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Tuesday, 14 January 2014

क्या सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी कोई दिल्ली में सुनने वाला है ?;



डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
सर्वोच्च न्यायालय ने दारा सिंह को फांसी देने की केन्द्रीय सरकार की अपील को नामंजूर कर दिया है । कुछ साल पहले ओडिशा में आस्ट्रेलिया के एक मिशनरी ग्राहम स्टेन्स की जंगल में हत्या हो गई थी । वह अपनी गाडी में था कि कुछ लोगों ने उसकी आग लगा दी । बाद में पुलिस ने इस घटना के लिए जिम्मेदार बता कर कुछ लोगों को गिरफ्तार किया और उसमें दारा सिंह नामका व्यक्ति प्रमुख था । ग्राहम स्टेन्स पर यह आरोप था कि वह विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन के बल पर भोले भाले जनजातीय समाज के लोगों का मतांतरण कर रहा था । इसके लिए वे अनेक प्रकार के अमानवीय व निंदनीय तरीकों का इस्तमाल करता था । जनजातीय समाज की परंपराओं को तोडने के लिए वे मतांतरित लोगों को भडकाता था और उन लोगों की आस्थाओं व विश्वासों का मजाक उडाता था । कबीले के लोगों इसाई मजहब की फौज में शामिल करवाने के लिए वे लगभग उन सभी तरीकों को इस्तमाल करता था जिनका उल्लेख जस्टिस नियोगी की अध्यक्षता में गठित आयोग ने किया है । इन्हीं परिस्थितियों में उसकी हत्या हुई और ओडिशा हाइकोर्ट ने दारा सिंह को हत्या का आरोपी मान कर उसे उम्र कैद की सजा सुनाई । ओडिशा हाइकोर्ट के इस फैसले से भारत में मतांतरण के काम में जुटा हुआ चर्च अति क्रोध में था  और वह दारा सिंह को किसी भी हालत में जिंदा नहीं देखना चाहता था । इसलिए केन्द्रीय सरकार की जांच एजेंसी सीबीआई ने दारा सिंह को फांसी पर लटकाये जाने की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई । उस वक्त कुछ मानवाधिकारप्रेमियों ने इस बात पर आपत्ति भी जाहिर की थी । लेकिन सीबीआई अंततः दारा सिंह के लिए फांसी की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में गई । इसी बीच ग्राहम स्टेन्स की आस्ट्रेलियाई पत्नी ग्लैडिस भारत को छोड कर वापस अपने देश चली गई ।

अब उच्चतम न्यायालय ने इस बहुचर्चित केस में अपना निर्णय सुना दिया है । न्यायालय ने भारत सरकार की अपील को खारिज करते हुए दारा सिंह को फांसी देने से इंकार कर दिया है । सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि ग्राहम स्टैंस की हत्या जघन्यतम अपराधों की श्रेणी में नहीं आती । सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि लोग ग्राहस स्टैंस को सबक सिखाना चाहते थे क्योंकि वह उनके इलाके में मतांतरण के काम में जुटा हुआ था । इस विषय पर  टिप्पणी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक बहुत ही महत्नपूर्ण टिप्पणी की है जो मतांतरण के काम में लगी हुई अलग अलग मिशनरियों के लिए मार्गदर्शक हो सकती है । सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति की आस्था व विश्वासों में दखलदाजी करना और इसके लिए बल का प्रयोग करना, उत्तेजना का प्रयोग करना, लालच का प्रयोग करना या किसी को यह झुठा विश्वास दिलवाना कि एक मजहब दूसरे से अच्छा है और इन सभी तरीकों का इस्तमाल करते हुए किसी व्यक्ति का मतांतरण करना, इसको किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता । सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि इस प्रकार के मतांतरण से हमारे समाज की उस आधारभित्ति पर चोट होती है जिसकी रचना संविधान के निर्माताओं ने की थी ।

सर्वोच्च न्यायालय के इस टिप्पणी से पहले भी अनेक न्यायालयों ने यह निर्णय दिये हैं कि भारतीय संविधान में अपने मजहब का प्रचार करने का अधिकार तो दिया हुआ है लेकिन किसी को भी अनुचित साधनों के प्रयोग से मतांतरण का अधिकार नहीं है । यही कारण है कि ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश जनजातीय बहुल राज्यों ने मतांतरण को रोकने के लिए कानून बनाया हुआ है । लेकिन दुर्भाग्य से इस कानून के होते हुए भी ग्राहम स्टेंस जैसे विदेशी लोग अकेले ओडिशा में ही हजारों हजारों लोगों का मतांतरण करवा पाने में सफल हो गये और राज्य सरकार आंखें मुंद कर सोयी रही । यही परिस्थितियां रही होगी ओडिशा के लोगों ने राज्य सरकार के असफल हो जाने पर ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाने की सोची होगी । यद्यपि इस तरीके को अच्छा नहीं माना जा सकता लेकिन फिर भी एक बात का ध्यान रखना चाहिए यदि जनजातीय समाज में मिशनरियों की इस प्रकार की अमानवीय गतिविधियों को रोका न गया तो वह समाज इसे रोकने के लिए स्वयं किसी भी सीमा तक जा सकता है । लेकिन दुर्भाग्य से केन्द्रीय सरकार खतरे की इस घंटी को सुनने के बजाए दारा सिंह को ही फांसी पर लटकाने को ज्यादा सुविधाजनक मान कर चल रही है । ओडिशा में ही दो साल पहले चर्च के लोगों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या कर दी थी । ये भी जनजातीय समाज में मिशनरियों के उस मतांतरण आंदोलन का ही विरोध कर रहे थे । स्वामी जी की हत्या के विरोध में जब पूरा कंध समाज ऊफान पर आ गया तो राज्य सरकार एक बार फिर चर्च के साथ खडी दिखाई दी  और कंध समाज को प्रताडित और डराने धमकाने के कार्य में लगी रही । ग्राहम स्टैंस के हत्यारों को पकडने के लिए राज्य सरकार ने जितनी तत्परता दिखाई थी उसकी शतांश भी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्यारों को पकडने और दंड दिलवाने में नहीं दिखाई । अलबत्ता इस भीतर केन्द्रीय सरकार ने आस्ट्रेलिया से ग्राहम स्टेंस की पत्नी ग्लैडिस को वापस बुला कर पद्मश्री से सम्मानित किया था । यह जनजातीय समाज के मुंह पर एक और तमाचा था ।

अब समय आ गया है कि इस गंभीर मुद्दे पर गहरी चर्चा की जाए और भविष्य के लिए ठोस रणनीति बनायी जाए ताकि विदेशी ताकतों से संचालित मिशनरियां मतांतरण के बल पर भारत की पहचान और अस्मिता को समाप्त न कर सकें । इस रणनीति के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया यह दिशानिर्देश अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकता है । लेकिन पिछले कुछ सालों से केन्द्रीय सरकार के व्यवहार और आचरण से यह लगता है कि उसकी रुचि भारत में छल और बल से किये जा रहे मतांतरण के आंदोलन को रोकने में उतनी नहीं है जितनी उसे प्रोत्साहित करने में है । यही कारण है कि जब राजस्थान विधानसभा ने राज्य में मतांतरण को रोकने के लिए विधेयक दो दो बार बहुमत से पारित किया तो उस समय की राज्यपाल श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने ( जो अब राष्टपति पद पर विराजमान हैं)  अनेक प्रकार के अडंगे लगा कर उसे कानून नहीं बनने दिया । इसी प्रकार गुजरात विधानसभा ने जब इसी प्रकार के एक विधेयक को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए उसमें संशोधन को बहुमत से स्वीकृत किया तो राज्यपाल ने केन्द्रीय सरकार के निर्देशों के चलते उसमें अडंगे लगाये । जिन प्रदेशों में इस प्रकार का कानून बना हुआ भी हैं वहां भी शायद ही कोई पादरी होगा जिसको इस कानून का उल्लंघन करने के आरोप में सजा सुनायी गई है । सजा की बात तो दूर है किसी पर मुकद्दमा ही चलाया गया हो, यह भी संदेहात्मक है । यही कारण है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में मतांतरण रोकने संबंधी विधेयक प्रभावी होने पर भी वहां लाखों की संख्या में जनजातीय समाज को मतांतरित किया जा चुका है ।
दुर्भाग्य से भारत में जिन लोगों के हाथों में सत्ता सूत्र आ गये हैं उनकी वैटिकन के राष्ट्रपति में ज्यादा आस्था है, भारत के इतिहास, विरासत, आस्था व विश्वासों से कम । पोप का यही मानना है कि अंतिम मोक्ष तक ले जाने के लिए ईसाई मजहब ही सर्वश्रेष्ठ है बाकि सब मजहब शैतान के मजहब हैं । सत्ता के उच्च स्थानों पर बैठे हुए कुछ लोग पोप के इसी एजेंडा को भारत में लागू करना चाहते हैं । चाहे उसके लिए दारा सिंह को फांसी पर लटकाना पडे, त्रिपुरा के शांति काली जी महाराज और कंधमाल के स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को उनके ही आश्रम में गोलियों से उडाना पडे । परंतु देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इतिहास के इस मोड पर एक बहुत ही सही और सामयिक चेतावनी दी है । क्या दिल्ली में कोई सुनने वाला है ?


सेना में मुसलमान सच्चर की गिनती से लश्कर तक :

डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

पिछले दिनों सोनिया गांधी की सरकार ने वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने के लिये राजेन्द्र सच्चर के जिम्मे एक विशेष काम लगाया था। वह काम था प्रत्येक स्थान पर इस बात की जांच करना की वहां कितने मुसलमान हैं, उनके साथ वहां क्या व्यावहार हो रहा है ? यदि किसी स्थान पर मुसलमान कम हैं तो इसका क्या कारण है? क्या उन्हें इस स्थान पर उचित अवसर व वातावरण न देकर उनके अधिकारों को ठेस नही पहुंचाई जा रही? ऊपर मैंने वर्ग संघर्ष शब्द का जान-बूझकर प्रयोग किया है। क्योंकि आज कल सरकार माक्र्सवादियों के दिये गये माक्र्स पर ही फल फू ल रही है और माक्र्सवादी जहां ी जाते हैं और जिस देश में  ी रहते हैं यह मान कर ही चलते हैं कि वहां दो वर्ग अवश्य ही विद्यमान हैं। दोनों में निरंतर संघर्ष ी चलता रहता है। यदि कहीं नही ी चलता तो माक्र्सवादियों की दृष्टि में वह समरसता नही है बल्कि एक वर्ग का बल पूर्वक दूसरे वर्ग को दबाय रखने का साम्राज्यवादी, पूंजीवादी और संर्कीण राष्ट्रवादी ष्ड्यन्त्र है। माक्र्सवादियों की दृष्टि में ारत वर्ष में दो स्पष्ट वर्ग हैं। एक हिन्दू और दूसरा मुस्लिम । उनकी दृष्टि में इन दोनों की राष्ट्रीयता ी अलग-अलग है। अपने देश में जब इस प्रकार के प्रश्नों पर विवाद खड़ा होता है तो ज्यादा विद्वान प्रमाण के लिये वेदों और पुराणों की ओर ागते हैं। लेकिन माक्र्सवादी ऐसे संकट काल में तर्क और प्रमाण के लिये माक्र्स, लेनिन और माओ की पोथियों को उलटते पलटते हैं । इन पोथियों में ारत वर्ष में हिन्दुओं और मुसलमानों की राष्ट्रीयता को अलग-अलग बताने वाले ढेरों प्रमाण मिल जाते हैं। इन प्रमाणों के बाद माक्र्सवादियों के लिये चिंतन और मनन का दरवाज बन्द हो जाता है। इसीलिये जब मुस्लिम लीग ने द्वि राष्ट्र के सिद्धांत की कल्पना करके मुस्लिम राष्ट्रीयता के लोगों के लिये अलग देश की मांग की तो माक्र्सवादी उनके सर्मथन में जी जान से जुट गये। अलग देश की मांग करने के कारण माक्र्सवादियों की दृष्टि में मुस्लिम लीग कार्ल माक्र्स और लेनिन के ज्यादा नजदीक हो गई। इस नजदीकी के कारण कम्युनिस्टों की नजर में मुस्लिम समाज शोषित वर्ग बन गया। महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों द्वारा ारत विाजन का विरोध करने के कारण हिन्दू वर्ग पूंजीवाद और शोषक के पाले में आ गया। ारत विाजन के लिये कूटनीति ब्रिटिश सरकार ने दी, गुण्डा बल मुस्लिम लीग ने मुहैया करवाया और उसके लिये तर्किक आधार की रचना माक्र्सवादियों ने की।
माक्र्सवादी उसी तर्किक आधार रचना पर खड़े हो कर बचे खुचे ारत में ी उसी प्रकार हिन्दू वर्ग और मुस्लिम वर्ग में संघर्ष निर्माण के कार्य में लगे हुये हैं। उनकी दृष्टि में अब ी हिन्दू शोषक है और मुसलमान शोषित, जिसे ारत में न तो समान अवसर उपलब्ध हो रहे हैं और न ही उन्हें सामान्य मानव अधिकार दिये जा रहे हैं। माक्र्सवादियों के लिये यह सारा ‘‘सैद्धांतिक फे्रम वर्क’’ है। उन्होंने अपने थीसिस में विशेष परिस्थितियों की कल्पना कर ली है और यदि यथार्थ में ऐसी परिस्थितियां नही हैं तो वे वैसी पैदा करने में जुट गयें हैं। ऐसा नही है कि यह कार्य उन्होंने अी शुरू किया है। वे अरसे से इस काम में लगे हुये हैं। इसे देश का दुर्ाग्य कहना चाहिये कि उन्हें पहली बार केन्द्रीय सरकार के आपरेट्स पर कब्जा करने का मौका मिल गया है।  इससे ी बड़ा दुर्ाग्य यह है कि जिसने 150 साल से ी पुरानी कांग्रेस पार्टी पर कब्जा कर लिया है, वह एक विदेशी महिला है। जिन माक्र्सवादियों के बल बूते पर वह सरकार चला रही हैं वे विदेशों से संचालित होते हैं। बहुत साल पहले ारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य रहे रमेश शर्मा ने लिखा था कि जब चीन की शह पर सी.पी.एम. बनी थी तो पीकिंग ने उसे जो तीन महत्वपूर्ण काम दिये थे उन में से एक ारत सरकार और उसकी सŸाा को ीŸार से कमजोर करना ी था। सोनिया गांधी और माक्र्सवादी आज इक्कठे हो गये हैं। यह एक बार फिर ारत के लिये दर्रा खैवर के पुराने इतिहास के खुल जाने का डर पैदा करता है। राजेन्द्र सच्चर इसी सरकार के कहने पर ारतीय सेना में मुसलमानों की गिनती करवा रहे थे। इसके पीछे उनके मनसूबे क्या हैं, ये तो सोनिया गांधी जानती होंगी या फिर सीताराम येचुरी । राजेन्द्र सच्चर ने तो अी अपने इस ऐतिहासिक शोध के आंकड़े ी प्रस्तुत नही किये हैं, परन्तु उसके परिणाम आने शुरू हो गये हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सहलाकार नारायणन् ने सी प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को सावधान किया है। कि ारतीय सेना में लश्करे तोयबा के लोग सफलता पूर्वक घुसपैठ कर चुके हैं। संसद में इसका खंडन करते हुये गृह मंत्री शिवराज पाटिल का चेहरा देखकर क्रोध कम आ रहा था और तरस ज्यादा। क्योंकि उधर जम्मू कश्मीर में सेना के लोग उन काली ेडों को पकड़ने में लगे हुये थे जो ारतीय सेना में रह कर ी लश्करे तोयबा के साथ हम बिस्तर थे। राजेन्द्र सच्चर को क्या इस विषय में कुछ कहना है ? यकीन मानिए चन्द हफ्तों बाद मानवाधिकारवादी इन गिरफ्तार किये गये सैनिकों के पक्ष में खड़े हो ही जायेंगे, क्योंकि ये आखिर मुसलमान हैं। मुसलमान हैं तो सीताराम येचुरी के हैवज नाॅट हैं। इनकी रक्षा करना दोनों का कर्तव्य है। सोनिया गांधी का ी और सीता राम येचुरी का ी। लेकिन प्रश्न है-ारत की रक्षा कौन करेगा?
प्रश्न मुसलमानों पर शक करने का नही है और न ही मुसलमानों की निष्ठा पर संदेह का है। मुसलमान शायद उस दृष्टि से कटघरे में ी नही खड़े हैं। सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह तो उन लोगों, दलों और गिरोहों की मंशा पर है जो जानबूझकर मुसलमानों के मनोविज्ञान को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।  उनके साथ अन्याय हो रहा है, और वह ी इसलिये हो रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं-सबसे पहले उनके मन में यह ावना री जा रही है जिस वक्त उनके अन्दर यह ावना र जाती फिर उनके तुष्टीकरण के प्रयास किये जाते हैं। पहले यह कार्य अंग्रेज सरकार करती थी अब उनकी विरासत को संाले शासक वर्ग ने शुरू कर दिया है। मुसलमानों के तुष्टीकरण कर यह प्रयास महात्मा गांधी ने ी ारत में खिलाफत आंदोलन को स्वीकार करके दिया था।  लेकिन महात्मा गांधी के बारे में कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनका तरीका गलत था किन्तु मंशा गलत नही थी। मुसलमानों के इन डोंगी रहबरों की तो मंशा ही संदेहास्पद है।            बाबा साहब अम्बेडकर ने अरसा पहले यह प्रश्न उठाया था कि ारतीय सेना में लश्करे तोयबा की ज़हनियत वाले लोग रहेंगे तो शत्रु के आक्रमण पर देश की रक्षा की स्थिति क्या होगी ? उस वक्त लश्करे तोयबा नही था, इसलिये उन्होंने इस शब्द का प्रयोग नही किया था। लेकिन इस ज़हनियत को वे अच्छी तरह पहचान गये थे । दुर्ाग्य है कि आज कुछ लोग इसे पहचान ही नही रहें हैं, कुछ पहचान कर अनजान ी बन रहें हैं और कुछ अपने निहित  स्वार्थों या फिर अपने आकाओं के स्वार्थों की खातिर इसे हवा दे रहें हैं।
(हिन्दुस्थान समाचार)  



मुसलमानों का इस देश पर अधिकार

: डा कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
यूपीए सरकार का और कोई ला हुआ या न हुआ हो, एक ला अवश्य हुआ है कि धीरे-धीरे सी चेहरों से मुखोटे उतरने लगे हैं। ारतीय संसद पर आक्रमण की योजना बनाने वाले अफजल गुरु को बचाने के लिए काँग्रेस के एक-एक करके कई चेहरे बेनकाब हो गए। यह काँग्रेस का एजेंडा नम्बर वन था। जिसे उसने सफलता पूर्वक प्राप्त किया। यूपीए सरकार यदि चाहे तो सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के बड़े चित्रों के साथ इसका विज्ञापन देश र के समाचार पत्रों में दे सकती है। इसका नाम यूपीए शायनिंग रखा जा सकता है।
काँग्रेस की दूसरी उपलब्धि पहले से ी ज्यादा महत्वपूर्ण है। पिछले दिनों देश के सी मुख्यमंत्रियों को काँग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री ने साफ-साफ बता दियाकि इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का बनता है। बाकी ारतवासियों का जहाँ तक प्रश्न है। उनका हक इस देश पर मुसलमानों के बाद आता है। ारत के लोग काँग्रेसी प्रधानमंत्री की इस घोषणा से आह्त थे, तो प्रधानमंत्री ने दूसरा चैका मारा। उन्होंने कहा कि सारा यूपीए उनकी इस घोषणा के पीछे चट्टान की तरह खड़ा है। मनमोहन सिंह को शायद इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं है। क्योंकि वे अर्थशाó के विद्यार्थी हैं इतिहास के नहीं । अतः यदि वे चाहे तो निःसंकोच अपने इस ज्ञान को संशोधित कर सकते हैं। वे पूरे विश्वास के साथ इसमें यह ी जोड़ सकते है कि यूपीए के अतिरिक्त पूरा पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब समेत सी मुसलमान देश इस मसले पर उनके साथ चट्टान की तरह खड़े है। यदि ारत के लोग प्रधानमंत्री की मुसलमानों के हक के थीसिस को स्वीकार नहीं करते हैंतो इन देशों के लोग काँग्रेस की सहायता के लिए जिहाद करने के लिए तैयार है।
यह ारत के लोगों का सौाग्य है कि उन्होंने ारत ूमि पर की अपना हक नहीं जताया। उन्होंने सदा इस ूमि को माँ माना हैऔर इसे ारत माता कहा है। पुत्र की माता पर हक नहीं जताते। वे उसकी सेवा में ही सुख मानते हैं। अलबŸाा इस देश का यह दुर्ाग्य जरूर रहा है कि पश्चिमी एशिया में इस्लाम के उदय के बाद मुसलमानों ने इस देश के संसाधनों पर अपना हक जमाना शुरू कर दियाथा । शायद यही हक जमाने के लिए मध्य एशिया से बाबर ने हिन्दुस्तान पर हमला किया था और उसने ारत पर अपना हक जता ी दिया था और जमा ी लिया था। उसके बाद औरंगजेब, शाहजहाँ और न जाने कितने ऐसे आक्रांता इस देश पर सफलतापूर्वक अपना हक जताते रहे। जिन लोगों ने उनके इस हक का विरोध किया उनका जो हश्र हुआ वह इतिहास जानता है। पृथ्वीराज चैहान इस हक का विरोध करते हुए मारे गए। गुरु तेग बहादुर दिल्ली के चाँदनी चैक में शहीद करवा दिए गए। बंदा बहादुर का अंग-अंग काट लिया गया। उनके बेटे की हत्या उन्हीं की आँखों के सामने की गई। लेकिन इस ारत पर और इसके संसाधनों पर हक जमाने की लड़ाई जो ईसवीं सम्वत् 636 से मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से शुरू हुई थी वह एक प्रकार से आज तक चल रही है। 1947 में मुस्लिम समुदाय ने ारत के एक ू-ाग पर सफलतापूर्वक अपना हक जमा लिया और उसे देश की मुख्य धारा से काटकर इस्लामी परम्परा के अनुसार पाक घोषित कर दिया। जाहिर है कि ारत का जितना हिस्सा बचा उस पर और उसके संसाधनों पर हक जमाने के लिए उन्होंने अपना जिहाद और तेज कर दिया।
पंडित जवाहर लाल नेहरू के काल से ही काँग्रेस इस देश को माता के सदृश्य न मानकर इसे केवल धरती का एक टुकड़ा मानती रही। शायद इसीलिए जब चीन ने मातृ ूमि के एक अंग पर अपना हक जमा लिया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उस हक का विरोध करने के बजाय ारत माँ के उस ू-ाग को बंजर बताकर पल्ला झाड़ लियाऔर अब काँग्रेस के ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीधे-सीधे यह घोषणा करके कि मुसलमानों का इस देश के साधनों का पहला हक है, स्पष्ट कर दियाकि काँग्रेस इस देश के बारे में क्या सोचती है और ारत माता के प्रति उसका दृष्टिकोण क्या है? मनमोहन सिंह ये मानते है कि मुसलामानों का ारत पर पहला हक हैऔर उन्होंने अपनी इस मान्यता का उद्घोष बिना किसी लाग लपेट के साफ-साफ किया है। क्या यह केवल वोटों की खातिर मुसलमानों को प्रसन्न करने की चाल है? या फिर काँग्रेस के मनोविज्ञान का सही-सही दर्शन है। मनमोहन सिंह पर यह आरोप तो कोई नहीं लगा सकता कि वे अपने देश के खिलाफ कोई षड्यंत्र कर रहे हैंऔर न ही उन पर कोई यह आरोप लगा सकता हैकि वे किसी अंतर्राष्ट्रीय रणनीति के तहत ऐसा बेहूदा बयान दे रहे हैं। मनमोहन सिंह सेक्युलरिस्टों की उस जमात का प्रतिनिधित्व करते है जो ारत के साथ माता शब्द लगाने को साम्प्रदायिकता मानती है। ारत माता, वन्दे मातरम्, पावन नदियाँ, क्ति के प्रतीक क्ति साहित्य इस जमात की दृष्टि में साम्प्रदायिकता का सबूत है। इस जमात को लगता है कि जब तक इस देश के लोग ारत के साथ पुत्रवत् ाव से जुड़े रहेंगे तब तक यह देश दकियानुसियों का अखाड़ा बना रहेगा। इनकी दृष्टि में ारत ोग्या ूमि है। तो जाहिर है उस पर हक जताना पड़ेगा। उपासना की ूमि  होगी तो उस पर हक नहीं जताया जाएगा बल्कि उसके आगे नतमस्तक हुआ जाएगा। यही कारण हैकि ारत ूमि के पुत्र माँ की वंदना करते हैं । वंदे मातरम् का गान करते हैं। इस ूमि के जो संसाधन है, वे संसाधन ारत माता अपने पुत्रों के लालन पालन के लिए प्रयोग करती है। वेद में कहा गया हैपृथ्वी मेरी माँ मैं इसका पुत्र हूँ। ारत में तो केवल रतखण्ड को ही नहीं बल्कि संपूर्ण पृथ्वी को माता के समक्ष माना गया है जैसे माता अपने पुत्रों का लालन-पालन करती है वैसे ही पृथ्वी अपने संसाधनों से अपने पुत्रों का लालन-पालन करती है। मनमोहन सिंह किसान नहीं है इसलिए शायद उन्होंने की खेती ी नहीं की होगी परंतु इतना तो उन्हें ी पता होगा कि इस देश ेके करोड़ों-करोड़ों किसान धरती पर हल चलाने से पहले पुत्रवत् क्षमा माँगते हैं। धरती माता के संसाधनों का वे उतना ही प्रयोग करते हैं, जितने से उनका लालन-पालन हो सके। साधनों का दोहन किसान की दृष्टि में माता के प्रति अत्याचार ही माना जाता है। परंतु जब किसी देश पर दूसरे देश के लोग आक्रमण कर देते हैं तो वे विजित देश के प्रति माता का ाव नहीं रख सकते बल्कि उस पर हक जताते हैं। सैक्युलरिस्टों की जमात अपने आप को सेक्युलर बताने के लिए हक जमाने वाले गिरोह के साथ जुड़ गई है। उनके सामने मुख्य प्रश्न यह है कि इस देश पर जिसका नाम ारत है, पहला हक किसका बनता है? मनमोहन सिंह की दृष्टि में या फिर जिस पार्टी का वह प्रतिनिधित्व करते हैं उस काँग्रेस की दृष्टि में या फिर जिन कम्युनिस्टों की बैसाखियों पर वे खड़े हैं, उनकी दृष्टि में मुसलमानों का हक इस देश पर पहले बनता है। जैसा कि हमने ऊपर कहा है हक जताने की यह लड़ाई लंबे काल से चली हुई है। एक वक्त था जब ारत पर दुनिया की गोरी नस्लों ने ी हक जताया था। लेकिन एक लंबे संघर्ष के बाद उनको अपना हक छोड़ना पड़ा। परंतु दुर्ाग्य से हक जताने के नए तरीके शुरू हो गए हैं। ारत के लोग डा. मनमोहन सिंह से केवल एक ही प्रश्न पूछना चाहते हैं कि इटली का  हक इस देश पर मुसलमानों से पहले बनता है या उनके बाद। ताकि कम से कम उन्हें इतना तो मालूम हो सके कि इक्कीसवीं शताब्दी के इस महाारत में कौन किसके साथ खड़ा है? जहाँ तक वामपंथी मोर्चे का प्रश्न है उन्होंने ी अपनी प्राथमिकता प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जाहिर कर ही दी है कि ारत माता के एक अंग पर चीन का हक बनता है। उनका केवल यही कहना है कि चीन को यह हक शांतिपूर्वक बातचीत से ही दे देना चाहिए। वैसे चीन तो यह हक बल पूर्वक लेने को ी तैयार है। जिसकी शुरूआत उसने 1962 में ही कर दी थी। साम्यवादी तो 1962 से ही चीन के इस हक को मान्यता दे रहे हैं । शुक्र है मनमोहन सिंह ने अपने इस थीसिस की घोषणा 2006 में की है, यदि 1947 में कर देते तो सारा ारत ही पाकिस्तान बन जाता। मनमोहन सिंह ने अपने पाले की घोषणा कर दी है। धीरे-धीरे बाकियों के नकाब ी उठने शुरू हो जाएंगे।
(हिन्दुस्थान समाचार)


सोहराबुद्दीन से हसीना पारकर तक-मुठेड़ की प्रक्रिया का प्रश्न


-डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

दाऊद अब्राहम की बहन हसीना पारकर की मुंबई पुलिस को तलाश है। कहा जाता है कि दाऊद अब्राहम के सारे कारोबार का मुंबई से संचालन हसीना ही करती है। दाऊद अब्राहम और हसीना पारकर कोई च्यूंटी ुनगा नहीं है कि किसी को दिखाई न दे। न ही उनका कारोबार इस प्रकार का कारोबार हैजो पुलिस की पकड़ में नहीं आ रहा है। ाई-बहन का काम और तरीका पुलिस ी जानती है, मुख्यमंत्री ी जानते हैं और सीताराम येचुरी ी जानते होंगे। ये तीनों तो दाऊद अब्राहम और हसीना पारकर को अनदेखा ी कर सकते हैं, लेकिन मुंबई की जनता उन्हें अनदेखा नहीं कर सकती । क्योंकि मुंबई निवासियों को और दाऊद अब्राहम-हसीना पारकर को एक साथ ही मुंबई में रहना है। बुद्धिजीवी किस्म के लोग प्रश्न पूछ सकते हैं और पूछ ी रहे है कि दाऊद अब्राहम तो लंबे अरसे से मुंबई से बाहर पाकिस्तान में रहते हैं। लेकिन मुंबई की जनता का काम बुद्धिजीवियों के सवालों से नहीं चलता। वे जानते हैं कि दाऊद अब्राहम पाकिस्तान में होते हुई ी मुंबई में है और हसीना पारकर मुंबई में होते हुए ी पाकिस्तान में है। मुंबई बम धमाकों को लगग पन्द्रह साल बीत गए। मुकदमे का फैसला अब आना शुरू हुआ है। हजारों गवाहियाँ हुईं। ट्रक रकर दस्तावेज पेश किए गए । वकीलों ने अपने मुवक्किलों को बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। लेकिन यह सारी प्रक्रिया चलते रहने के साथ-साथ ाई-बहन ने मुंबई का अपना धंधा बंद नहीं किया। उनका आतंक उसी प्रकार बरकरार रहा। हफ्ता वसूली, सुपारी का लेनदेन उसी प्रकार चलता रहा। पुलिस खुद स्वीकार करती हैकि दाऊद अब्राहम की ओर से मुंबई में ये सारे धंधे हसीना पारकर करती है। लेकिन कांग्रेस सरकार का आतंकवाद से लड़ने का अपना एक तरीका है। वह बीच में की कार एक आध आतंकवादी को पकड़ कर कचहरी में ले जाती हैऔर वहां से जमानत पर आने के बाद दादा किस्म के ये लोग अपना धंधा उसी प्रकार चालू कर देते हैं। आतंकवादियों और सरकार के बीच परस्पर सहयोग का यह मूल मंत्र है। यह तब तक चलता रहता है जब तक दोनों पक्ष अपने कौल करार को पक्की तरह निाते हैं। लेकिन जब एक पक्ष अपने कौल को नहीं निाता तो मामला जग जाहिर हो जाता है।
हसीना पारकर को लेकर यही हुआ है। वह इतने लंबे अरसे से सरेआम अपना धंधा चला रही थी। जब पुलिस को उसकी जरूरत पड़ी तो वह गायब हो गई है। महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार के गृह मंत्री का कहना हैकि हसीना पारकर कहाँ है, उनको नहीं मालूम । यह आतंकवाद से लड़ने का एक तरीका है। इस तरीके से मुंबई में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन इसे खुदा का फजल ही कहना चाहिएकि आतंकवादी कोई नहीं मारा गया। आतंकवादियों के न मारे जाने के पीछे कांग्रेसी सरकार का अपना तर्क है। यह तर्क सीताराम येचुरी और वृंदा करात के तर्क का ही हिस्सा है। इस तर्क के अनुसार आतंकवादियों के ी मानवाधिकार हैं, उनकी रक्षा होना लाजिमी है और सरकार इस सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धित है । इसके साथ ही किसी को पकड़ने या मारने की एक पूरी कानूनी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले आतंकवादी गोलियां और बम चलाता हैऔर उसके कारण कुछ लोगों का मरना जरूरी है और इस पूरे कांड को देखने के लिए कुछ गवाहों का होना ी जरूरी है, जो यह कहे कि उसने आतंकवादी ाई को गोलियां चलाते और लोगों को मारते हुए खुद अपनी आँखों से देखा है। सरकार का यह कहना हैकि इस प्रक्रिया के बाद ही किसी आतंकवादी को पकड़ा जा सकता हैऔर पकड़ने के बाद अदालत को सौंप दिया जाएगाऔर अदालत उसको सजा देगी। सजा देने के लिए अदालत के पास इससे ी लंबी एक प्रक्रिया हैऔर इन सब का नतीजा यह होता है कि हसीना पारकर और दाऊद अब्राहम दोनों ही खुले घूमते हैं। मरना केवल आम नागरिक के ाग्य में लिखा है।
दूसरा किस्सा एक अन्य आतंकवादी सोहराबुद्दीन का है। सोहराबुद्दीन पर अनेक राज्यों में अनेक प्रकार के मुकùें चल रहे हैं । यह मुकùे कोई आज के नहीं है। वर्षों से ये मुकùे अपने स्वाव के अनुसार सरक रहे हैं। मुकदमों की गति धीमी है लेकिन सोहराबुद्दीन के कामकाज की गति तेज है। उसका जाल अनेक राज्यों में फैलता जा रहा है। वह हसीना पारकर की ही तरह लोगों से हफ्ता वसूली करता है और अवज्ञा करने वालों को अपने तरीके से दंडित ी करता है। सोहराबुद्दीन जेल में नहीं रहता। वह स्वतंत्र घूमता हैऔर अपना काम ी स्वतंत्रतापूर्वक ही करता है। ऐसा ी कहते हैं कि वह जरूरतमंदों को हथियारों की सप्लाई ी करता था। इस देश में हथियारों की जरूरत किसे है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। गुजरात पुलिस ने सोहराबुद्दीन को एक मुठेड़ में मार दिया है। आजकल उसी की जांच चल रही है। जांच करने वालों का कहना है कि मुठेड़ की ी अपनी एक प्रक्रिया है और उस प्रक्रिया के अनुसार ही मुठेड़ हो सकती है। उससे एक इंच ी दाएं-बाएं हो जाने से पूरी की पूरी मुठेड़ ही ेगैरकानूनी हो जाती है। अंग्रेजी में कानूनदानों ने इसके लिए एक नया शब्द दिया है एक्स्ट्रा जयुडिशियल किलिंग । उनका कहना है कि सोहराबुद्दीन को जिस मुठेड़ में मार गिराया गया है, वह मुठेड़ गैर कानूनी शक्ल ले चुकी है। इसे इस देश का दुर्ाग्य कहना चाहिए कि आतंकवादियों से लड़ रही पुलिस और सेना लड़ना तो बखूबी जानती है, लेकिन मुठेड़ की प्रक्रिया को नहीं जानती। वैसे ी आतंकवादी के हाथ में बंदूक और बम होता है। आईपीसी और सीआरपीसी की प्रतियाँ नहीं । इसलिए पुलिस और सेना के लिए गोली और बम की प्रक्रिया को जानना ज्यादा जरूरी होता है और पुलिस के इसी ज्ञान से सोहराबुद्दीन जैसे आतंकवादी मारे जाते हैं। सोहराबुद्दीन और इशरतजहां जैसी आतंकवादी मारे जाते हैं। लेकिन आखिर कानून तो कानून हैऔर यह इसी कानून की करामात है कि सोहराबुद्दीन को मारने वाली पुलिस जेल में है और हसीना पारकर जेल से बाहर हैऔर निकट विष्य में उसके जेल में जाने की कोई संावना नहीं है। दाऊद अब्राहम तो शाही मेहमान है। शाही मेहमानों के लिए दस्तरखान बिछाएं जाते हैं। तिहाड़ जेल तो सेना और पुलिस के उन अधिकारियों के लिए है जो आतंकवादियों से लड़ रहे हैं । वैसे ी अपने मनमोहन सिंह कश्मीर के अलागवादियों को दिल्ली में बुलाकर उनकी खातिर तब्बजों ी करते हैं और उनसे सियासी गुफ्तगू ी । शायद इसी गुफ्तगू का नतीजा है कि संसद पर आक्रमण करने वाला अफजल गुरु सारी व्यवस्था पर ठहाके लगा रहा है। इस देश की जनता को यह तय करना है कि राष्ट्र हित में सोहराबुद्दीन का  मरना जरूरी है या हसीना पारकर का ाग जाना ? पूरी न्यायिक प्रक्रिया को अपनाते हुए मौलाना मसूद अजहर को जेल में डालना और वहां से उसे सम्मान पूर्वक कंधार में ले जाकर छोड़ देना राष्ट्र हित में है या फिर इश्रतजहां को मार देना राष्ट्र हित में है । अफजल गुरु को जेल में रखना और इस बात का इंतजार करना कि कल कब किसी का अपहरण हो जाए और अफजल गुरु को ससम्मान छोड़ने के लिए हमारे विदेश मंत्री को पाकिस्तान जाना पड़े राष्ट्र हित में है या फिर मोहम्मद इकबाल को कुपवाड़ा में पुलिस द्वारा ढेर कर दिया जानाराष्ट्रहित में है? पंजाब के पूर्व डी.जी.पी. कंवर पाल सिंह गिल ने ठीक ही कहा है कि आतंकवाद के माध्यम से पाकिस्तान ारत से छù युद्ध कर रहा हैऔर युद्ध के दौरान आईपीसी कारगर नहीं होती । युद्ध में गोली का जवाब गोली से दिया जाता है। यह बात वे ी जानते है जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों का प्रश्न उठाते हुए नहीं थकते। लेकिन वे यह ी बखूबी जानते हैं कि इस युद्ध में वे किसके साथ है? परंतु देश की जनता इतनी मूर्ख नहीं है वह इस खेमे बंदी में प्रत्येक पक्ष को अच्छी तरह पहचान न सके । सोहराबुद्दीन तो एक मोहरा है। इस पूरी लड़ाई में निशाना कहीं और साधा जा रहा है। गुजरात सिंध का पड़ोसी राज्य हैऔर इतिहास गवाह है कि सिंध के राजा दाहिर को मुहम्मद बिन कासिम ने प्रासाद पर फहरा रहे प्रतीक को नष्ट करके पराजित कर दिया था। इस बार ी इस नई लड़ाई में प्रतीक को ही गिराए जाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन ारतीयों को हर हालत में उस प्रतीक को बचाना है क्योंकि पूरी लड़ाई ही प्रतीकों के माध्यम से लड़ी जा रही है।

(हिन्दुस्थान समाचार)

आने वाले चुनावों में अमेरिका की दिलचस्पी:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 1 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
गुजरात के विधानसा चुनावों को कुल जमा छः महीने बचे हैं। इसलिए आक्रमणों का सारा जोर नरेन्द्र मोदी पर ही रहेगा। सोनिया गांधी ने आॅपरेशन इंडिया का मोटा-मोटा सारा काम लगग निपटा लिया है। गांधी नेहरू परिवार में सोनिया के सिवा अब और कोई नहीं बचा है। मेनका ी इस परिवार से जुड़ी थी लेकिन समय रहते उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया। इसलिए सारी की सारी विरासत सोनिया गांधी के ही हाथों में है। कांग्रेस की बागडोर कांग्रेसियों ने खुद ही सोनिया गांधी के हवाले कर दी थी। जिस प्रकार जाॅर्ज पंचम के दरबार में हाजिरी देने के लिए दिल्ली में देश र के राजा एकत्रित हुए थे उसी तरह राजीव गांधी की रहस्यमयी मौत के बाद कांग्रेसी क्षत्रप सोनिया के दरबार में दूर-दूर से चलकर आ पहुंचे थे। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के बाद सŸाा के समस्त सूत्र अत्यंत चालाकी से संाल लिए। देश के जाने माने अर्थशाóी और की इंदिरा गांधी के आर्थिक सलाहकार रह चुके प्रो. अशोक मित्रा की मानें तो मनमोहन सिंह की नियुक्ति अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने ही की है। इससे यह ी पता चल जाता है कि सŸाा के असील सूत्र कहां है? राष्ट्रपति वन बीच-बीच में सोनिया के साम्राज्य में कांटे की तरह चुता था। कलाम का कोई रोसा नहीं था। वे देश के हितों के प्रश्न पर अपनी बेबाक राय जाहिर करने के लिए मजबूर हो जाते थे। सोनिया और उसके मित्रों ने राष्ट्रपति वन का आॅपरेशन ी सफलतापूर्वक कर दिया है। प्रतिा पाटिल रायसीना हिल्ज़ की मालिक हो गई हैं। राष्ट्रपति बनने पर की ज्ञान जैल सिंह ने कहा था कि ‘इंदिरा गांधी मुझे झाडू लगाने के लिए कहे तो मैं वह ी करने के लिए तैयार हूँ।’ प्रतिा पाटिल को शायद ऐसा कहने की ी जरूरत नहीं है। ारत और श्रीलंका के बीच जिस तेजी और हड़बड़ी से ऐतिहासिक रामसेतु को तोड़ने का प्रयास सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह कर रहे हैं उससे ारतीयों की ावना को ठेस पहुंचती है-यह इस पूरे प्रकरण का एक पहलू है।असली मुद्दा तो यह है कि रामसेतु के टूटने पर ारत और श्रीलंका के बीच का जल क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय बन जाएगा और अमेरिका की मार हमारी जल सीमा तक हो जाएगी । बाकी जहां तक अमेरिका का अपना प्रश्न है अमेरिका ने पिछले दिनों स्पष्ट कर ही दिया है कि वह पाकिस्तान में सैनिक कार्यवाही ी कर सकता है। क्योंकि बकौल अमेरिका ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है। इसका निर्णय ी अमेरिका खुद ही करता है कि लादेन किस वक्त कहां होना चाहिए। इसलिए हमला करने के लिए देश और स्थान ी अमेरिका खुद ही चुनता है। अमेरिका पाकिस्तान पर हमला करता है या नहीं करता, यह हमारी चिंता का विषय नहीं है। चिंता इस बात की है कि यदि अमेरिका पाकिस्तान में आ जाता है तो उसका अधिकार क्षेत्र बाघा सीमा तक हो जाएगा। खूबसूरती यह है कि अमेरिका अपनी योजना का खुलासा ी करता जा रहा है और कई समझौतों के माध्यम से, जिसमें 123 परमाणु परीक्षा केवल एक समझौता है, ारत के ीतर अपनी दखलअंदाजी  ी बढ़ाता जा रहा है। किस्सा कोताह यह है कि सोनिया गांधी का आॅपरेशन इंडिया मुकम्मल हो गया है। अब उसके रास्ते का केवल एक ही कांटा है। वैसे कायदे से दो कांटे होने चाहिए थे। एक राष्ट्रवादी शक्तियों का मजमुआ संघ परिवार और दूसरा साम्यवादी शक्तियों का मजमुआ साम्यवादी परिवार। लेकिन इस मामले में सोनिया गांधी और अमेरिका दोनों की ही दाद देनी होगी कि जो साम्यवादी परिवार घोषित वैचारिक आधार के कारण अमेरिका रास्ते का कांटा होना चाहिए था, वह सोनिया गांधी और अमेरिका की पालकी का कहार बन गया है।

दूसरा कांटा बचा संघ परिवार, यदि ाजपा को उसकी राजनीतिक अिव्यक्ति मान लिया जाए तो ाजपा इस आॅपरेशन के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा माना जाएगा। ाजपा सरकार ने अपने शुरू के 13 महीने के शासनकाल में परमाणु धमाका करके अमेरिका को चैंका दिया था। शायद अमेरिका को ती लगने लगा होगा कि ारत की सŸाा के सूत्र उसके हाथों से निकल गए है। ाजपा का विरोध तो शायद अब ी बरकरार है परंतु उसकी धार कुंठित हो चुकी है। इसलिए नहीं कि वैचारिक संस्खलन हुआ है बल्कि इसलिए कि ाजपा देश की सŸाा में लंबे अरसे तक स्थाई रूप से बने रहने में सफल नहीं हुई है। राज्यों में उसकी सरकारों का आना जाना शुरू हो गया है। जिस राजनैतिक दल का आना जाना 4-5 साल के ीतर बदलता रहे वह स्थाई रूप से कुछ मौलिक परिवर्तन कर पाएगा, इसमें संदेह होने लगता है। 1977 के बाद से ाजपा वििन्न राज्यों में जिस तेजी से सŸाा संालती है, अगले पाँच सालों में उसी तेजी से बाहर हो जाती है। इसलिए ारत को नियंत्रित करने का सपना देख रही विदेशी शक्तियों को प्रारं में ाजपा से जितना य था वह धीरे-धीरे मिटता गया। नरेन्द्र मोदी ने इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ उपस्थित किया है। नरेन्द्र मोदी निरंतर दो बार विधानसा चुनावों में गुजरात में ाजपा की सरकार बना चुके हैं। अब यदि वे तीसरी बार ी चुनाव जीत जाते हैं तो सोनिया और अमेरिका दोनों को ही स्पष्ट हो जाएगा कि ाजपा का राष्ट्रवादी प्रयोग स्थाई रूप से जड़ जमा चुका है और यदि यह ऐसा ही चलता रहा तो पूरे ारत में एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हो जाएगा। इसलिए आने वाले चुनावों में सोनिया और अमेरिका दोनों के लिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ना बहुत जरूरी है। ऐसा ही एक प्रयोग अमेरिका ने स्वतंत्रता के शुरूआती दौर में ारत के केरल राज्य में किया था। कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को गिराने के लिए अमेरिका ने वहां रूपया ी खर्च किया और हर हथकंडा इस्तेमाल किया। वैसे ी लोकतांत्रिक देशों में अमेरिका सरकारों को कैसे बनाता और गिराता है इसकी एक बानगी सीआईके  के डीक्लासीफाई हो चुके दस्तावेजों को देखने से पता चल जाता है। 1957 के कम्युनिस्ट अमेरिका का विरोध कर रहे थे, लेकिन 2007 तक आते-आते वे उसकी और सोनिया की पालकी में कहार बन गए हैं। वैसे ी साम्यवादी आंदोलन दुनिया र से खत्म हो चुका है। इसलिए ारत के इन साम्यवादी समूहों पर क्रोध नहीं उनके विद्रूप को देखकर दया और हंसी आती है। साम्यवादी देश के कोने में पड़े हैं और उनके ारत में फैलने की अब लगग तमाम संावनाएं चुक गई हैं। वैसे ी अमेरिका अब साम्यवादियों को अपने विरोधी के रूप में नहीं बल्कि सहायक मित्र के रूप में देखता है। ाजपा का मामला ऐसा नहीं है। वह इस देश में एक केन्द्रीय शक्ति बनकर उरी है। गुजरात एक प्रकार से ारत की ावी राजनीति का प्रशिक्षण स्थल बन गया है।  इसलिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ने के लिए इतालवी और अमेरिकी तर्कश में जितने तीर होंगे वे इन छः महीनों में निरंतर चलेंगे। अमेरिका सरकार ने अी पिछले दिनों एक रपट जारी की है। जिससे ारत में अमेरिका की रणनीति का खुलासा होता है और यह ी पता चलता है कि अमेरिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ारत में कितनी दखलअंदाजी करता है। रपट में स्पष्ट कहा गया है कि नरेन्द्र मोदी को वीजा इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि वे ारत में धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे। इतना ही नहीं यह ी कहा गया है कि अमेरिकी कन्सुलेट के अधिकारी मुंबई में उद्योगपतियों, मीडिया के लोगों और अनेक गैर सरकारी संस्थाओं के लोगों से गुजरात के दंगों के परिणामों पर बातचीत करने के लिए मिले थे। ारत में अमेरिकी दूतावास के लोग मदरसों के संचालकों से ी मिले। अमेरिका सरकार ने स्पष्ट कहा है कि अी तक स्कूलों में से राष्ट्रीय ावनाओं वाली पाठ्य-पुस्तकों को हटाया नहीं गया हैं । रपट में इस बात पर चिंता की गई है कि अी ी ारत के कुछ राज्यों में ारतीय जनता पार्टी का राज है। बीजेपी धारा 370 का विरोध करती है। एक समान सिविल कोर्ड की वकालत करती है और सबसे बढ़कर बीजेपी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा है जो धर्मांतरण का विरोध करता है और ईसाइयों और मुसलमानों से ेदाव करता है। रपट में इस बात पर ी दुःख प्रकट किया गया है कि अनेक राज्य धर्मांतरण विरोधी कानून बना रहे हैं और आशा की जा रही है कि सरकार इन्हें रोकेगी। यह रपट अपने आप में आंखें खोलने वाली है। जाहिर है कि अमेरिका के निशाने पर संघ परिवार है क्योंकि उसे लगता है कि संघ परिवार ारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ आंदोलन है। यदि इस लड़ाई में नरेन्द्र मोदी का स्तं गिरा दिया जाए तो जोशुआ प्रोजेक्ट-2 को पूरा होते कितनी देर लगेगी? यहां यह बताना रूचिकर रहेगा कि यह प्रोजेक्ट ारत को ईसाई बनाने के लिए चलाया गया अमेरिकी प्रोजेक्ट है।
अमेरिका इस पूरी लड़ाई में ारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। वह केवल इस्तेमाल ही नहीं कर रहा बल्कि ारत सरकार से ी यह आशा कर रहा है कि वह पाकिस्तान को आतंकवादी देश न माने बल्कि आतंकवाद के खिलाफ हो रही लड़ाई में सहायक देश के रूप में अपना ाई समझे। यह कहने कि सोनिया के नेतृत्व में ारत सरकार अमेरिका की इस परीक्षा में खरी उतर रही है।

ारत सरकार के तथाकथित सुरक्षा सलाहकार के. नारायणन ने स्पष्ट कर दिया है कि ारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पाकिस्तान के साथ मिलकर लड़ेगा। लाल मस्जिद प्रकरण के बाद तो मुशर्रफ का चालीसा पढ़ने वालों की हरकतें देखकर ारत के ाग्य के बारे में सोचकर कंपकंपी होती है। राॅ के पूर्व अधिकारी रमन ने अपनी प्रकाशित होने वाली किताब में खुलासा किया है कि नरसिम्हाराव के काल में ी अमेरिका ने दबाव डाला था कि ारत को पाकिस्तान के  साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन नरसिम्हा राव ने इंकार कर दिया था। मनमोहन सिंह इंकार नहीं कर रहे हैं। वे सब कुछ पाकिस्तान और अमेरिका के साथ मिलकर ही करना चाहते हैं। अमेरिका की इस पूरी साजिश में नरेन्द्र मोदी रूकावट है। यदि अमेरिका नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जंग छेड़ता है तो जाहिर है सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को इसमें अमेरिका का ही साथ देना है। सोनिया गांधी की दृष्टि में परवेज मुशर्रफ ारत का मित्र है और नरेन्द्र मोदी दुश्मन। इस लड़ाई में जहां तक प्रचार का प्रश्न है अमेरिका उसमें पूरी मुस्तैदी से जुड़ा है अमेरिका के अनेक अधिकारिक प्रकाशनों में नरेन्द्र मोदी को ारत में चर्च के प्रसार के लिए बहुत बड़ा कांटा माना गया है। जहां तक नरेन्द्र मोदी के अखाड़े का प्रश्न है सीआईए ने अपनी अधिकारिक वेबसाइट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ारतीय जनता पार्टी को हिन्दू मिलिटेन्ट आॅर्गनाइजेशन घोषित कर रखा है। अमेरिका यह ी कहता है कि जहां ी मिलिटेन्ट तत्व होंगे वहां आक्रमण करने का उसे पूरा अधिकार है । वह इसी तर्क से अफगानिस्तान में घुसा था, इसी तर्क से इराक में घुसा था और इसी तर्क से ईरान में घुसने की घोषणा कर रहा है। ईरान के बाद ारत की बारी ी आ सकती है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों ही अमेरिका की इस रणनीति के हिस्सेदार बनने को तैयार दिखाई देते हैं, क्योंकि वे पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि मिलिटेन्ट ताकतों से लड़ने का विश्वव्यापी अधिकार अमेरिका के पास है।

मीडिया इस पूरी कंपेन में अपना धर्म बखूबी निाएगा ही। बने बनाए निष्कर्ष और अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर किए गए विश्लेषण मीडिया को परोसे जाएंगे और वह पूरी ईमानदारी से प्रयास करेगा कि दर्शक या पाठक उसकी जुगाली करते रहें। इस पृष्ठूमि में हमें गुजरात ाजपा में तथाकथित विद्रोह का विश्लेषण करना होगा। ाजपा के ीतर व्यक्तिगत उचित अनुचित कारणों से दुःखी आत्माओं का रणनीति के तौर पर प्रयोग करने का अियान जो कांग्रेस ने शुरू किया है, वह प्रकारांतर से अमेरिका की उसी लंबी रणनीति का हिस्सा है। विदेशी शक्तियों को मोहरे इस देश में पहले ी उपलब्ध होते रहे हैं और आज ी उपलब्ध हो रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हो रहा है, वह केवल हमारा इम्तिहान है कि क्या हमने इतने सालों की गुलामी से कुछ सीखा है या अी ी आपसी लड़ाईयों में विदेशी शक्तियों को निमंत्रित करने की परंपरा पर चले हुए हैं।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

मदनी अब्दुल नसीर है कांग्रेस और सीपीएम के नये नायक

: डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 3 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
कोयम्बटूर की एक विशेष अदालत ने अब्दुल नसीर मदनी को रिहा कर दिया है। उन पर 14 फरवरी 1998 में कोयम्बटूर में हुए बम धमाकों  की साजिश का आरोप था। इन धमाकों में 58 लोगों की मौत हो गई थी। आरोप इतने गंीर थे और मामला इतना संवेदन शील था कि पिछले 9 सालों से जेल में बंद मदनी अनेक अदालतों में जमानत की गुजार लगाते रहे। लेकिन 2005 में सर्वाेच्च न्यायालय तक ने उसकी जमानत की अर्जी को खारिज कर दिया था। ऐसा प्रायः कम मामलों में ही होता है लेकिन जब सर्वाेच्च न्यायाल ी लंबे अरसे से रिमांड पर ही जेल में रह रहे अपराधी की जमानत याचिका खारिज कर दे तो मान लेना चाहिए आरोप गंीर ी है और तथ्यपरक ी।
लेकिन मदनी निर्दाेष छूट गए है। इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआक्योंकि इससे पहले ी जेसिका लाल हत्याकांड केस में मनु शर्मा निर्दाेष करार दिए गए थे। प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड में संतोष सिंह निर्दाेष करार दिए गए थे। यदि मदनी इसी परंपरा मे निर्दाेष पाए जाते तो शायद इसको लेकर किसी को आश्चर्य ी न होता लेकिन मदनी के निर्दाेष पाए जाने का जो खुलासा केरल सीपीएम के सचिव ने किया है वह चैंकाने वाला है। कन्नूर में संवाददाताओं से मदनी के जेल से छूटने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सीपीएम के सचिव विजयन ने रहस्योद्घाटन किया कि मदनी की रिहाई केरल और तमिलनाडु  में सरकारों के बदलने के कारण ही संव हो पाई है। इसका अर्थ यह हुआ कि तमिलनाडु सरकार और केरल सरकार ने न्यायालय के निर्णय को प्रावित किया है। ऐसा नहीं है कि इस देश में राजनैतिक दल और राजनैतिक पुरुष न्यायालय के निर्णय को प्रावित नहीं करते। मनु शर्मा और संतोष सिंह का किस्सा ऐसा ही है । लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है किसी राजनैतिक दल ने खुलेआम इस बात की घोषणा की हो कि सरकार के बदलने के कारण किसी अपराधी की रिहाई संव हो पाई है। यह ठीक है कि केरल में कांग्रेस और सीपीएम दोनों ही एक लंबे अरसे से मदनी को छुड़ाने की जुगते बिठा रहे थे। जहां तक कि इन दोनों दलों ने मिलकर मदनी की रिहाई के लिए 2005 में विधानसा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव ी पारित किया था। विजयन कहते हैं कि रिमांड पर जेल पर रहने का मदनी का किस्सा करोड़ों में से एक है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि विधानसा द्वारा किसी अपराधी को मुक्त करवाने के लिए प्रस्ताव पारित करने का किस्सा ी करोड़ों में से एक ही है।
यदि इन बातों को गंीरता से लिया जाए और इसे लेना ी चाहिए क्योंकि सीपीएम पार्टी केरल में राज्य कर रही है और केन्द्र में राज्य करने वालों को आॅक्सीजन मुहैया कर रही है। तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कडगम ी केन्द्र की यूपीए सरकार का हिस्सा है। इसका अर्थ यह हुआ कि मदनी की रिहाई में डीएमके सरकार और केरल की साम्यवादी सरकार ने पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण ूमिका अदा की है। जज को डराया धमकाया होगा ऐसा तो कोई नहीं कह सकता। क्योंकि न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास अी ी अडिग है। लेकिन अब इतना तो मानना ही पड़ेगा कि डीएम सरकार ने मदनी का केस ही कचहरी में इस ढंग से प्रस्तुत किया होगा कि न्यायाधीश के पास उसको छोड़ने के अलावा और कोई चारा न रहे। कचहरियों में ऐसा पहले ी होता रहा है जब न्यायाधीश ने स्वयं ही कहा कि वे जानते हैं कि छूटने वाला अपराधी पाक साफ नहीं है लेकिन जांच करने वाली एजेंसी यदि उसके खिलाफ सबूत प्रस्तुत नहीं करेगी तो यह काम न्यायपालिका स्वयं तो नहीं कर सकती। तमिलनाडु के अध्यक्ष गणेशन ने ठीक ही कहा है, ‘इस निर्णय के लिए न्यायापालिका को उŸारदायी नहीं ठहराया जा सकता। सरकार ने ही मदनी के खिलाफ कमजोर केस तैयार किया और उसके छूटने का रास्ता साफ कर दिया।
प्रश्न है मदनी केरल की राजनीति में इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं? उसका प्रमुख कारण यह है कि उन्होंने केरल में कट्टरवादी मुस्लिम आतंकवाद को जन्म दिया है। उन्होंने 1980 में इस्लामी संघ की स्थापना की । जब सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया तो उसने उसके स्थान पर पीडीपी नामक राजनैतिक दल की स्थापना कर दी। वह मुसलमानों ने यह विश्वास दिलाने को कामयाब हो गया कि हिन्दुस्तान में दारूल हरब है। यानि उन लोगों का साम्राज्य जो ईश्वर
की नजरों में अच्छे लोग नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में दारूल इस्लाम की स्थापना करना हर मोमिन का फर्ज हैऔर यह ऐसा काम है जो उसे अल्लाह ने सौंपा है। इस फर्ज को अदा करने पर हर मोमिन जन्नत नसीब होगी और जन्नत में उसे क्या मिलेगा यह हर मोमिन पहले से ही जानता है। लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है। इसके लिए हथियार उठाना पड़ता है और दुर्ाग्य से मदनी के कहने पर केरल में मोमिनों न हथियार उठा लिए। मदनी पर आरोप था कि कोयम्बटूर के जिस बम विस्फोट में 58 लोग मारे गए उसको अंजाम देने वाले अलउम्मा के सदर एस.ए. बाशा और उसके अनुयायियों के तार मदनी से जुड़े हुए थे और मदनी ने ही उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की थी। यह प्रशिक्षण बौद्धिक ी था और हथियारों का ी। जाहिर है दारूल इस्लाम की खोज में मदनी के सैनिक तिरुवनंतपुरम की ओर से तमिल प्रदेश की ओर चल पड़े थे। न्यायालय में मदनी का दोष सिद्ध नहीं हो पाया, यह अलग बात है, लेकिन इस पूरे आंदोलन में मदनी ने यह अरसा पहले ही सिद्ध कर दिया था कि केरल के मुसलमानों के वोट उसकी झोली में है। वह जिसकेे पक्ष में चाहेगा उसके पक्ष में यह झोली उलटा सकता है। यह अलग बात है कि बंबों से खेलते खिलाते एक बम विस्फोट में उसकी अपनी एक टांग ी उड़ गई थी। परंतु मदनी जानता है कि ारत में दारूल इस्लाम की स्थापना के लिए खुदा के दरबार में यह ेंट तुच्छ ही मानी जाएगी। इसलिए वह दूसरे नायाब ताहफों की तलाश में रहता है। 1998 में जब केरल सरकार ने मदनी को राज्य में अशांति फैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया तो मदनी ने चुनावों में अपनी शक्ति दिखा दी और अगले चुनावों में मुसलमानों के वोट न मिलने कारण कांग्रेस पिट गई। केरल में अब कांग्रेस और सीपीएम दोनों को ही मुसलमानों के वोटों की चिंता है। इसलिए मदनी को रिझाने में लगे हुए हैं। वैसे एक दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस और सीपीएम मुस्लिम आतंकवादियों को रिझाने का प्रयोग पूरे देश में ही एक सोची समझी रणनीति के तहत कर रही है। कश्मीर से सेना वापिस बुलाई जा रही है। पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने का सांझा साथी घोषित किया जा रहा है। अफजल गुरु को फांसी के फंदे से लगग उतार ही दिया गया है उसके लिए जम्मू कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री की ूमिका काबिले गौर है। अलबŸाा मदनी की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उसने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वह मुसलमानों की कट्टरपंथी नीति से जुड़ा रहा है और उससे गल्तियाँ ी हुई है। लेकिन उसे यह नहीं मालूम की उसकी इन  गलतियों में 58 लोगों की जान चली गई है। कांग्रेस और सीपीएम के लिए इस देश के नायक अफज़ल गुरु है, सोहराबुद्दीन है, प्रो. गिलानी है और अब अब्दुल नसीर मदनी है। बाकी देश में तो ये दोनों दल यह रणनीति मानवाधिकारों के नीचे चला रहे हैं लेकिन केरल में दोनों ने वह लोक लाज ी त्याग दी है और सीधे-सीधे मदनी के पक्ष में उतर आए हैं । सीपीएम और कांग्रेस की दृष्टि में इस देश के दुश्मन वे सैनिक है, वे सिपाही है और वह जांबाज जनता है जो आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो रही है। जो कहीं बच ी जाते हैं तो वे आतंकवादियों के मानवाधिकार  हनन केस में जेल ेज दिए जाते हैं। बन्दे मातरम कहने वाले जेल में है और मदनी जेल से बाहर है। केरल में कांग्रेस और सीपीएम मिलकर मदनी के लिए वंदनबार सजा रहे हैं। उसके आगे कोर्निश कर रहे हैं माथे पर कार्लमाक्र्स का चित्र लगाकर हाथ में लाल झंडा लेकर मदनी के विजयोत्सव में नाच-नाच कर पसीने से सराबोर हो रहे हैं। लेकिन देश के सामने एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या तमिलनाडु की सरकार मदनी को रिहा करने के विशेष न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ अगले न्यायालय में अपील दायर करेगी या नहीं? या फिर वह ी केरल के साम्यवादी और कांग्रेसियों की तरह मदनी के विजयोत्सव में हिजडों की तरह नाच-नाच कर अपने कर्Ÿाव्य की इतिश्री मान लेगी।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

म्यांमार में लोकतंत्र की आड़ में चर्च का गंदा खेल:

 डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
दिनांक:  1 अक्तूबर 2007
स्थान: नई दिल्ली
म्यांमार में कुछ बौद्ध िक्षुओं ने लोकतंत्र के पक्ष में नारे लगाते हुए पिछले दिनों प्रदर्शन किए। प्रदर्शन उग्र हुए तो पुलिस ने लाठी चार्ज किया और गोली ी चली उसमें कुछ लोग मारे ी गए। उनमें से एक जापानी पत्रकार ी था। जाहिर है चीवर पहने िक्खु का खून बहेगा तो लोगों को क्रोध तो आएगा ही और यांगून में लोग क्रोध का प्रदर्शन कर ी रहे हैं। म्यांमार में 1962 में ही जनरल नेविन ने सैनिक सŸाा स्थापित कर ली थीऔर उसने 26 साल तक वहां राज्य किया। 1988 में म्यांमार में लोकतंत्र के पक्ष में लोग सड़कों पर निकल आए। जनरल नेविन को सŸााच्युत करते हुए एक अन्य सैनिक विद्रोह में जनरल साँ मुआंग ने सŸाा संाल ली । जनरल साँ मुआंग ने 1990 में देश में पहली बार स्वतंत्र चुनाव करवाए । इन चुनावों में औंग स्वांग सूकी की नेशनल लीग फाॅर डेमोक्रेसी ने 489 में से 392 सीटें जीतकर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। परंतु जनरल साँ मुआंग ने सŸाा छोड़ने के बजाए 20 जुलाई 1999 को औंग स्वांग सूकी को गिरफ्तार कर लिया। सूकी तो तब से जेल में ही है अलबŸाा जनरल साँ मुआंग ने बाद में त्याग पत्र दे दिया और उनकी जगह थान श्वेह सŸाारूढ़ हुए।
सूकी का म्यांमार के स्वतंत्रता संघर्ष से पुराना समन्वय रहा है। चाहे प्रत्यक्ष चाहे अप्रत्यक्ष। सूकी के पिता औंग स्वांग ने 1940 में म्यांमार में बर्मा स्वतंत्रता सेना का गठन किया था और यह सेना  बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करती रही। वैसे कुछ लोगों का यह आरोप ी है कि औंग स्वांग पहले जापानियों के साथ थे। जापानियों ने ही उन्हें प्रशिक्षित किया था लेकिन बाद में उन्होंने जापानियों के खिलाफ ब्रिटेन से हाथ मिला लिया। 1947 में बर्मा में जो अस्थाई सरकार बनी उसमें औंग स्वांग उपसापति थे। परंतु इसके बनने के कुछ महीने बाद ही 1947 में विरोधियों ने औंग स्वांग समेत उनके अनेक मंत्रिमंडलीय सहयोगियोें को कत्ल कर दिया। इसे इतिहास का दुर्याेग कहा जाए या संयोग कि 1947 से 43 साल बाद औंग स्वांग की बेटी सूकी ने लोकतांत्रिक चुनावों में बर्मावासियों का समर्थन हासिल किया। लेकिन इस बीच इरावती में इतना पानी बह चुका था कि इस यात्रा को अथ से प्रारं करना संव नहीं था।
जिस समय अंग्रेजों का ारत और बर्मा पर एक साथ साम्राज्य था उस समय और 1937 के बाद ी जब बर्मा को ारत के प्रशासन से अलग कर दिया गया अंग्रेजों ने बर्मा के लोगों में फूट डलवाने के साम्राज्यवादी प्रयास किए। इस देश को दिया गया बर्मा नाम ी अंग्रेजों का ही षड्यंत्र था। जिस प्रकार उन्होंने हिन्दुस्थान और ारत को इंडिया बना दिया इसी प्रकार उन्होंने इरावती की धरती के पुराने नामों को दरकिनार करते हुए इस देश का नाम बर्मा कर दिया। बर्मा मूलतः अपनी पुरानी ऐतिहासिक विरासत को संाले हुए बुद्ध वचनों में विश्वास करने वाला देश है। इसकी राष्ट्रीयता का मूलाधार ी बुद्ध प्रतीक, इतिहास और संस्कृति के ीतर से उपजा है। अंग्रेजों ने एक निश्चित योजना के अनुसार बर्मा का ईसाइकरण प्रारं किया। ारत के  साथ बर्मा के पर्वतीय सीमांत पर बसी हुई जनजातियों का सरकारी सहायता से ईसाई मिशनरियों ने धर्मांतरण कर उनके गले में यीशु मसीह की सलीव लटका दी। धर्मांतरण के इन कुप्रयासों का फल यह हुआ कि बर्मा के ीतर ही वििन्न सम्प्रदायों में अविश्वास बढ़ा और झगड़े हुए। लोकतंत्र की सरकार का जो प्रयोग थोड़े अरसे वहाँ हुआ उसमें अमेरिका के साम्राज्यवादी रवैय्ये के कारण मैदानी क्षेत्रों में ी ईसाईकरण की प्रक्रिया तेज होने लगी। बर्मा में सेना ने सŸाा संालने के बाद ईसाई मिशनरियों की इन अराष्ट्रीय गतिविधियों पर रोक लगादी और बहुत सीमा तक धर्मांतरण के माध्यम से राष्ट्रांतरण की यह प्रकिया रूकी ।
लेकिन इसी बीच औंक स्वांग की बेटी सूकी के बारे में जान लेना ी रूचिकर होगा। इसी बीच औंग स्वांग की बेटी सूकी पढ़ने के लिए लंदन चली गई और वहाँ बर्मा में पूर्व ब्रिटिश राजदूत लाॅर्ड गौरबूथ के घर में रही। यही उनका परिचय एक अंग्रेज माइकल एरिस से हुआ और 1972 में दोनों नेे शादी कर ली। 1988 में सूकी बर्मा वापिस आई और वहीं उन्होंने देश की राजनीति में पुनः ाग लेने का निर्णय लिया। आगे की कथा इतिहास है । बर्मा साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए एक प्रकार से क्रीड़ा ूमि बन गया है। जब से पोप ने दिल्ली में यह घोषणा की है कि 21वीं शताब्दी में एशिया के बचे खुचे देशों में ी सलीव लटका दी जाएगी तब से ारत के आसपास के 8-10 छोटे-छोटे बौद्ध देश ईसाई मिशनरियों का निशाना बन गए हैं। बर्मा उनमें से एक है। सैनिक शासन ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण की आज्ञा नहीं दे रहा। इसलिए लोकतंत्र बचाने की आड़ में बर्मा के पर्वतीय क्षेत्रों के ईसाई बहुल इलाकों के लोग यत्र-तत्र प्रदर्शन करते रहते हैं। अमेरिका और अन्य यूरोपीय देश बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के लिए इसीलिए लालयित है कि वहां ईसाइकरण की प्रक्रिया को तेज किया जा सके। अन्यथा अमेरिका पाकिस्तान में तानाशाही का ही समर्थन करता है। अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी देशों को यह लगता है औंग स्वांग सूकी उनके उपकारों से इतनी दबी हुई है कि यदि उसे सŸाा प्राप्त होती है तो वह ना तो अमेरिका के साम्राज्यवादी षड्यंत्रों को रोक पाएगी और ना ही ईसाई मिशनरियों पर लगाम लगा पाएगी। अमेरिका और यूरोप बर्मा के ईसाईकरण की प्रक्रिया में इतनी रूचि ले रहे हैं कि जब बर्मा सरकार ने देश का नाम प्राचीन परंपरा के अनुसार म्यांमार कर दिया तो अमेरिका आस्ट्रेलिया आयरलैण्ड और इंग्लैण्ड ने उसे स्वीकार करने से इंकार कर दियाऔर वे अी ी बर्मा नाम का ही प्रयोग करते हैं। यही स्थिति यूरोप संघ की है। म्यांमार के ीतर के ईसाई समुदाय तो म्यांमार नाम का विरोध कर ही रहे हैं।

म्यांमार इतिहास के चैराहे पर खड़ा है। एक ओर उसे चीन घेरना चाहता है। दूसरी ओर अमेरिका और ईसाई मिशनरियाँ अपने साम्राज्यवादी एजेण्डा को म्यांमार में लागू करना चाहती है। सैनिक तानाशाही म्यांमार के सांस्कृतिक विरासत को संाल रही है। लेकिन उसका तरीका तानाशाही का है और किसी ी देश में तानाशाही का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन दुर्ाग्य से लोकतंत्र बचाओ आंदोलन की आड़ में अमेरिका और यूरोप म्यांमार में धर्म परिवर्तन का जो गंदा खेल खेल रहा है उससे ी आँखे नहीं चुराई जा सकती। गवान बुद्ध ने कहा था कि- अप्प दीपों व । लेकिन अमेरिका इसी दीपक को बुझा देना चाहता है। तब प्रश्न पैदा होता है कि अंधेरे में लोकतंत्र कैसे जिंदा रहेगा।? लोकतंत्र के बिना म्यांमार की संस्कृति ी जिंदा नहीं रह सकती । उसका कंकाल तो बचा रह सकता है लेकिन आत्मा नहीं । चीन के दोनों हाथों में लड्डू हैं। उसे ना  तानाशाही से कुछ लेना देना है ना लोकतंत्र से। जो ी सरकार आ जाए वह उसी के पक्ष में है। क्योंकि चीन का लोक से कोई वास्ता नहीं है। उसका वास्ता केवल सरकार से है। परंतु ारत को तो लोक की ी । चिंता करनी है और अपने हितों की ी यहाँ एक और दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के उकसाने पर और उसकी कार्यसूची को पूरा करने की योजना के अंतर्गत वर्तमान ारत सरकार में म्यांमार में लोक की हत्या को लेकर ज्यादा ही चिंता जताई जा रही है। ारत सरकार को न तिब्बत के लोक की चिंता है ना पाकिस्तान में लोक हत्या की चिंता है। उसे केवल यांगून के लोग की चिंता हो रही है। क्या यह लोकचिंता अमेरिका और  ईसाई मिशनरियों के हितों की पूर्ति के लिए तो नहीं है? (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार) 

सीपीएम का साम्प्रदायिक चेहरा बेनकाब


                                                       डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री


सीपीएम का व्यक्तित्व शुरू से ही दोहरा रहा है । यह सीपीएम का दोष नहीं है बल्कि उसके हार्ड वेयर का ीतरी दोष ही है । सीपीएम स्वंय का प्रगतिशील और प्रगतिवादी कहता है । उसका मानना है कि प्रगतिवाद के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा सम्प्रदाय अथवा मजहब है । इसलिए जहाँ ी साम्यवादियों की सŸाा आती है तो वे सबसे पहले वहाँ के वििन्न मजहबों अथवा सम्प्रदायों को नष्ट करने का प्रयास करते हैं । माक्र्सवादी ऐसा स्वीकार करते है कि मजहब अथवा सम्प्रदाय के आधार पर व्यक्ति की जो पहचान बनती है  वह प्रगति के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा होती है । इसके विपरीत व्यक्ति की पहचान उसके वर्ग के आधार पर होनी चाहिए । वर्ग की यह पहचान संघर्ष की धार को तेज करती है जिससे प्रगतिवादी समाज की स्थापना होती है ।

ारत के माक्र्सवादी ी मोटे तौर पर इस सिद्वांत को स्वीकार करते हैं  और उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार ी है । ारत की मिट्टी की यही खूबी है कि यहाँ वििन्न विचारधाराओं, और दर्शन शाóों को विकसित होने का पूरा अधिकार है । परन्तु सीपीएम की यह दिक्कत है  िकइस वैचारिक आधार पर वे इस देङ्घा की सŸाा हासिल नहीं कर सकते । यही कारण है कि साम्यवादी आंदोलन सिकुड़ता सिकुड़ता अन्ततः पङ्घिचमी बंगाल और केरल तक सीमित हो गया है । पङ्घिचमी बंगाल में ी कामरेडों के ्रष्टाचार और जनविरोधी आचरण के कारण, उनका दुर्ग हिलने लगा है । केरल में तो पहले ही वे पाॅच साल के अन्तराल के बाद सŸाा में आ पाते हैं । सŸाा प्राप्त करने की हड़बड़ी में सीपीएम ने अब विशुद्व अवसरवादी रास्ता अख्तियार करने का निर्णय कर लिया लगता है । यही कारण है कि सीपीएम लोकसा के होने वाले चुनावों में केरल में मुस्लिम आतंकवादी संस्थाओं के साथ चुनाव समझौता कर रही है । सीपीएम ी जानती है कि यदि कट्रतावादी मुस्लिम संस्थाओं  और आतंकवादी मुस्लिम संगठनों की मदद ली जाती है तो शायद कुछ सीटें तो पार्टी की झोली में आ जायेगी परन्तु उससे देशा को बहुत नुकसान होगा । साम्प्रदायिकता के जहर से राष्ट्ीयता खंडित होती है- ऐसा कामरेड ली ांति जानते हैं  । परन्तु लगता है दिल्ली की सŸाा में अपनी ागीदारी सुनिङ्घिचत करने की सीपीएम को इतनी व्याकुलता है कि वह साम्प्रदायिकता के इस अजगर को साथ लेने से ी गुरेज नहीं कर रही ।

प्रसंग केरल का है । केरल में सीपीएम ने अबदुल निसार मदनी की पीपुल्स डेमोक्रेटिक  पार्टी से चुनावी समझौता किया है । मदनी कोयम्बटुर बम बलास्ट के मुख्य अियुक्त थे । उनके लश्कर और इंडियन मुजाहदीन से गहरे रिङ्घते हैं । वैचारिक स्तर पर उनकी पार्टी मुसलमानों को अलग राष्ट् के रूप में मानती है और वे स्वंय को ारत का विजेता मानने का स्वप्न पालते हैं । मदनी और उनकी पार्टी मानती  है कि मुसलमानों ने ारत को जीता था और इस पर अपना राज्य स्थापित किया था । मुसलमानों से अंग्रेजों ने ारत का राज्य छीन लिया लेकिन दो सौ साल बाद वे यहाँ से जाते समय राज्य ारतीयों को सौंप कर चले गये, मुसलमानों को नहीं । मदनी और उनके अनुयायी अब यह राज्य आतंक और शó बल से प्राप्त करना चाहते हैं । यह अलग बात है कि मदनी और उन जैसे दूसरे लोग ारत पर आक्रमणकारी मुसलमानों की सन्तान नहीं हैं बल्कि वे ारतीयों में से ही परिवर्तित हुए हैं । परन्तु मदनी अपनी पहचान उन आक्रमणकारी मुस्लिम आक्रांताओं से ही जोड़ते है। सीपीएम इसी मदनी से चुनाव में समझौता कर रही है । इससे केरल का सम्पूर्ण राजनैतिक परि॰श्य साम्प्रदायिक विष से विषाक्त हो जायेगा । परन्तु कामरेड तमाम सिद्वांतों को ूल कर साम्प्रदायिकता का वर्जित सेब खाना चाहते है। यह अलग बात है कि यह सेब खाने के बाद वे ारत के स्वर्ग से बाहर धकेल दिये जायेंगे । लेकिन सŸाा के सेब के लालच ने उनकी आॅखों पर पट्टी बांध रखी है ।

ऐसा नहीं कि मदनी और उनकी पार्टी के इस सम्प्रदायिक चेहरे को सीपीएम वाले पहचान नहीं रहे । यहाँ तक कि मदनी से समझौता करने के प्रङ्घन पर सीपीएम के ही कुछ तपे तपाये और सिद्वांतवादी लोग खिन्न चिŸा हैं । केरल के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानन्दन इसका विरोध कर रहे हैं । उन्होंने तो यहाँ तक कहा है कि केरल सरकार मदनी के आतंकवादियों से सम्बन्धों की जाॅच ी करवा रही है । उनका मानना है कि मदनी जैसे साम्प्रदायिक आतंकवादियों से समझौते से सीपीएम की मूल पहचान समाप्त हो जायेगी और वह सŸाा लोलुप राजनैतिक दल के रूप में परिवर्तित हो जायेगी  । परन्तु जैसा की राजनीति में होता है सŸाा के लालच में जब कोई ी राजनैतिक दल अपने सिद्वांत छोड़कर बाजार में निकल आता है तो उसके लिए मर्यादा की सी सीमाएं अपने आप ही समाप्त हो जाती हैं । इसी के चलते सीपीएम ने सबसे पहले ्रष्टाचार और ्रष्टाचारियों से समझौता किया । केरल के सीपीएम के महासचिव विजय पिन्यारी कनाडा की किसी कम्पनी के साथ करोड़ों के घोटाले में संलिप्त पाये गये । प्रदेश के मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन ने इसकी जाॅच ी करवानी चाही , लेकिन सारी पोलित ब्यूरो विजय के साथ खड़ी हो गई । शायद एक कारण यह ी रहा होगा कि विजय की जाॅच के बाद पता नहीं कितने चेहरे बेनकाब हो जायेंगे ।


्रष्टाचार से समझौता करने के बाद दूसरा पड़ाव अब्दुल निसार मदनी की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ समझौते का ही बचता था, जो सीपीएम ने पूरा कर दिखाया है । गाँव की एक कथा है कि मेरा बेटा जुआ तब खेलता है जब शराब पी लेता है । शराब ती पीता है जब मीट खा लेता है और मीट ती खाता है जब उसे वेश्यालय में जाना होता है । वैसे बेटे में कोई दोष नहीं है । लगता है कार्ल माक्र्स के इस ारतीय बेटे की यही दशाा हो रही है । माक्र्स ी सीपीएम के इस साम्प्रदायक चेहरे को देखकर कब्र में अपने बाल नोच रहे होंगे ।

तसलीमा नसरीन की नजरबंदी से बेनकाब हुए अनेक चेहरे:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
तसलीमा नसरीन को दिल्ली में ारत सरकार ने एक प्रकार से सरकार ने उसके घर में ही नजरबंद कर दिया है। वैसे नसरीन के बंगाली ाई विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी इस नजरबंदी की बात को नकार रहे हैं। प्रणव बाबू खुद की नजरबंद रहे हैं या नहीं इसका किसी को ज्यादा ज्ञान नहीं है। लेकिन जो लोग जेल यात्रा करते रहते हैं, उनको पता है कि किसी ऐसी जगह पर किसी को बैठा देना जहां से वह अपनी इच्छानुसार कहीं जा न सकता हो, कोई उसे मिल न सकता हो, अपनी इच्छानुसार वह अपनी बात कह न सकता हो और न ही अपनी इच्छानुसार लिख सकता हो इसी को नजरबंदी कहते हैं। तसलीमा नसरीन बंगाली कन्या है। साम्यवादियों ने, कांग्रेस ने और अंग्रेजों ने मिल-मिलाकर उस बंगाल के बीच में क्या-क्या लकीरें खींच दी । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। संव है कि आगे ी कौन सी नई लकीरें खींच जाएं, इस पर अब अविश्वास नहीं किया जा सकता? परंतु इन लकीरों का खामियाजा तसलीमा नसरीन को ुगतना पड़ रहा है। बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन ने ऐसी गाथाएं लिखनी शुरू कर दी, जिससे वहां रह रहे हिन्दुओं की  अंतरव्यथा ध्वनित होती थी। ारतवर्ष में, जिसमें इस विश्लेषण के लिए बांग्लादेश और पाकिस्तान को ी शामिल किया गया है, कुछ-कुछ ऐसी स्थिति बनती जा रही है कि जो ी हिन्दू की बात करता है, वह तुरंत फायरिंग जोन में आ जाता है। तसलीमा नसरीन बांग्लादेश मंे इसी प्रकार के फायरिंग जोन में फंस गई थी। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि इस फायरिंग जोन में बंदूक सिर्फ कट्टरपंथी चला रहे हैं परंतु तसलीमा के केस को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह बंदूक कट्टरपंथियों के हाथ में ी है और इस क्षेत्र की सरकारों के हाथ में ी। जो हिन्दुओं की बात करता है उसको इन दोनों के ही कोप का ाजक बनना पड़ता है। तसलीमा नसरीन बांग्लादेश से ारत मंे आई थी। दुर्ाग्य से उसने यहां आकर ी इस्लाम के कट्टरपंथी चेहरे को बेनकाब करना नहीं छोड़ा। उसका साहस देखिए कि उसने द्विखंडिता लिख दी। खंडित ारत में द्विखंडिता ! जाहिर था कि जो लोग ारत को 1947 में खंडित करवाने में सफल हो चुके थे उन्होेंने 2007 मंे ी तसलीमा नसरीन को घेर लिया। सीपीएम को नंदीग्राम का ालू नोंच रहा था। इसलिए सीपीएम ने मुस्लिम सांप्रदायिकता से हाथ मिला लिया। इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए और तसलीमा नसरीन को पश्चिमी बंगाल से गा दिया। पूर्वी बंगाल की इस कन्या को न ढाका में सुख है और न कोलकाता में। क्योंकि यह बंग कन्या सत्य बोलती हुई ढाका और कोलकाता की सड़कों पर घूमती रही है। कोलकाता से आते ही उसे दिल्ली सरकार ने पकड़ लिया और उसे घर में नजरबंद कर दिया। इतना ही नहीं यदि उसने जबान खोली तो उसे ‘आर्यवर्त’ की धरती से बाहर कर दिया जाएगा, ऐसी धमकी ी सोनिया गांधी की सरकार ने दे डाली। सीपीएम को नंदीग्राम के ूत से पीछा छुड़ाना था इसलिए उसने मुस्लिम सांप्रदायिकता से समझौता किया और कांग्रेस को गुजरात में मुसलमानों के वोट लेने थे इसलिए उसने इस्लामी कट्टरता से हाथ मिला लिया और दोनों ने मिलकर तसलीमा नसरीन को बीच बाजार में फांसी के तख्ते पर लटका दिया। यह फांसी उसके विचारों की फांसी है। उसकी आस्था की फांसी है। उसके विश्वास की फांसी है।
लेकिन उसके बाद वे सी चेहरे धीरे-धीरे बेनकाब होते गए जो इतने सालों से मानवाधिकारों का मुखौटा पहनकर घूम रहे थे। बडौदा विश्वविद्यालय में देवी-देवताओं का अपमान करने वाले एक छात्र के निलंबन को लेकर जिन लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया था, तसलीमा नसरीन के हश्र को देखकर उनकी जी तालु से चिपक गई। जावेद अख्तर मौन हो गए। शबाना आजमी शायद नमाज़ पढ़ने चली गई हो। तीस्ता सीतलवाड़ तीस्ता नदी की लहरें गिनने में ही व्यस्त हो गई लगती हैं। तारकुंडे के चेले अपनी गुफाओं में छिप गए लगते हैं। राजेन्द्र सच्चर सच को शायद इतना नजदीक देखकर अपने बंगले में छिप गए लगते हैं । मुसलमानों के विकास के लिए विशेष बजट का प्रावधान करने वाले और उनके लिए आरक्षण का ढोल पीटने वाले तसलीमा नसरीन से आँखें चुराकर निकल रहे हैं। सैय्यद शहाबुद्दीन अपने सैय्यद होने की गुरुता मंे ही शायद दब गए लगते हैं। पता कर लिया जाए तसलीमा नसरीन सैय्यद है या नहीं। ये वे चेहरे हैं जो तसलीमा नसरीन के इस प्रकरण में बेनकाब हो गए हैं । परंतु ारत की जनता तसलीमा नसरीन के साथ है क्योंकि न उसने  सीपीएम का नंदीग्राम में पीछा करना छोड़ा है और न ही उसने कांग्रेस की आशाओं के  अनुरूप गुजरात में उसे विजयी ही बनाया है।
तसलीमा नसरीन की इस लड़ाई में वे चेहरे ी बेनकाब हुए हैं जो मजहब परिवर्तन करके बने मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए दिनरात एक कर रहे है। रंगनाथ मिश्रा आयोग के सदस्य मौन है। लोगों के मानवीय अधिकारों की आड़ में राजनीति की रोटियां सेंकने वाले चुप हैं। की ारतेन्द्र हरिश्चन्द्र ने लिखा था-‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न वति।’ शायद मुसलमानों के दुःखों को लेकर काल्पनिक हो-हल्ला मचाने वाले ये वीर इस बात को नहीं समझते कि एक चिंतनशील प्राणी का सबसे बड़ा दुःख तब होता है। जब उसकी आवाज को बंद कर दिया जाए। तसलीमा नसरीन के मामले में ऐसा ही हुआ है और दुर्ाग्य से इस पूरे प्रश्न को सांप्रदायिकता के रंग में देखा जा रहा है। इस देश का यही दुर्ाग्य है कि यहां मानवाधिकार के प्रश्न को ी सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जा रहा है। यहां हिन्दू का दर्द, दर्द नहीं माना जात है और मुसलमान का दर्द ही सही दर्द है। यदि इसी मानसिकता से राज्य चलेगा तो दरारें बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी। 1947 से पहले की अंग्रेज सरकार ी दरारें बढ़ा रही थी और आज की कांग्रेस और सीपीएम की सरकार ी यही धंधा कर रही है। सरकार राज धर्म का पालन नहीं कर रही , लगता है वह इस्लाम धर्म का पालन कर रही है जिसके अनुसार मोमिन की मानसिकता पर उंगली उठाना ही कुफ्र है। तसलीमा नसरीन ने यह कुफ्र किया है और ारत सरकार उसे इस कुफ्र का दंड दे रही है। मुसलमानों को जश्न मनाना चाहिए कि अंततः हिन्दुस्तान दारूल इस्लाम बन गया है। जिसमें कांग्रेस और सीपीएम मौलवी की ूमिका में उतर आए हैं।

और अंत में:- करवाचैथ का दिन था। श्रीमती जी ने तड़के ही उठकर रसोई में खटर-पटर शुरू कर दी। तड़के उठने के कारण वह स्वयं ी दुःखी थी। ऊपर से सारे दिन का व्रत रखना था और पूजा की वह तैयारी कर ही रही थी। पतिदेव की ी नींद टूटी । ब्रह्म मुहूर्त की नींद टूटने से जो कष्ट होता है वह जाहिर है कि पतिदेव को हुआ। उसने गुस्से से पत्नी को कहा-‘यह क्या खट-खट लगा रखी है, सोने ी नहीं देती।’ पत्नी तो पहले ही गुस्से में थी। उसने तुनक कर कहा-‘तुम्हारा ही स्यापा कर रही हूँ।’ पति ने कहा- ‘तब ठीक है, करती रहो।’

दिनांक: 25 दिसंबर 2007, बुधवार


भारत को घेरने का षड़यंत्र:

 डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
गुजरात के दंगों को हुए पाँच साल से ी ज्यादा हो गए हैं और दंगों के घाव धीरे-धीरे रने लगे थे। गुजरात में चर्चा वहां के विकास को लेकर हो रही थी । शायद कुछ अ॰श्य शक्तियों को यह रास नहीं आया। रात के अंधेरे में काले कपड़े पहनकर कैमरा हाथ में लेकर कुछ लोग उन घावों को दोबारा उखाड़ने में लगे हुए हैं, उन शक्तियों के निशाने पर संघ परिवार है । नरेन्द्र मोदी को तो संघ परिवार को अपराधी सिद्ध किए जाने के लिए केवल एक प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। ारत को बांटने के लिए मुसलमान एक सुविधापूर्ण हथियार है और इस देश का दुर्ाग्य ही कहना चाहिए कि मुस्लिम समाज अपने आपको इन अ॰श्य शक्तियों के हाथ हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की इजाजत देता है। अंग्रेजों ने लंबे समय तक इसी हथियार का इस्तेमाल किया और इसी हथियार से ारत को दो फाड़ कर दिया। अब वही शक्तियाँ इसी हथियार को पुनः धारदार बना रही हैं और शायद उसी पुराने उद्देश्य के लिए इसे इस्तेमाल करने की तैयारियाँ हो रही ।

पिछले दिनों एक इलेक्ट्राॅनिक चैनल ने गुजरात दंगों के कुछ पुराने ॰श्य दिखाने शुरू कर दिए और कुछ लोगों के चुने हुए बयान ी प्रसारित करने शुरू कर दिए। शायद इसकी योजना काफी समय पहले से ही बनी होगी। क्योंकि चैनल में ये ॰श्य दिखाई देने के साथ ही देश के कुछ हिस्सों में पूरी तैयारी से मुसलमानों के प्रत्यक्ष प्रदर्शन शुरू हो गए। उसी चैनल ने श्रीनगर हैदराबाद इत्यादि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हुए प्रदर्शनों को इस प्रकार प्रसारित करना शुरू कर दिया मानो सारे देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे ड़क चुके हांे। चैनल के एंकर इस प्रकार की ाषा का प्रयोग कर रहे हैं और उनकी शैली इस प्रकार की है। मानो देश के मुसलमानों को ललकार रहे हों कि ारत में मुसलमानों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं तुम अी तक सोए हुए हो। गलियों में नहीं निकल रहे। दुकानों को आग नहीं लगा रहे। बसों को जला नहीं रहे। और यदि देश में कुछ मुस्लिम बस्तियों में ऐसे प्रदर्शन हो जाते हैं तो चैनल के मुलाजिमों की खुशी देखने लायक होती है। मानो उन्हीं अ॰श्य शक्तियों को रपट दे रहे हो कि सर, दंगा शुरू हो गया।

संघ परिवार को निशाना बनाकर ारत को घेरने की यह कोशिश उसी दिन से शुरू हो गई थी जिस दिन संघ परिवार देश की राजनीति के केन्द्र बिन्दु में आ गया था । अमेरिका की खुफिया ऐजेंसी सी.आई.ए ने तो अपनी वेब साईट पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को बाकायदा हिन्दु उग्रवादी संगठन घोषित कर दिया है । अमेरिका की रणनीति में संघ परिवार को उग्रवादी बताना उसकी ारत को लेकर विषय की राजनीति का स्पष्ट संकेत है । इसी के बाद नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा देने से इन्कार किया गया था। यह केवल वीजा न देने का सामान्य केस नहीं था। बल्कि अमेरिका इसके माध्यम से संघ को उग्रवादी सिद्ध करने के विश्व व्यापी अियान में हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा था। परंतु इन शक्तियों के तमाम प्रयासों के बावजूद नरेन्द्र मोदी की छवि उग्रवादी एवं कट्टरवादी की न बनकर विकास पुरूष के रूप में बन रही थी। नरेन्द्र मोदी की छवि कमोबेश संघ परिवार की छवि से जोड़ कर देखी जाने लगी। एक बार यदि नरेन्द्र मोदी को उग्रवादी सिद्ध करदिया जाता है तो वही निष्कर्ष संघ परिवार पर लादे जा सकते हैं। जब इन शक्तियों की रणनीति असफल होने लगी तो इन शक्तियों की चिंता बढने लगी। नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार की गैर उग्रवादी छवि ारत को अपने शिकंजे में कसने की अमेरिकी रणनीति में सबसे बड़ा रोड़ा सिद्ध हो सकती थी। क्योंकि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को ारतीय राजनीति के केन्द्र में स्थापित करके अमेरिका ने लड़ाई का पहला हिस्सा जीत ही लिया है।

गुजरात विधानसा चुनावों के ऐन पहले एक पत्रकार और इलैक्ट्रानिक चैनल की मिली गत से गुजरात दंगो को स्क्रीन पर पुनः जीवित करने के प्रयासों को इसी पृष्ठ ूमि में देखा जाना चाहिए। क्योंकि यदि रात के अंधेरे में कैमरा लेकर घूमने वाले पत्रकार का उद्धेश्य केवल ‘खोजी पत्रकारिता होता’ तो उसका सहवागी चैनल इस पूरे घटनाक्रम की आड़ में मोदी, विश्व हिन्दु परिषद, ाजपा और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के खिलाफ एक पक्ष के रूप में आंदोलन न छेड़ता। पत्रकारिता धर्म तथ्य का पता लगाना है न कि आंदोलन चलाना। इसलिए पत्रकार और चैनल दोनों की नीयत पर शंका होती है। जो ी शक्तियां इस पूरी रणनीति के पीछे रही होंगी। उनको शायद आशा होगी। या फिर उनका प्रयास ही होगा कि उनके इस कृत्य से देश र में हिन्दुं मुस्लिम दंगे ड़क उठेगंे और संघ परिवार को उग्रवादी सिद्ध करने में यह घटना क्रम प्रर्याप्त सहायता देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ । परंतु इसका अर्थ यह नहीं लिया जाना चाहिए कि गोरी शक्तियों ने अपनी साम्राज्यवादी मानसिकता त्याग दी है या फिर उन्होंने ारत को घेरने की अपनी साजिश को विराम दे दिया है । उनकी संघ परिवार के खिलाफ आगे की रणनीति का एक संकेत इस पूरे तहलका में स्वंय ही दिखाई दिया था। जब दक्षिणी अफ्रिका की ारतीय मूल की एक महिला एन.पिल्लै जो अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय की न्यायाधीश ी हैं, ने कहना शुरू कर दिया कि नरेन्द्र मोदी और विश्व हिन्दु परिषद से जुड़े दूसरे नेताओं पर अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस प्रकार के न्यायालय किन शक्तियों के मोहरे हैं यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। लेकिन जो लोग पिल्लै की इस मांग पर हिजड़ों की तरह तालियां बजा रहे हैं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि कल अमेरिका से कोई ऐसी मांग ी कर सकता है कि दिल्ली में 1984 में पंजाबियों का कत्ले-आम करने वाले अपराधियों पर ी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए। ध्यान रहे अमेरिका इत्यादि शक्तियां ारत को लातीनी देशों जैसा ‘बनाना रिपब्लिक’ बना देना चाहती हैं। संघ परिवार को आपराधिक और उग्रवादी सिद्ध करना उनका पहला कदम है और बाद में शासको को प्रत्येक नीति गत निर्णयों के लिए वाशिंगटन की दौड़ लगवाना दूसरा कदम होगा। परंतु देश का दुर्ाग्य है कि शायद दूसरे कदम के लिए देश के शासक पहले ही तैयार हो चुके हैं अन्यथा दिल्ली मंे अमेरिका के राजदूत डेविड मलफोर्ड खुले आम देश के राजनैतिक नेताओं से मिलकर ारत की राजनीति को अमेरिका के पक्ष में मोड़ने के सफल-असफल प्रयास न करते।


ारत में अमेरिका की मुस्लिम नीति के पहरेदार

ारत में अमेरिका की मुस्लिम नीति के पहरेदार: डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

सच्चर कमेटी ने अपना पूरा दिमाग लड़ाकर एक रपट ारत सरकार को सौंप दी है। यदि इस रपट को स्वीकार कर लिया जाए तो देश के ीतर ही एक नया देश जन्म लेना शुरू कर देगा इसमें कोई शक नहीं है। ारत के इतिहास में पहले ी ऐसा हो चुका है। पाकिस्तान उसी का परिणाम है। उस समय इस प्रसव प्रक्रिया में ब्रिटेन सरकार मुख्य ूमिका में थी और दाई की ूमिका मोहम्मद अली जिन्ना निा रहे थे। इस वक्त लगता हैदाई की यह ूमिका राजेन्द्र सच्चर के जिम्मे आई हैऔर ब्रिटेन की ूमिका सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह निा रहे हैं। लेकिन इस नए प्रयोग से जाहिर हैजच्चा और बच्चा दोनों ही खतरे में पड़ जाएंगे। इतना सहज सरल विश्लेषण तो राजेन्द्र सच्चर और मनमोहन सिंह ी कर ही रहे होंगे  या कम से कम अपने इस नए प्रयोग के दुषपरिणामों से वे अनिज्ञ होंगे, ऐसा नहीं माना जा सकता। जहां तक सोनिया गांधी का प्रश्न है उसको मनमोहन सिंह और राजेन्द्र सच्चर के समकक्ष नहीं रखा जा सकता क्योंकि इस देश के लिए उनके मन में जो योजनाएं होंगी वे इन दोनों की योजनाओं से तो अलग ही होनी चाहिएं, क्योंकि मनमोहन सिंह और राजेन्द्र सच्चर का संस्कारों का धरातल निःसंदेह सोनिया गांधी के संस्कारों के धरातल से अलग है। तब प्रश्न उठता हैकि आखिर मनमोहन सिंह और सच्चर जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वे उनका स्वेच्छा से अख्तियार किया गया रास्ता है या फिर किसी दबाव के अंतर्गत? मनमोहन सिंह कह ही चुके हैं कि इस देश पर मुसलमानों का पहला अधिकार है। इधर यह ी सुनने में आया हैकि बैंकों को ी यह निर्देश दिए जा रहे हैंकि ऋण वितरण में मुसलमानों को प्राथमिकता दी जाए। मजहब के आधार पर आरक्षण के शगूफे को कांग्रेस ने पहले ही उछालना शुरू कर दिया हैऔर अब ारत सरकार ने एक ऐसे आयोग की स्थापना ी कर दी है जो उस इस्लामी समाज में, जिसका आधार ही जाति विहीन समाज की रचना है, दूरबीन लेकर जातियों की तलाश करनी शुरू कर दी है। लेकिन यह ारत सरकार का इस्लामी समाज को लेकर किया जाने वाला समाज शाóीय अध्ययन नहीं हैबल्कि इन धर्मान्तरित मुसलमानों को आरक्षण का ला देने की एक सोची समझी लंबी साजिश है।

इधर राजेन्द्र सच्चर और मनमोहन सिंह मुसलामानों को लेकर एक विशेष ढंग से सक्रिय हैऔर उधर अफजल गुरुओं की पूरी फौज हिन्दुस्तान में तबाही मचाने के लिए कटिबद्ध है। राजेन्द्र सच्चर के ाई-बंधु इस दिशा में पूरी मुस्तैदी से अपनी सक्रियता निा रहे हैं। जब आतंकवादी पुलिस या सेना की गिरफ्त में आ जाते हैंतो राजेन्द्र सच्चर मार्का मानवाधिकारवादियों की पूरी फौज उनकी हिफाजत के लिए आ खड़ी होती है। सेना को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। एक ओर आतंकवादियों की गोलियां हैं और दूसरी ओर मानवाधिकारवादियों के नोटिस हैं। आतंकवादियों के दोनों हाथों में लड्डू हैं। सरकारी तंत्र ने परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से उन्हें इतना विश्वास तो दिला ही दिया हैकि ारत में कोई अफजल गुरु फांसी पर नहीं चढ़ने पाएगा। इस अयदान के बाद आतंकवादी गतिविधियां तेजी से ही बढ़ेगी-इसमें  कोई शक नहीं है। कोढ़ में खाज यह कि ारत सरकार आतंकवाद का मुकाबला पाकिस्तान सरकार के साथ मिलकर करना चाहती है। शायद पाकिस्तान सरकार ी इस मामले में ारत सरकार के साथ पूरा सहयोग कर रही है। इसीलिए उन्होंने पिछले दिनों शाहिद गफ्फूर के नेतृत्व में दिल्ली में यंकर तबाही मचाने का बंदोबस्त कर दिया था। जिस प्रकार मनमोहन सिंह और राजेन्द्र सच्चर मुसलमानों की लाई के नाम पर अनेक मोर्चों पर एक साथ काम कर रहे हैं, उसी प्रकार आतंकवादी ी अपनी योजना के तहत अनेक मोर्चों पर एक साथ ही डटे हुए हैं। हैदर अली का किस्सा सबसे चैंकाने वाला है। कुछ दिन पहले हैदर अली को ारतीय सेना ने गिरफ्तार किया था। वह असम राइफल्स में विद्रोह ड़काने की एक लंबी योजना पर पता नहीं कितने लंबे अरसे से काम कर रहा था। इसके लिए उसने प्रत्यक्ष रूप में बड़े निर्दाेष मुद्दों को चुना था। जवानों की तनख्वाह और अन्य सुविधाओं की आड़ में हैदर अली अर्धसैनिक बलों में विद्रोह की तैयारियां कर रहा था। ऊपर से तुर्राह यह की टीवी का एक चैनल हैदर अली को एक नायक के रूप में प्रस्तुत करने की रसक कोशिश कर रहा था।

इन सारे घटनाक्रमों को देखकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता हैकि जो परि॰श्य और जो धड़कन आम ारतवासियों को सहज ही दिखाई और सुनाई दे जाती है, वह मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राजेन्द्र सच्चर को क्यों नहीं सुनाई देती ? राजेन्द्र सच्चर को इस लिस्ट में से खारिज ी किया जा सकता है क्योंकि हो सकता है उनकी ूमिका सरकारी दरबार में किसी विशिष्ट कार्य को करवाने के लिए बुलाए गए एक विशेषज्ञ मात्र की हो। ऐसी ूमिकाएं हर युग में हर सरकार के दरबार में निाने वाले विशेषज्ञ मिलते ही रहते हैं। परंतु प्रश्न मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का बचता है। इस मरहले पर पश्चिमी बंगाल के पूर्व विŸामंत्री डा. अशोक मित्रा की नई पुस्तक सहसा ही ध्यान आकर्षित करती है। डा. मित्रा ने अपनी पुस्तक में लिखा हैकि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहाराव ने मनमोहन सिंह की विŸामंत्री के तौर पर नियुक्ति अमेरिकी सरकार के दबाव में की थी। मनमोहन सिंह अमेरिका द्वारा पोषित विŸा संस्थानों में कार्य कर ही चुके थे। राजनीति में उनका कोई दखल नहीं था। लेकिन अमेरिका जिन आर्थिक नीतियों को ारत वर्ष में लागू करना चाहता था, मनमोहन सिंह से बेहतर उनको कोई नहीं जानता था। अशोक मित्रा की बात को सहज ही में खारिज नहीं किया जा सकता । वे देश के जाने माने अर्थशाóी हैऔर राष्ट्रीय सरोकारों के चलते उन्होंने ज्योति बसु के मंत्रिमंडल से त्याग पत्र ी दे दिया था।

यदि मनमोहन सिंह को अमेरिका आगे लाया है तो सोनिया गांधी के पीछे कौन है? जो लोग सुब्रहृमण्यम स्वामी की बातों को गंीरता से नहीं लेते उन्हें डा. अशोक मित्रा के मैदान में आ जाने से सारी परिस्थितियों पर पुनः विचार करना ही होगा। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका ने अब ारत के लिए आर्थिक नीति तय करने के साथ-साथ मुस्लिम नीति तय करने का जिम्मा ी संाल लिया है?

(हिन्दुस्थान समाचार)