सरकार आई.एस.आई. को ही मुम्बई के बम धमाकों की जांच के लिए बुला ले। आखिर अमेरिका ने आदेश जो दिया हैकि तुम ारत और पाकिस्तान मिलजुलकर आतंकवादियों की जांच पड़ताल करो। नरेन्द्र मोदी की यही समस्या है। वे आतंकवादियों को पकड़ने के लिए आई.एस.आई. की सहायता लेने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए इस लड़ाई में जैसा कि हमने पहले ऊपर जिक्र किया है पत्रकारों के ी दो खेमे बन गए हैं। एक ऐसा खेमा जो पहले ही न्यूयार्क या मास्को की गर्मी सर्दी से नजले जुकाम का शिकार होता थाऔर दूसरा खेमा जो ारत की मिट्टी से ही मटमैला रहता है। मटमैले लोग नरेन्द्र मोदी के साथ हैं और गोरे लोग अमेरीका और सोनिया गांधी के साथ हैं । याद रखें अमेरिका पाकिस्तान के साथ है। गोरी नसलों ने ारत का जो हश्र किया है अी उसको बीते बहुत ज्यादा अरसा नहीं हुआ है। नरेन्द्र मोदी इस नई लड़ाई में व्यक्ति नहीं प्रतीक बनकर उरे हैं। दशरथ के वनगमन का प्रसंग पुनः उर रहा है। लोग कैकेयी की ेतलाश कर रहे हैं। लो इधर हल्ला मचा कि कैकेयी की शिनाख्त हो गई है। डर के मारे दलालों की एक पूरी फौज नरेन्द्र मोदी को घेरने में जुट गई है क्योंकि पक्की खबर है कि यह शिनाख्त नरेन्द्र मोदी ने ही की है। ारत की जनता पकड़ो-पकड़ो का शोर मचा रही है। चारों ओर आपाधापी मची हुई है।

(हिन्दुस्थान समाचार)

मुसलमानों का इस देश पर अधिकार

: डा कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
यूपीए सरकार का और कोई ला हुआ या न हुआ हो, एक ला अवश्य हुआ है कि धीरे-धीरे सी चेहरों से मुखोटे उतरने लगे हैं। ारतीय संसद पर आक्रमण की योजना बनाने वाले अफजल गुरु को बचाने के लिए काँग्रेस के एक-एक करके कई चेहरे बेनकाब हो गए। यह काँग्रेस का एजेंडा नम्बर वन था। जिसे उसने सफलता पूर्वक प्राप्त किया। यूपीए सरकार यदि चाहे तो सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के बड़े चित्रों के साथ इसका विज्ञापन देश र के समाचार पत्रों में दे सकती है। इसका नाम यूपीए शायनिंग रखा जा सकता है।
काँग्रेस की दूसरी उपलब्धि पहले से ी ज्यादा महत्वपूर्ण है। पिछले दिनों देश के सी मुख्यमंत्रियों को काँग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री ने साफ-साफ बता दियाकि इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का बनता है। बाकी ारतवासियों का जहाँ तक प्रश्न है। उनका हक इस देश पर मुसलमानों के बाद आता है। ारत के लोग काँग्रेसी प्रधानमंत्री की इस घोषणा से आह्त थे, तो प्रधानमंत्री ने दूसरा चैका मारा। उन्होंने कहा कि सारा यूपीए उनकी इस घोषणा के पीछे चट्टान की तरह खड़ा है। मनमोहन सिंह को शायद इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं है। क्योंकि वे अर्थशाó के विद्यार्थी हैं इतिहास के नहीं । अतः यदि वे चाहे तो निःसंकोच अपने इस ज्ञान को संशोधित कर सकते हैं। वे पूरे विश्वास के साथ इसमें यह ी जोड़ सकते है कि यूपीए के अतिरिक्त पूरा पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब समेत सी मुसलमान देश इस मसले पर उनके साथ चट्टान की तरह खड़े है। यदि ारत के लोग प्रधानमंत्री की मुसलमानों के हक के थीसिस को स्वीकार नहीं करते हैंतो इन देशों के लोग काँग्रेस की सहायता के लिए जिहाद करने के लिए तैयार है।
यह ारत के लोगों का सौाग्य है कि उन्होंने ारत ूमि पर की अपना हक नहीं जताया। उन्होंने सदा इस ूमि को माँ माना हैऔर इसे ारत माता कहा है। पुत्र की माता पर हक नहीं जताते। वे उसकी सेवा में ही सुख मानते हैं। अलबŸाा इस देश का यह दुर्ाग्य जरूर रहा है कि पश्चिमी एशिया में इस्लाम के उदय के बाद मुसलमानों ने इस देश के संसाधनों पर अपना हक जमाना शुरू कर दियाथा । शायद यही हक जमाने के लिए मध्य एशिया से बाबर ने हिन्दुस्तान पर हमला किया था और उसने ारत पर अपना हक जता ी दिया था और जमा ी लिया था। उसके बाद औरंगजेब, शाहजहाँ और न जाने कितने ऐसे आक्रांता इस देश पर सफलतापूर्वक अपना हक जताते रहे। जिन लोगों ने उनके इस हक का विरोध किया उनका जो हश्र हुआ वह इतिहास जानता है। पृथ्वीराज चैहान इस हक का विरोध करते हुए मारे गए। गुरु तेग बहादुर दिल्ली के चाँदनी चैक में शहीद करवा दिए गए। बंदा बहादुर का अंग-अंग काट लिया गया। उनके बेटे की हत्या उन्हीं की आँखों के सामने की गई। लेकिन इस ारत पर और इसके संसाधनों पर हक जमाने की लड़ाई जो ईसवीं सम्वत् 636 से मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से शुरू हुई थी वह एक प्रकार से आज तक चल रही है। 1947 में मुस्लिम समुदाय ने ारत के एक ू-ाग पर सफलतापूर्वक अपना हक जमा लिया और उसे देश की मुख्य धारा से काटकर इस्लामी परम्परा के अनुसार पाक घोषित कर दिया। जाहिर है कि ारत का जितना हिस्सा बचा उस पर और उसके संसाधनों पर हक जमाने के लिए उन्होंने अपना जिहाद और तेज कर दिया।
पंडित जवाहर लाल नेहरू के काल से ही काँग्रेस इस देश को माता के सदृश्य न मानकर इसे केवल धरती का एक टुकड़ा मानती रही। शायद इसीलिए जब चीन ने मातृ ूमि के एक अंग पर अपना हक जमा लिया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उस हक का विरोध करने के बजाय ारत माँ के उस ू-ाग को बंजर बताकर पल्ला झाड़ लियाऔर अब काँग्रेस के ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीधे-सीधे यह घोषणा करके कि मुसलमानों का इस देश के साधनों का पहला हक है, स्पष्ट कर दियाकि काँग्रेस इस देश के बारे में क्या सोचती है और ारत माता के प्रति उसका दृष्टिकोण क्या है? मनमोहन सिंह ये मानते है कि मुसलामानों का ारत पर पहला हक हैऔर उन्होंने अपनी इस मान्यता का उद्घोष बिना किसी लाग लपेट के साफ-साफ किया है। क्या यह केवल वोटों की खातिर मुसलमानों को प्रसन्न करने की चाल है? या फिर काँग्रेस के मनोविज्ञान का सही-सही दर्शन है। मनमोहन सिंह पर यह आरोप तो कोई नहीं लगा सकता कि वे अपने देश के खिलाफ कोई षड्यंत्र कर रहे हैंऔर न ही उन पर कोई यह आरोप लगा सकता हैकि वे किसी अंतर्राष्ट्रीय रणनीति के तहत ऐसा बेहूदा बयान दे रहे हैं। मनमोहन सिंह सेक्युलरिस्टों की उस जमात का प्रतिनिधित्व करते है जो ारत के साथ माता शब्द लगाने को साम्प्रदायिकता मानती है। ारत माता, वन्दे मातरम्, पावन नदियाँ, क्ति के प्रतीक क्ति साहित्य इस जमात की दृष्टि में साम्प्रदायिकता का सबूत है। इस जमात को लगता है कि जब तक इस देश के लोग ारत के साथ पुत्रवत् ाव से जुड़े रहेंगे तब तक यह देश दकियानुसियों का अखाड़ा बना रहेगा। इनकी दृष्टि में ारत ोग्या ूमि है। तो जाहिर है उस पर हक जताना पड़ेगा। उपासना की ूमि  होगी तो उस पर हक नहीं जताया जाएगा बल्कि उसके आगे नतमस्तक हुआ जाएगा। यही कारण हैकि ारत ूमि के पुत्र माँ की वंदना करते हैं । वंदे मातरम् का गान करते हैं। इस ूमि के जो संसाधन है, वे संसाधन ारत माता अपने पुत्रों के लालन पालन के लिए प्रयोग करती है। वेद में कहा गया हैपृथ्वी मेरी माँ मैं इसका पुत्र हूँ। ारत में तो केवल रतखण्ड को ही नहीं बल्कि संपूर्ण पृथ्वी को माता के समक्ष माना गया है जैसे माता अपने पुत्रों का लालन-पालन करती है वैसे ही पृथ्वी अपने संसाधनों से अपने पुत्रों का लालन-पालन करती है। मनमोहन सिंह किसान नहीं है इसलिए शायद उन्होंने की खेती ी नहीं की होगी परंतु इतना तो उन्हें ी पता होगा कि इस देश ेके करोड़ों-करोड़ों किसान धरती पर हल चलाने से पहले पुत्रवत् क्षमा माँगते हैं। धरती माता के संसाधनों का वे उतना ही प्रयोग करते हैं, जितने से उनका लालन-पालन हो सके। साधनों का दोहन किसान की दृष्टि में माता के प्रति अत्याचार ही माना जाता है। परंतु जब किसी देश पर दूसरे देश के लोग आक्रमण कर देते हैं तो वे विजित देश के प्रति माता का ाव नहीं रख सकते बल्कि उस पर हक जताते हैं। सैक्युलरिस्टों की जमात अपने आप को सेक्युलर बताने के लिए हक जमाने वाले गिरोह के साथ जुड़ गई है। उनके सामने मुख्य प्रश्न यह है कि इस देश पर जिसका नाम ारत है, पहला हक किसका बनता है? मनमोहन सिंह की दृष्टि में या फिर जिस पार्टी का वह प्रतिनिधित्व करते हैं उस काँग्रेस की दृष्टि में या फिर जिन कम्युनिस्टों की बैसाखियों पर वे खड़े हैं, उनकी दृष्टि में मुसलमानों का हक इस देश पर पहले बनता है। जैसा कि हमने ऊपर कहा है हक जताने की यह लड़ाई लंबे काल से चली हुई है। एक वक्त था जब ारत पर दुनिया की गोरी नस्लों ने ी हक जताया था। लेकिन एक लंबे संघर्ष के बाद उनको अपना हक छोड़ना पड़ा। परंतु दुर्ाग्य से हक जताने के नए तरीके शुरू हो गए हैं। ारत के लोग डा. मनमोहन सिंह से केवल एक ही प्रश्न पूछना चाहते हैं कि इटली का  हक इस देश पर मुसलमानों से पहले बनता है या उनके बाद। ताकि कम से कम उन्हें इतना तो मालूम हो सके कि इक्कीसवीं शताब्दी के इस महाारत में कौन किसके साथ खड़ा है? जहाँ तक वामपंथी मोर्चे का प्रश्न है उन्होंने ी अपनी प्राथमिकता प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जाहिर कर ही दी है कि ारत माता के एक अंग पर चीन का हक बनता है। उनका केवल यही कहना है कि चीन को यह हक शांतिपूर्वक बातचीत से ही दे देना चाहिए। वैसे चीन तो यह हक बल पूर्वक लेने को ी तैयार है। जिसकी शुरूआत उसने 1962 में ही कर दी थी। साम्यवादी तो 1962 से ही चीन के इस हक को मान्यता दे रहे हैं । शुक्र है मनमोहन सिंह ने अपने इस थीसिस की घोषणा 2006 में की है, यदि 1947 में कर देते तो सारा ारत ही पाकिस्तान बन जाता। मनमोहन सिंह ने अपने पाले की घोषणा कर दी है। धीरे-धीरे बाकियों के नकाब ी उठने शुरू हो जाएंगे।
(हिन्दुस्थान समाचार)


सोहराबुद्दीन से हसीना पारकर तक-मुठेड़ की प्रक्रिया का प्रश्न


-डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

दाऊद अब्राहम की बहन हसीना पारकर की मुंबई पुलिस को तलाश है। कहा जाता है कि दाऊद अब्राहम के सारे कारोबार का मुंबई से संचालन हसीना ही करती है। दाऊद अब्राहम और हसीना पारकर कोई च्यूंटी ुनगा नहीं है कि किसी को दिखाई न दे। न ही उनका कारोबार इस प्रकार का कारोबार हैजो पुलिस की पकड़ में नहीं आ रहा है। ाई-बहन का काम और तरीका पुलिस ी जानती है, मुख्यमंत्री ी जानते हैं और सीताराम येचुरी ी जानते होंगे। ये तीनों तो दाऊद अब्राहम और हसीना पारकर को अनदेखा ी कर सकते हैं, लेकिन मुंबई की जनता उन्हें अनदेखा नहीं कर सकती । क्योंकि मुंबई निवासियों को और दाऊद अब्राहम-हसीना पारकर को एक साथ ही मुंबई में रहना है। बुद्धिजीवी किस्म के लोग प्रश्न पूछ सकते हैं और पूछ ी रहे है कि दाऊद अब्राहम तो लंबे अरसे से मुंबई से बाहर पाकिस्तान में रहते हैं। लेकिन मुंबई की जनता का काम बुद्धिजीवियों के सवालों से नहीं चलता। वे जानते हैं कि दाऊद अब्राहम पाकिस्तान में होते हुई ी मुंबई में है और हसीना पारकर मुंबई में होते हुए ी पाकिस्तान में है। मुंबई बम धमाकों को लगग पन्द्रह साल बीत गए। मुकदमे का फैसला अब आना शुरू हुआ है। हजारों गवाहियाँ हुईं। ट्रक रकर दस्तावेज पेश किए गए । वकीलों ने अपने मुवक्किलों को बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। लेकिन यह सारी प्रक्रिया चलते रहने के साथ-साथ ाई-बहन ने मुंबई का अपना धंधा बंद नहीं किया। उनका आतंक उसी प्रकार बरकरार रहा। हफ्ता वसूली, सुपारी का लेनदेन उसी प्रकार चलता रहा। पुलिस खुद स्वीकार करती हैकि दाऊद अब्राहम की ओर से मुंबई में ये सारे धंधे हसीना पारकर करती है। लेकिन कांग्रेस सरकार का आतंकवाद से लड़ने का अपना एक तरीका है। वह बीच में की कार एक आध आतंकवादी को पकड़ कर कचहरी में ले जाती हैऔर वहां से जमानत पर आने के बाद दादा किस्म के ये लोग अपना धंधा उसी प्रकार चालू कर देते हैं। आतंकवादियों और सरकार के बीच परस्पर सहयोग का यह मूल मंत्र है। यह तब तक चलता रहता है जब तक दोनों पक्ष अपने कौल करार को पक्की तरह निाते हैं। लेकिन जब एक पक्ष अपने कौल को नहीं निाता तो मामला जग जाहिर हो जाता है।
हसीना पारकर को लेकर यही हुआ है। वह इतने लंबे अरसे से सरेआम अपना धंधा चला रही थी। जब पुलिस को उसकी जरूरत पड़ी तो वह गायब हो गई है। महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार के गृह मंत्री का कहना हैकि हसीना पारकर कहाँ है, उनको नहीं मालूम । यह आतंकवाद से लड़ने का एक तरीका है। इस तरीके से मुंबई में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन इसे खुदा का फजल ही कहना चाहिएकि आतंकवादी कोई नहीं मारा गया। आतंकवादियों के न मारे जाने के पीछे कांग्रेसी सरकार का अपना तर्क है। यह तर्क सीताराम येचुरी और वृंदा करात के तर्क का ही हिस्सा है। इस तर्क के अनुसार आतंकवादियों के ी मानवाधिकार हैं, उनकी रक्षा होना लाजिमी है और सरकार इस सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धित है । इसके साथ ही किसी को पकड़ने या मारने की एक पूरी कानूनी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले आतंकवादी गोलियां और बम चलाता हैऔर उसके कारण कुछ लोगों का मरना जरूरी है और इस पूरे कांड को देखने के लिए कुछ गवाहों का होना ी जरूरी है, जो यह कहे कि उसने आतंकवादी ाई को गोलियां चलाते और लोगों को मारते हुए खुद अपनी आँखों से देखा है। सरकार का यह कहना हैकि इस प्रक्रिया के बाद ही किसी आतंकवादी को पकड़ा जा सकता हैऔर पकड़ने के बाद अदालत को सौंप दिया जाएगाऔर अदालत उसको सजा देगी। सजा देने के लिए अदालत के पास इससे ी लंबी एक प्रक्रिया हैऔर इन सब का नतीजा यह होता है कि हसीना पारकर और दाऊद अब्राहम दोनों ही खुले घूमते हैं। मरना केवल आम नागरिक के ाग्य में लिखा है।
दूसरा किस्सा एक अन्य आतंकवादी सोहराबुद्दीन का है। सोहराबुद्दीन पर अनेक राज्यों में अनेक प्रकार के मुकùें चल रहे हैं । यह मुकùे कोई आज के नहीं है। वर्षों से ये मुकùे अपने स्वाव के अनुसार सरक रहे हैं। मुकदमों की गति धीमी है लेकिन सोहराबुद्दीन के कामकाज की गति तेज है। उसका जाल अनेक राज्यों में फैलता जा रहा है। वह हसीना पारकर की ही तरह लोगों से हफ्ता वसूली करता है और अवज्ञा करने वालों को अपने तरीके से दंडित ी करता है। सोहराबुद्दीन जेल में नहीं रहता। वह स्वतंत्र घूमता हैऔर अपना काम ी स्वतंत्रतापूर्वक ही करता है। ऐसा ी कहते हैं कि वह जरूरतमंदों को हथियारों की सप्लाई ी करता था। इस देश में हथियारों की जरूरत किसे है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। गुजरात पुलिस ने सोहराबुद्दीन को एक मुठेड़ में मार दिया है। आजकल उसी की जांच चल रही है। जांच करने वालों का कहना है कि मुठेड़ की ी अपनी एक प्रक्रिया है और उस प्रक्रिया के अनुसार ही मुठेड़ हो सकती है। उससे एक इंच ी दाएं-बाएं हो जाने से पूरी की पूरी मुठेड़ ही ेगैरकानूनी हो जाती है। अंग्रेजी में कानूनदानों ने इसके लिए एक नया शब्द दिया है एक्स्ट्रा जयुडिशियल किलिंग । उनका कहना है कि सोहराबुद्दीन को जिस मुठेड़ में मार गिराया गया है, वह मुठेड़ गैर कानूनी शक्ल ले चुकी है। इसे इस देश का दुर्ाग्य कहना चाहिए कि आतंकवादियों से लड़ रही पुलिस और सेना लड़ना तो बखूबी जानती है, लेकिन मुठेड़ की प्रक्रिया को नहीं जानती। वैसे ी आतंकवादी के हाथ में बंदूक और बम होता है। आईपीसी और सीआरपीसी की प्रतियाँ नहीं । इसलिए पुलिस और सेना के लिए गोली और बम की प्रक्रिया को जानना ज्यादा जरूरी होता है और पुलिस के इसी ज्ञान से सोहराबुद्दीन जैसे आतंकवादी मारे जाते हैं। सोहराबुद्दीन और इशरतजहां जैसी आतंकवादी मारे जाते हैं। लेकिन आखिर कानून तो कानून हैऔर यह इसी कानून की करामात है कि सोहराबुद्दीन को मारने वाली पुलिस जेल में है और हसीना पारकर जेल से बाहर हैऔर निकट विष्य में उसके जेल में जाने की कोई संावना नहीं है। दाऊद अब्राहम तो शाही मेहमान है। शाही मेहमानों के लिए दस्तरखान बिछाएं जाते हैं। तिहाड़ जेल तो सेना और पुलिस के उन अधिकारियों के लिए है जो आतंकवादियों से लड़ रहे हैं । वैसे ी अपने मनमोहन सिंह कश्मीर के अलागवादियों को दिल्ली में बुलाकर उनकी खातिर तब्बजों ी करते हैं और उनसे सियासी गुफ्तगू ी । शायद इसी गुफ्तगू का नतीजा है कि संसद पर आक्रमण करने वाला अफजल गुरु सारी व्यवस्था पर ठहाके लगा रहा है। इस देश की जनता को यह तय करना है कि राष्ट्र हित में सोहराबुद्दीन का  मरना जरूरी है या हसीना पारकर का ाग जाना ? पूरी न्यायिक प्रक्रिया को अपनाते हुए मौलाना मसूद अजहर को जेल में डालना और वहां से उसे सम्मान पूर्वक कंधार में ले जाकर छोड़ देना राष्ट्र हित में है या फिर इश्रतजहां को मार देना राष्ट्र हित में है । अफजल गुरु को जेल में रखना और इस बात का इंतजार करना कि कल कब किसी का अपहरण हो जाए और अफजल गुरु को ससम्मान छोड़ने के लिए हमारे विदेश मंत्री को पाकिस्तान जाना पड़े राष्ट्र हित में है या फिर मोहम्मद इकबाल को कुपवाड़ा में पुलिस द्वारा ढेर कर दिया जानाराष्ट्रहित में है? पंजाब के पूर्व डी.जी.पी. कंवर पाल सिंह गिल ने ठीक ही कहा है कि आतंकवाद के माध्यम से पाकिस्तान ारत से छù युद्ध कर रहा हैऔर युद्ध के दौरान आईपीसी कारगर नहीं होती । युद्ध में गोली का जवाब गोली से दिया जाता है। यह बात वे ी जानते है जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों का प्रश्न उठाते हुए नहीं थकते। लेकिन वे यह ी बखूबी जानते हैं कि इस युद्ध में वे किसके साथ है? परंतु देश की जनता इतनी मूर्ख नहीं है वह इस खेमे बंदी में प्रत्येक पक्ष को अच्छी तरह पहचान न सके । सोहराबुद्दीन तो एक मोहरा है। इस पूरी लड़ाई में निशाना कहीं और साधा जा रहा है। गुजरात सिंध का पड़ोसी राज्य हैऔर इतिहास गवाह है कि सिंध के राजा दाहिर को मुहम्मद बिन कासिम ने प्रासाद पर फहरा रहे प्रतीक को नष्ट करके पराजित कर दिया था। इस बार ी इस नई लड़ाई में प्रतीक को ही गिराए जाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन ारतीयों को हर हालत में उस प्रतीक को बचाना है क्योंकि पूरी लड़ाई ही प्रतीकों के माध्यम से लड़ी जा रही है।

(हिन्दुस्थान समाचार)

लाल मस्जिद का नाटक और यर्थाथ का भ्रम

: डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 20 जुलाई

स्थान: नई दिल्ली

अंततः लाल मस्जिद पर पाकिस्तान की सरकार को हमला करना पड़ा। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि लाल मस्जिद का मदरसा हजारों की संख्या में ऐसे तालिबान पैदा कर रहा है जो देश में आतंकवाद फैला रहे हैं और सŸाा को चुनौती दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह मस्जिद या इसका मदरसा रातों-रात उग आया था। मस्जिद का निर्माण हुए कई साल हो गए हैं। मदरसे में पढ़ाई-लिखाई होते हुए ी काफी अरसा बीत गया है और इस मस्जिद और मदरसे में जो कुछ हो रहा था वह कोई छिपा हुआ रहस्य ी नहीं था। इस बार केवल इतना ही हुआकि मस्जिद और मदरसा दोनों हाथ में एके-47 लेकर उस जगह पर पहुँच गए जहां मदरसे को जन्म देने वाला बैठा था। या तो मदरसे को अपनी सीमा का ध्यान नहीं  रहा या फिर बनाने वाले को ऐसी आशा नहीं होगी कि मदरसे के तुलवा एक दिन उसकी गर्दन ी पकड़ लेंगे।

इधर ारतवर्ष में कुछ लोग लाल मस्जिद पर आक्रमण करने के कारण जनरल मुशर्रफ की शान में कसीदें पढ़ रहे हैं। दिल्ली में बहुत से ऐसे लोग मिल जाएंगे जो मैंने आपको कहा थाकी शैली में बताते हुए नहीं थकते कि आतंकवाद से लड़ने की मुशर्रफ की नियत पर शक नहीं किया जाना चाहिए। वैसे ारत सरकार तो शायद शक कर ी नहीं रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि ारत और पाकिस्तान दोनों मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ेंगे। लाल मस्जिद पर आक्रमण से वे अपने समझे हुए साथियों को एक बार फिर समझा सकते हैं कि उनकी आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त अियान की पेशकश सही सिद्ध हुई है। अपने देश में जो लोग लाल मस्जिद पर आक्रमण के बावजूद मुशर्रफ की आतंकवाद से लड़ने की नियत पर संदेह करते हैं, उनके लिए अमेरिका द्वारा जनरल मुशर्रफ को दी गई शाबाशी प्रमाण के तौर पर पेश की जा रही है। आखिर ारत सरकार यह घोषणा तो खुले आम कर ही रही है 9/11 की घटना के बाद आतंकवाद से लड़ने का एक मुश्त ठेका अमेरिका को दे दिया गया है और अमेरिका ने ी इसे बखूबी संाल लिया है। अब जब अमेरिका ही मुशर्रफ की लाल मस्जिद पर आक्रमण करने के कारण तारीफ कर रहा है तो फिर कोई दूसरा उस पर किंतु परंतु कैसे कर सकता है?

अमेरिका और ारत में दोनों जगह लाल मस्जिद पर आक्रमण को आतंकवाद के खिलाफ शांति प्रेमियों की जीत बताया जा रहा है। लेकिन लाल मस्जिद पर आक्रमण क्या सचमुच पाकिस्तान की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की शुरूआत है? यह बहुत बड़ा प्रश्न है। लेकिन इस प्रश्न के वििन्न उŸार राजनीति की चाशनी में डूबो कर दिए जा रहे हैं । यह ी कहना होगा कि इस प्रश्न के राजनैतिक उŸार दिए जा रहे हैं । तथ्यरक उŸार न तो कोई देना चाहता है और न कोई सुनना चाहता है। आतंकवाद के प्रश्न पर ारत सरकार और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों द्वारा दिए गए उŸार पाखंड से ज्यादा कुछ नहीं हैं। जब आतंकवाद और मुसलमानों का प्रश्न आता है तो प्रत्येक राजनैतिक दल को मुसलमानों के वोट दिखाई देने लगते हैं और इसलिए वे या तो मुस्लिम आतंकवाद के प्रश्न से बचकर निकल जाते हैं या फिर यदि खुदा-न-खास्ता लाल मस्जिद जैसी घटना हो जाए तो छत पर चढ़कर बांग देने लगते हैं कि मुसलमानों को तो खाहमखाह बदनाम किया जा रहा है। देखिए पाकिस्तान में धर्मनिरपेक्ष मुसलमान किस प्रकार आतंकवादियों से लड़ रहे हैं । कबीर ने मस्जिद पर चढ़कर बांग दे रहे मुल्ला को फटकारा था परंतु दुर्ाग्य से ारत के प्रत्येक राजनैतिक दल आज मुसलमानों के लिए मुल्ला बने हुए हैंऔर बड़ी-बड़ी मस्जिदों के आगे सिजदा कर रहे लाखों मुसलमानों की ीड़ के सिवाए उन्हें कुछ ी दिखाई नहीं देता । वे मानकर चल रहे हैं कि मुसलमानों के असली मुल्ला वही हैं और जब ये मुसलमान सिज़दे से उठेंगे तो सीधे उनके बक्से में वोट डाल आएंगे। वििन्न राजनैतिक दलों में इस बात की होड़ लगी हुई है कि देश के मुसलमानों का असली मुल्ला कौन है? मुल्ला बनने का स्वांग कर रहे ये राजनैतिक दल देश की बाकी जनता को अपनी झोली में मान कर चलते हैं ऐसी मनःस्थिति में लाल मस्जिद की घटना ने इन मुल्लाओं की गले की आवाज और तीखी कर दी है।

रहा प्रश्न अमेरिका का। उसकी व्याख्या थोड़ी और गहराई में जाकर करनी होगी। 1947 में जिस साम्राज्यवादी चेतना से इंग्लैण्ड ग्रस्त था 2007 में उस चेतना की विरासत अमेरिका ने संाल ली है। मूलतः दोनों में कोई अंतर ी नहीं है। क्योंकि इंग्लैण्ड के ही ज्यादातर लोग अमेरिका में जाकर बस गए हैं। इंग्लैण्ड और अमेरिका की नाि नाल रक्त संबंधों की है। 1947 में जिस उद्देश्य के लिए इंग्लैण्ड ने पाकिस्तान का निर्माण किया था उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अमेरिका अी तक पाकिस्तान को पाल पोस रहा है।

दरअसल पूरे का पूरा पाकिस्तान ही एक बहुत बड़ी मस्जिद है। यह मस्जिद इंग्लैण्ड ने ारत की छाती पर निर्मित की थी। इस मस्जिद को बनाने के लिए इंग्लैण्ड को बहुत मशक्कत करनी पड़ी थी। इंग्लैण्ड के लिए इस मस्जिद की जरूरत 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद बहुत ज्यादा बढ़ गई थी क्योंकि इस स्वतंत्रता संग्राम में सी ारतीयों ने एकजुट होकर ारत में गोरी जातियों के शासन को चुनौती दी थी। पाकिस्तान रूपी इस मस्जिद का निर्माण करने के लिए गोरी सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और उस विश्वविद्यालय ने अंग्रेजी आकाओं की आकांक्षाओं के अनुरूप ही इस पाकिस्तान रूपी मस्जिद के निर्माण की पृष्ठूमि तैयार कर दी थी। जब वह जमीन तैयार हो गई तो ारत को स्थाई रूप से पंगु बनाने के लिए और अपने हितों की रक्षा के लिए गोरी जातियों ने अनंत काल से चले आ रहे ारत के प्राकृतिक ूगोल को खंडित करते हुए उसकी छाती पर पाकिस्तान रूपी जामा मस्जिद का निर्माण किया था। पाकिस्तान रूपी इस जामा मस्जिद का शाही इमाम अमेरिका है और वह पाकिस्तान के लिए जिस प्रकार का ी फतवा जारी करता है उसी प्रकार का आचरण पाकिस्तान रूपी इस मस्जिद में शुरू हो जाता है।

अखबारों में छपा हैकि जनरल मुशर्रफ ने लाल मस्जिद पर हमला करने का निर्णय अमेरिका का आदेश मिलने के बाद किया। यहां जनरल मुर्शरफ किसी व्यक्ति का नाम नहीं है बल्कि वह एक प्रकार से पाकिस्तान के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है। गोरी शक्तियों ने 1947 में जब ारत को तोड़कर पाकिस्तान का निर्माण किया था तो जाहिर है उनके मन में पाकिस्तान का प्रयोग करने की बहुआयामी योजनाएं रही होंगी। उन्हें ऐसा पाकिस्तान चाहिए जो निरंतर हिन्दुस्तान के लिए सरदर्दी पैदा करता रहे और पाकिस्तान यह कार्य 1947 से लेकर अब तक बखूबी कर रहा है। उसे ऐसा पाकिस्तान चाहिए। जो अफगानिस्तान में रूसी सेनाओं से लड़ सके। पाकिस्तान उसके लिए तैयार है । परंतु प्रश्न यह है कि जो अफगानिस्तान में जाकर रूसी सेना से लड़ेंगे उनमें मोटिवेशन कहां से आएगा? इसके लिए अमेरिका को पाकिस्तान में लाल मस्जिद की ी जरूरत थी और मदरसों की ी ताकि इन मदरसों से निकले हुए तालिबान इस्लाम खतरे में हैकी चीखोपुकार करते हुए जान हथेली पर लेकर रूसी सेना पर कूद जाएं। अमेरिका अच्छी तरह जानता है पाकिस्तान के नौजवान अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए तो जान हथेली पर नहीं रख सकते परंतु वे इस्लाम को खतरे में जानकर रूसी टैंकों से ी टकरा सकते हैं। इसलिए इन तालिबान को पैदा करने के लिए अमेरिका को ी लाल मस्जिद और मदरसा चाहिए। पाकिस्तान, अमेरिका की इस मांग की आपूर्ति का केन्द्र है। लेकिन अब रूस टूट गया, उसकी सेनाएं अफगानिस्तान से वापिस चली गईं। इसलिए तालिबान की जरूरत ी समाप्त हो गई। वैसे ी व्यापार जगत में परंपरा है कि फालतू स्टाॅक नष्ट कर दिया जाता है या फिर उसको जला दिया जाता है। कुछ व्यापारी उसको सेल पर ी लगा देते हैं। शायद अमेरिका के सुझाव पर ही पाकिस्तान ने अमेरिका के लिए गैर उपयोगी हो चुके तालिबान को सेल पर लगाकर ारत की ओर ेजना शुरू कर दिया। लेकिन टैक्नाॅलाजी कितनी ी तरक्की कर जाए । जिंदा जागता तालिबान आखिर रोबोट तो नहीं बन सकता। वह कुछ निर्णय अपने दिमाग से ी लेता है। उस दिमाग को अमेरिका ने जिस तरह पशिक्षित किया है उसके परिणाम स्वरूप उसकी ज़द में न्यूयार्क का विश्व व्यापार केन्द्र ी आ गया।

जाहिर है इसके बाद अमेरिका अपने इस प्रयोग को तात्कालिक कारणों से जल्दी-जल्दी समेटता । शुरू में अमेरिका और पाकिस्तान ने अप्रासंगिक हो चुके इन तालिबान का प्रयोग यत्र तत्र करना चाहा लेकिन इनका दिमाग अमेरिका के ही खिलाफ होता जा रहा था। इसलिए उसने पाकिस्तान को जब ऐसा आदेश दिया तो पाकिस्तान के पास लाल मस्जिद और मदरसे पर आक्रमण करने के सिवा और कोई चारा नहीं था। इसे इतिहास का दुर्याेग कहना चाहिए कि पाकिस्तान रूपी मस्जिद का निर्माण जिस अलीगढ़ विश्वविद्यालय ने किया था ारत सरकार उसकी केवल सार संाली नहीं करती बल्कि यह ी ध्यान रखती है कि उसका मूल इस्लामी चरित्र कहीं बदल न जाए। जिस इस्लामी चरित्र ने पाकिस्तान का निर्माण किया उस इस्लामी चरित्र के विश्वविद्याय कोे उसी मूल मानसिकता में ही बचाए रखने के लिए सरकार दिन रात एक कर रही है। क्या यह ी अमेरिका के इशारे पर ही तो नहीं हो रहा? क्योंकि अमेरिका विज्ञान का देश है, आधुनिक प्रौद्योगिकी उसकी जान है।  वह जानता है कि यदि बीज सुरक्षित रहेगा तो समय आने पर अपने देश के हितों के अनुकूल एक नई मस्जिद का ी निर्माण किया जा सकता है। पहली जामा मस्जिद पाकिस्तान को तो वह पाल पोस ही रहा है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में लाल मस्जिद और उस किए गए आक्रमण का कोई महत्व नहीं है। यह सारा कृत्य उन बच्चों जैसा है। जो पहले रेत के धरोंदे बनाते हैं फिर उन्हें तोड़ देते हैं। लाल मस्जिद रेत का एक ऐसा ही धरोंदा था जो शाही इमाम अमेरिका के इशारे पर पाकिस्तान ने बनाया था और फिर उसी के इशारे पर उसे गिरा दया है। ारत के लिए इस खेल का कोई महत्व नहीं है। अलबŸाा यदि ारत खाहमखाह अपने आप को इस खेल में खिलाड़ी मानता है तो अलग बात है पाकिस्तान और अमेरिका के इस खेल में ारत पीडि़त पक्ष है। खिलाड़ी नहीं और लाल मस्जिद पर आक्रमण से इस पीडि़त पक्ष को कोई ला नहीं होने वाला है यह ध्यान में रखना चाहिए ।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)