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Tuesday, 14 January 2014

आने वाले चुनावों में अमेरिका की दिलचस्पी:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 1 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
गुजरात के विधानसा चुनावों को कुल जमा छः महीने बचे हैं। इसलिए आक्रमणों का सारा जोर नरेन्द्र मोदी पर ही रहेगा। सोनिया गांधी ने आॅपरेशन इंडिया का मोटा-मोटा सारा काम लगग निपटा लिया है। गांधी नेहरू परिवार में सोनिया के सिवा अब और कोई नहीं बचा है। मेनका ी इस परिवार से जुड़ी थी लेकिन समय रहते उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया। इसलिए सारी की सारी विरासत सोनिया गांधी के ही हाथों में है। कांग्रेस की बागडोर कांग्रेसियों ने खुद ही सोनिया गांधी के हवाले कर दी थी। जिस प्रकार जाॅर्ज पंचम के दरबार में हाजिरी देने के लिए दिल्ली में देश र के राजा एकत्रित हुए थे उसी तरह राजीव गांधी की रहस्यमयी मौत के बाद कांग्रेसी क्षत्रप सोनिया के दरबार में दूर-दूर से चलकर आ पहुंचे थे। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के बाद सŸाा के समस्त सूत्र अत्यंत चालाकी से संाल लिए। देश के जाने माने अर्थशाóी और की इंदिरा गांधी के आर्थिक सलाहकार रह चुके प्रो. अशोक मित्रा की मानें तो मनमोहन सिंह की नियुक्ति अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने ही की है। इससे यह ी पता चल जाता है कि सŸाा के असील सूत्र कहां है? राष्ट्रपति वन बीच-बीच में सोनिया के साम्राज्य में कांटे की तरह चुता था। कलाम का कोई रोसा नहीं था। वे देश के हितों के प्रश्न पर अपनी बेबाक राय जाहिर करने के लिए मजबूर हो जाते थे। सोनिया और उसके मित्रों ने राष्ट्रपति वन का आॅपरेशन ी सफलतापूर्वक कर दिया है। प्रतिा पाटिल रायसीना हिल्ज़ की मालिक हो गई हैं। राष्ट्रपति बनने पर की ज्ञान जैल सिंह ने कहा था कि इंदिरा गांधी मुझे झाडू लगाने के लिए कहे तो मैं वह ी करने के लिए तैयार हूँ।प्रतिा पाटिल को शायद ऐसा कहने की ी जरूरत नहीं है। ारत और श्रीलंका के बीच जिस तेजी और हड़बड़ी से ऐतिहासिक रामसेतु को तोड़ने का प्रयास सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह कर रहे हैं उससे ारतीयों की ावना को ठेस पहुंचती है-यह इस पूरे प्रकरण का एक पहलू है।असली मुद्दा तो यह है कि रामसेतु के टूटने पर ारत और श्रीलंका के बीच का जल क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय बन जाएगा और अमेरिका की मार हमारी जल सीमा तक हो जाएगी । बाकी जहां तक अमेरिका का अपना प्रश्न है अमेरिका ने पिछले दिनों स्पष्ट कर ही दिया है कि वह पाकिस्तान में सैनिक कार्यवाही ी कर सकता है। क्योंकि बकौल अमेरिका ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है। इसका निर्णय ी अमेरिका खुद ही करता है कि लादेन किस वक्त कहां होना चाहिए। इसलिए हमला करने के लिए देश और स्थान ी अमेरिका खुद ही चुनता है। अमेरिका पाकिस्तान पर हमला करता है या नहीं करता, यह हमारी चिंता का विषय नहीं है। चिंता इस बात की है कि यदि अमेरिका पाकिस्तान में आ जाता है तो उसका अधिकार क्षेत्र बाघा सीमा तक हो जाएगा। खूबसूरती यह है कि अमेरिका अपनी योजना का खुलासा ी करता जा रहा है और कई समझौतों के माध्यम से, जिसमें 123 परमाणु परीक्षा केवल एक समझौता है, ारत के ीतर अपनी दखलअंदाजी  ी बढ़ाता जा रहा है। किस्सा कोताह यह है कि सोनिया गांधी का आॅपरेशन इंडिया मुकम्मल हो गया है। अब उसके रास्ते का केवल एक ही कांटा है। वैसे कायदे से दो कांटे होने चाहिए थे। एक राष्ट्रवादी शक्तियों का मजमुआ संघ परिवार और दूसरा साम्यवादी शक्तियों का मजमुआ साम्यवादी परिवार। लेकिन इस मामले में सोनिया गांधी और अमेरिका दोनों की ही दाद देनी होगी कि जो साम्यवादी परिवार घोषित वैचारिक आधार के कारण अमेरिका रास्ते का कांटा होना चाहिए था, वह सोनिया गांधी और अमेरिका की पालकी का कहार बन गया है।

दूसरा कांटा बचा संघ परिवार, यदि ाजपा को उसकी राजनीतिक अिव्यक्ति मान लिया जाए तो ाजपा इस आॅपरेशन के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा माना जाएगा। ाजपा सरकार ने अपने शुरू के 13 महीने के शासनकाल में परमाणु धमाका करके अमेरिका को चैंका दिया था। शायद अमेरिका को ती लगने लगा होगा कि ारत की सŸाा के सूत्र उसके हाथों से निकल गए है। ाजपा का विरोध तो शायद अब ी बरकरार है परंतु उसकी धार कुंठित हो चुकी है। इसलिए नहीं कि वैचारिक संस्खलन हुआ है बल्कि इसलिए कि ाजपा देश की सŸाा में लंबे अरसे तक स्थाई रूप से बने रहने में सफल नहीं हुई है। राज्यों में उसकी सरकारों का आना जाना शुरू हो गया है। जिस राजनैतिक दल का आना जाना 4-5 साल के ीतर बदलता रहे वह स्थाई रूप से कुछ मौलिक परिवर्तन कर पाएगा, इसमें संदेह होने लगता है। 1977 के बाद से ाजपा वििन्न राज्यों में जिस तेजी से सŸाा संालती है, अगले पाँच सालों में उसी तेजी से बाहर हो जाती है। इसलिए ारत को नियंत्रित करने का सपना देख रही विदेशी शक्तियों को प्रारं में ाजपा से जितना य था वह धीरे-धीरे मिटता गया। नरेन्द्र मोदी ने इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ उपस्थित किया है। नरेन्द्र मोदी निरंतर दो बार विधानसा चुनावों में गुजरात में ाजपा की सरकार बना चुके हैं। अब यदि वे तीसरी बार ी चुनाव जीत जाते हैं तो सोनिया और अमेरिका दोनों को ही स्पष्ट हो जाएगा कि ाजपा का राष्ट्रवादी प्रयोग स्थाई रूप से जड़ जमा चुका है और यदि यह ऐसा ही चलता रहा तो पूरे ारत में एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हो जाएगा। इसलिए आने वाले चुनावों में सोनिया और अमेरिका दोनों के लिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ना बहुत जरूरी है। ऐसा ही एक प्रयोग अमेरिका ने स्वतंत्रता के शुरूआती दौर में ारत के केरल राज्य में किया था। कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को गिराने के लिए अमेरिका ने वहां रूपया ी खर्च किया और हर हथकंडा इस्तेमाल किया। वैसे ी लोकतांत्रिक देशों में अमेरिका सरकारों को कैसे बनाता और गिराता है इसकी एक बानगी सीआईके  के डीक्लासीफाई हो चुके दस्तावेजों को देखने से पता चल जाता है। 1957 के कम्युनिस्ट अमेरिका का विरोध कर रहे थे, लेकिन 2007 तक आते-आते वे उसकी और सोनिया की पालकी में कहार बन गए हैं। वैसे ी साम्यवादी आंदोलन दुनिया र से खत्म हो चुका है। इसलिए ारत के इन साम्यवादी समूहों पर क्रोध नहीं उनके विद्रूप को देखकर दया और हंसी आती है। साम्यवादी देश के कोने में पड़े हैं और उनके ारत में फैलने की अब लगग तमाम संावनाएं चुक गई हैं। वैसे ी अमेरिका अब साम्यवादियों को अपने विरोधी के रूप में नहीं बल्कि सहायक मित्र के रूप में देखता है। ाजपा का मामला ऐसा नहीं है। वह इस देश में एक केन्द्रीय शक्ति बनकर उरी है। गुजरात एक प्रकार से ारत की ावी राजनीति का प्रशिक्षण स्थल बन गया है।  इसलिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ने के लिए इतालवी और अमेरिकी तर्कश में जितने तीर होंगे वे इन छः महीनों में निरंतर चलेंगे। अमेरिका सरकार ने अी पिछले दिनों एक रपट जारी की है। जिससे ारत में अमेरिका की रणनीति का खुलासा होता है और यह ी पता चलता है कि अमेरिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ारत में कितनी दखलअंदाजी करता है। रपट में स्पष्ट कहा गया है कि नरेन्द्र मोदी को वीजा इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि वे ारत में धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे। इतना ही नहीं यह ी कहा गया है कि अमेरिकी कन्सुलेट के अधिकारी मुंबई में उद्योगपतियों, मीडिया के लोगों और अनेक गैर सरकारी संस्थाओं के लोगों से गुजरात के दंगों के परिणामों पर बातचीत करने के लिए मिले थे। ारत में अमेरिकी दूतावास के लोग मदरसों के संचालकों से ी मिले। अमेरिका सरकार ने स्पष्ट कहा है कि अी तक स्कूलों में से राष्ट्रीय ावनाओं वाली पाठ्य-पुस्तकों को हटाया नहीं गया हैं । रपट में इस बात पर चिंता की गई है कि अी ी ारत के कुछ राज्यों में ारतीय जनता पार्टी का राज है। बीजेपी धारा 370 का विरोध करती है। एक समान सिविल कोर्ड की वकालत करती है और सबसे बढ़कर बीजेपी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा है जो धर्मांतरण का विरोध करता है और ईसाइयों और मुसलमानों से ेदाव करता है। रपट में इस बात पर ी दुःख प्रकट किया गया है कि अनेक राज्य धर्मांतरण विरोधी कानून बना रहे हैं और आशा की जा रही है कि सरकार इन्हें रोकेगी। यह रपट अपने आप में आंखें खोलने वाली है। जाहिर है कि अमेरिका के निशाने पर संघ परिवार है क्योंकि उसे लगता है कि संघ परिवार ारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ आंदोलन है। यदि इस लड़ाई में नरेन्द्र मोदी का स्तं गिरा दिया जाए तो जोशुआ प्रोजेक्ट-2 को पूरा होते कितनी देर लगेगी? यहां यह बताना रूचिकर रहेगा कि यह प्रोजेक्ट ारत को ईसाई बनाने के लिए चलाया गया अमेरिकी प्रोजेक्ट है।
अमेरिका इस पूरी लड़ाई में ारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। वह केवल इस्तेमाल ही नहीं कर रहा बल्कि ारत सरकार से ी यह आशा कर रहा है कि वह पाकिस्तान को आतंकवादी देश न माने बल्कि आतंकवाद के खिलाफ हो रही लड़ाई में सहायक देश के रूप में अपना ाई समझे। यह कहने कि सोनिया के नेतृत्व में ारत सरकार अमेरिका की इस परीक्षा में खरी उतर रही है।

ारत सरकार के तथाकथित सुरक्षा सलाहकार के. नारायणन ने स्पष्ट कर दिया है कि ारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पाकिस्तान के साथ मिलकर लड़ेगा। लाल मस्जिद प्रकरण के बाद तो मुशर्रफ का चालीसा पढ़ने वालों की हरकतें देखकर ारत के ाग्य के बारे में सोचकर कंपकंपी होती है। राॅ के पूर्व अधिकारी रमन ने अपनी प्रकाशित होने वाली किताब में खुलासा किया है कि नरसिम्हाराव के काल में ी अमेरिका ने दबाव डाला था कि ारत को पाकिस्तान के  साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन नरसिम्हा राव ने इंकार कर दिया था। मनमोहन सिंह इंकार नहीं कर रहे हैं। वे सब कुछ पाकिस्तान और अमेरिका के साथ मिलकर ही करना चाहते हैं। अमेरिका की इस पूरी साजिश में नरेन्द्र मोदी रूकावट है। यदि अमेरिका नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जंग छेड़ता है तो जाहिर है सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को इसमें अमेरिका का ही साथ देना है। सोनिया गांधी की दृष्टि में परवेज मुशर्रफ ारत का मित्र है और नरेन्द्र मोदी दुश्मन। इस लड़ाई में जहां तक प्रचार का प्रश्न है अमेरिका उसमें पूरी मुस्तैदी से जुड़ा है अमेरिका के अनेक अधिकारिक प्रकाशनों में नरेन्द्र मोदी को ारत में चर्च के प्रसार के लिए बहुत बड़ा कांटा माना गया है। जहां तक नरेन्द्र मोदी के अखाड़े का प्रश्न है सीआईए ने अपनी अधिकारिक वेबसाइट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ारतीय जनता पार्टी को हिन्दू मिलिटेन्ट आॅर्गनाइजेशन घोषित कर रखा है। अमेरिका यह ी कहता है कि जहां ी मिलिटेन्ट तत्व होंगे वहां आक्रमण करने का उसे पूरा अधिकार है । वह इसी तर्क से अफगानिस्तान में घुसा था, इसी तर्क से इराक में घुसा था और इसी तर्क से ईरान में घुसने की घोषणा कर रहा है। ईरान के बाद ारत की बारी ी आ सकती है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों ही अमेरिका की इस रणनीति के हिस्सेदार बनने को तैयार दिखाई देते हैं, क्योंकि वे पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि मिलिटेन्ट ताकतों से लड़ने का विश्वव्यापी अधिकार अमेरिका के पास है।

मीडिया इस पूरी कंपेन में अपना धर्म बखूबी निाएगा ही। बने बनाए निष्कर्ष और अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर किए गए विश्लेषण मीडिया को परोसे जाएंगे और वह पूरी ईमानदारी से प्रयास करेगा कि दर्शक या पाठक उसकी जुगाली करते रहें। इस पृष्ठूमि में हमें गुजरात ाजपा में तथाकथित विद्रोह का विश्लेषण करना होगा। ाजपा के ीतर व्यक्तिगत उचित अनुचित कारणों से दुःखी आत्माओं का रणनीति के तौर पर प्रयोग करने का अियान जो कांग्रेस ने शुरू किया है, वह प्रकारांतर से अमेरिका की उसी लंबी रणनीति का हिस्सा है। विदेशी शक्तियों को मोहरे इस देश में पहले ी उपलब्ध होते रहे हैं और आज ी उपलब्ध हो रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हो रहा है, वह केवल हमारा इम्तिहान है कि क्या हमने इतने सालों की गुलामी से कुछ सीखा है या अी ी आपसी लड़ाईयों में विदेशी शक्तियों को निमंत्रित करने की परंपरा पर चले हुए हैं।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

भारत को घेरने का षड़यंत्र:

 डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
गुजरात के दंगों को हुए पाँच साल से ी ज्यादा हो गए हैं और दंगों के घाव धीरे-धीरे रने लगे थे। गुजरात में चर्चा वहां के विकास को लेकर हो रही थी । शायद कुछ अ॰श्य शक्तियों को यह रास नहीं आया। रात के अंधेरे में काले कपड़े पहनकर कैमरा हाथ में लेकर कुछ लोग उन घावों को दोबारा उखाड़ने में लगे हुए हैं, उन शक्तियों के निशाने पर संघ परिवार है । नरेन्द्र मोदी को तो संघ परिवार को अपराधी सिद्ध किए जाने के लिए केवल एक प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। ारत को बांटने के लिए मुसलमान एक सुविधापूर्ण हथियार है और इस देश का दुर्ाग्य ही कहना चाहिए कि मुस्लिम समाज अपने आपको इन अ॰श्य शक्तियों के हाथ हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की इजाजत देता है। अंग्रेजों ने लंबे समय तक इसी हथियार का इस्तेमाल किया और इसी हथियार से ारत को दो फाड़ कर दिया। अब वही शक्तियाँ इसी हथियार को पुनः धारदार बना रही हैं और शायद उसी पुराने उद्देश्य के लिए इसे इस्तेमाल करने की तैयारियाँ हो रही ।

पिछले दिनों एक इलेक्ट्राॅनिक चैनल ने गुजरात दंगों के कुछ पुराने ॰श्य दिखाने शुरू कर दिए और कुछ लोगों के चुने हुए बयान ी प्रसारित करने शुरू कर दिए। शायद इसकी योजना काफी समय पहले से ही बनी होगी। क्योंकि चैनल में ये ॰श्य दिखाई देने के साथ ही देश के कुछ हिस्सों में पूरी तैयारी से मुसलमानों के प्रत्यक्ष प्रदर्शन शुरू हो गए। उसी चैनल ने श्रीनगर हैदराबाद इत्यादि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हुए प्रदर्शनों को इस प्रकार प्रसारित करना शुरू कर दिया मानो सारे देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे ड़क चुके हांे। चैनल के एंकर इस प्रकार की ाषा का प्रयोग कर रहे हैं और उनकी शैली इस प्रकार की है। मानो देश के मुसलमानों को ललकार रहे हों कि ारत में मुसलमानों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं तुम अी तक सोए हुए हो। गलियों में नहीं निकल रहे। दुकानों को आग नहीं लगा रहे। बसों को जला नहीं रहे। और यदि देश में कुछ मुस्लिम बस्तियों में ऐसे प्रदर्शन हो जाते हैं तो चैनल के मुलाजिमों की खुशी देखने लायक होती है। मानो उन्हीं अ॰श्य शक्तियों को रपट दे रहे हो कि सर, दंगा शुरू हो गया।

संघ परिवार को निशाना बनाकर ारत को घेरने की यह कोशिश उसी दिन से शुरू हो गई थी जिस दिन संघ परिवार देश की राजनीति के केन्द्र बिन्दु में आ गया था । अमेरिका की खुफिया ऐजेंसी सी.आई.ए ने तो अपनी वेब साईट पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को बाकायदा हिन्दु उग्रवादी संगठन घोषित कर दिया है । अमेरिका की रणनीति में संघ परिवार को उग्रवादी बताना उसकी ारत को लेकर विषय की राजनीति का स्पष्ट संकेत है । इसी के बाद नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा देने से इन्कार किया गया था। यह केवल वीजा न देने का सामान्य केस नहीं था। बल्कि अमेरिका इसके माध्यम से संघ को उग्रवादी सिद्ध करने के विश्व व्यापी अियान में हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा था। परंतु इन शक्तियों के तमाम प्रयासों के बावजूद नरेन्द्र मोदी की छवि उग्रवादी एवं कट्टरवादी की न बनकर विकास पुरूष के रूप में बन रही थी। नरेन्द्र मोदी की छवि कमोबेश संघ परिवार की छवि से जोड़ कर देखी जाने लगी। एक बार यदि नरेन्द्र मोदी को उग्रवादी सिद्ध करदिया जाता है तो वही निष्कर्ष संघ परिवार पर लादे जा सकते हैं। जब इन शक्तियों की रणनीति असफल होने लगी तो इन शक्तियों की चिंता बढने लगी। नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार की गैर उग्रवादी छवि ारत को अपने शिकंजे में कसने की अमेरिकी रणनीति में सबसे बड़ा रोड़ा सिद्ध हो सकती थी। क्योंकि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को ारतीय राजनीति के केन्द्र में स्थापित करके अमेरिका ने लड़ाई का पहला हिस्सा जीत ही लिया है।

गुजरात विधानसा चुनावों के ऐन पहले एक पत्रकार और इलैक्ट्रानिक चैनल की मिली गत से गुजरात दंगो को स्क्रीन पर पुनः जीवित करने के प्रयासों को इसी पृष्ठ ूमि में देखा जाना चाहिए। क्योंकि यदि रात के अंधेरे में कैमरा लेकर घूमने वाले पत्रकार का उद्धेश्य केवल खोजी पत्रकारिता होतातो उसका सहवागी चैनल इस पूरे घटनाक्रम की आड़ में मोदी, विश्व हिन्दु परिषद, ाजपा और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के खिलाफ एक पक्ष के रूप में आंदोलन न छेड़ता। पत्रकारिता धर्म तथ्य का पता लगाना है न कि आंदोलन चलाना। इसलिए पत्रकार और चैनल दोनों की नीयत पर शंका होती है। जो ी शक्तियां इस पूरी रणनीति के पीछे रही होंगी। उनको शायद आशा होगी। या फिर उनका प्रयास ही होगा कि उनके इस कृत्य से देश र में हिन्दुं मुस्लिम दंगे ड़क उठेगंे और संघ परिवार को उग्रवादी सिद्ध करने में यह घटना क्रम प्रर्याप्त सहायता देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ । परंतु इसका अर्थ यह नहीं लिया जाना चाहिए कि गोरी शक्तियों ने अपनी साम्राज्यवादी मानसिकता त्याग दी है या फिर उन्होंने ारत को घेरने की अपनी साजिश को विराम दे दिया है । उनकी संघ परिवार के खिलाफ आगे की रणनीति का एक संकेत इस पूरे तहलका में स्वंय ही दिखाई दिया था। जब दक्षिणी अफ्रिका की ारतीय मूल की एक महिला एन.पिल्लै जो अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय की न्यायाधीश ी हैं, ने कहना शुरू कर दिया कि नरेन्द्र मोदी और विश्व हिन्दु परिषद से जुड़े दूसरे नेताओं पर अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस प्रकार के न्यायालय किन शक्तियों के मोहरे हैं यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। लेकिन जो लोग पिल्लै की इस मांग पर हिजड़ों की तरह तालियां बजा रहे हैं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि कल अमेरिका से कोई ऐसी मांग ी कर सकता है कि दिल्ली में 1984 में पंजाबियों का कत्ले-आम करने वाले अपराधियों पर ी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए। ध्यान रहे अमेरिका इत्यादि शक्तियां ारत को लातीनी देशों जैसा बनाना रिपब्लिकबना देना चाहती हैं। संघ परिवार को आपराधिक और उग्रवादी सिद्ध करना उनका पहला कदम है और बाद में शासको को प्रत्येक नीति गत निर्णयों के लिए वाशिंगटन की दौड़ लगवाना दूसरा कदम होगा। परंतु देश का दुर्ाग्य है कि शायद दूसरे कदम के लिए देश के शासक पहले ही तैयार हो चुके हैं अन्यथा दिल्ली मंे अमेरिका के राजदूत डेविड मलफोर्ड खुले आम देश के राजनैतिक नेताओं से मिलकर ारत की राजनीति को अमेरिका के पक्ष में मोड़ने के सफल-असफल प्रयास न करते।


मुसलमानों की संवाद रचना बनी कांग्रेस की आंख की किरकिरी:

 डाः कुलदीप चंद अग्निहोत्री 

केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने संघ को बदनाम करने की अियान को अपनी कार्यसूची मंे प्राथमिक स्थान दे दिया है ।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक और कांग्रेस की विचार िन्नता जगजाहिर है । कांग्रेस ारत का सांस्कृतिक और आर्थिक विकास ब्रिटिश शासकों द्वारा निर्धारित कारकों और मानदण्डों के आधार पर करना चाहती है जबकि संघ इस देश की सांस्कृतिक विरासत , अस्मिता , स्वाव , प्रकृति के अनुसार देश को आगे ले जाना चाहती है । कांग्रेस के वैचरिक माॅडल का सबसे बडा नुकसान यह है इिससे देश तरक्की तो कर सकता है लेनिक उसी पहचान मिट जाएगी । डाॅ. मोहम्मद इकबाल जिस यूनान, मिस्र, और रोम के मिटने की बात कह रहे हैं उसमंे हिन्दुस्थान  का नाम ी जुड जाएगा । संघ के वैचारिक माॅडल की खूबसूरती यह है कि इससे  देश में विकास ी होगा और उसकी पहचान  ी कायम रहेगी । साम्यवादी टोला कांग्रेस के आर्थिक माॅडल से तो असहमत है लेकिन सांस्कृतिक क्षेत्र में कांग्रेस के वैचारिक माॅडल को ह ीवह सर्वश्रेश्ठ मानता है । इसमें कहीं न कहीं ीतर से कांग्रेस एवं साम्यवादी आपस में जुडे रहते हैं । ष्

इस पृष्ठूमि  में मुसलमान या इस्लामपंथी विवाद का मुद्दा बन जाते हैं । कांग्रेस एवं साम्यवादियों की ॰ष्टि मंे इस देश के मुसलमान एक अलग राष्टृ है , इसलिए उनको सावधानीपूर्वक इस देश की छूत से बचाना यह टोला जरुरी मानता है । साम्यवादी यह बात खुलकर कहते हैं और कांग्रेस इसे अपने व्यवहार से सिद्ध करती है । इस वैचारिक अवधारणा के आधार पर ये दोनों देश के मुसलमानों को अलग-थलग करके स्वयं को उनके रक्षक की ूमिका में उपस्थित करते हैं । जाहिर है इस ूमिका में रहने पर दम् ी आएगा । अतः ये दोनों दल मुसलमानों के तुष्टीकरण की ओर चल पडते हैं । चूकि इस देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है इसलिए मुसलमानों को यदि बहुसंख्यक ारतीयों में डराए रखा जाएगा जो जाहिर है  िकवे अपने वोट ी एकमुश्त  उन्हीं की झोली में डालेंगे । अब लोकतांत्रिक मंें प्रणाली ज्यों-ज्यों  सŸाा के दावेदार बढ रहे है त्यो -त्यों  मुसलमानों के रक्षक होने का दावा करने वालों की संख्या ी बढती जा रही है । लालू यादव , मुलायम सिह यादव और रामविलास पासवानों का इस क्षेत्र में प्रवेश लेटर स्टेज पर हुआ है । परन्तु जो देर से आएगा वो यकीनन हो हल्ला ज्यादा मचाएगा । इसलिए मुसलमानों की रक्षा करने के लिए इन देर से आए रक्षकों के तेवर ी उतने ही तीखे हैं ।

इधर जब पिछल पाचं -छह दशकों में दन सी ने मुसलमानों के दिमाग में यह डाल दिया है कि मामला सिर्फ उनकी रक्षा का है और बाकी चीजें तो गौण है तो उनमें से ी कुछ संगठन उठ आए हैं जिन्होंने यह कहना शुरु कर दिया ह ैअब हमें बाहरी रक्षकों की जरुरत नहीं है हम अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं । सुरक्षा का काल्पनिक य कांग्रेस एवं कम्युनिस्टों ने मुसलमानों के मन में बैठा दिया था और सŸाा में ागीदारी का आसान रास्ता देखकर इन मुस्लिम संगठनों  ने ी हाथ में हथियार उठा लिए । यह तक सब ठीक -ठाक  चल रहा था केवल मुस्लिम वोटों पर छापेमारी का  प्रष्न था जिसके हिस्से जितना आ जाय उतना ही सही ।

इस मोड पर स्क्रिप्ट में अचानक कुछ गडबड होने लगी । कांग्रेस एवं कम्युनिस्ट जिन लोगों से मुसलमानों को डरा रहे थे उन्ही लोगों ने मुसलमानों से बिना दलालों एवं एजेंटों की सदस्यता से सीधे -सीधे संवाद रचना शुरु कर दी । 1975 की आपात स्थिति में राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ और मुसलमानों के बीच जो संवाद रचना नेताओं के स्तर पर प्रारम् हुई थी उसे इक्कीसवीं शताब्दी के शुरु में संघ के एक प्रचारक इन्द्रेश कुमार आम मुसलमान तक खीचं ले गए । ऐसे एक प्रयास की महात्मा गांधी ने किया था लेकिन वह प्रयास खिलाफत के माध्यम से हुआ था जो वस्तुतः इस देश के मुसलमानों की राष्ट्रीय ावना को कही न कही खण्डित करता था । इसलिए इसका असफल होना निश्चित ही था ।जो इक्का -दुक्का प्रयास दूसरे प्रयास हुए लेकिन उनका उद्देश्य  तात्कालिक लाों के लिए तुष्टीकरण ही ज्यादा था ।
इन्द्रेश कुमार ने  संघ के धरातल पर मुसलमानों से जो सवांद रचना प्रारम् की  उसका उद्देश्य ा न तो राजनीतिक था औैर न ही तात्कालिक ला उठाना । चूंकि राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ को चुनाव नही लडना था । इन्द्रेश कुमार की संवाद रचना से जो हिन्दू मुसलमानों का व्यास आसन निर्मित हुआ । वह इसे देश का वही सांस्कृतिक आसन है जिसके कारण लाखों सालों से इस देश की पहचान बनी हुई है । इस संवाद रचना में  स्वयं मुसलमानों ने आगे आकर कहना शुरु किया कि हमारे पुरखे हिंदू थे और उकनी जो सांस्कृतिक थाती थी वही सांस्कृतिक थाती हमारी ी है । इन संवाद रचनाओं में इन्द्रेश कुमार का एका वाक्य बहुत प्रसिद्ध हुआ कि हम सिजदा तो मक्का की ओर करेंगे लेकिन गर्दन कटेगी तो ारत के लिए कटेगी । देखते ही देखते इस संवाद की अंतर्लहरें देश र में फैली और मुसलमानों की युवा पीढी में एक नई सुगबुगाहट प्रारम् हो गयी । वे धीरे -धीरे उस चहारदीवारी से निकलकर जिस उनके तथाकथित रक्षकों ने पिछले 60 सालों से यत्नपूर्वक निर्मित किया था , खुली हवा में सांस लेने के लिए आने लगे । इन्द्रेश कुमार की  मुसलमानों से इसे संवाद रचना ने देखते ही देखते मुस्लिम राष्ट्रीय मंचका आकार ग्रहण कर लिया जाहिर है मुसलमानों के ीतर संघ की इस पहल से कांग्रेसी खेमे एवं साम्यवादी टोले में हडबडी मचती । जिसे संघ के बारे में आज तक मुसलमानों को यह कहकर डराया जाता रहा कि उनको सबसे ज्यादा खतरा संघ से है उस संघ को लेकर मुसलमानों का ्रम छंटने लगा । यह स्पष्ट होने लगा कि संघ मुसलमानों के खिलाफ नहीं है  । संघ ारत की इस विशेषता में पूर्ण विश्वास रचना है कि ईष्वर की पूजा  करने के हजारों तरीके हो सकते हैं और वास्तव में संघ इसी विचार की आगे बढाना चाहता है जब संघ ईश्वर या अल्लाह के हजारों तरीक में विश्वास करते है तो उसे कुछ लोगों द्वारा इस्लामी तरीके से ईश्वर की पूजा के तरीके से ला कैसे ऐतराज हो सकता था । संघ को लेकर मुसलमानों के ीतर कोहरा छंटने की प्रारम्िक प्रक्रिया शुरु हो गयी है ।

इस मरहले पर कांग्रेस ने अपनी रणनीति बडी होशियारी से तय की । मालेगांव , हैदराबाद और अजमेर बम विस्फोट में सरकार ने कुछ तथाकथित षडयंत्रकारियों को गिरफ्तार किया इनमें जिन लोगों के नाम शामिल है उनमें से कुछ का सम्बंध की संघ से ी रहा होगा । उनका अपराध है या नहीं है इसका निर्णय तो अदालत ही करेगी लेकिन सराकार को लगता था कि जैसे ही इन तथाकथित लोगों की जांच होगी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इन लोगों के पीछे हो हल्ला मचाएगा लेकिन कांग्रेस का यह षडयंत्र तब विफल हो गया जब राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ ने कहा कि सरकार को इस मामले की सफाई से जांच करनी  चाहिए औश्र जो ी दोषी जाया जाए उसे दण्ड मिलना चाहिए । संघ ने आधिकारिक रुप से यह ी कहा  िकवह जांच एजेंसियों को संगठन का पूरा सहयोग मिलेगा । संघ स्वयं चाहता है कि अपराधी पकडे जाएं और उन्हें सजा मिले । संघ को बदनाम करने का कांग्रेस का सारा षडयंत्र एक झटके में ही विफल हो गया । सरकार एक तीर से दो निशाने करना चाहती थी । वह मुसलमानों को यह संदेश देना चाहती थी कि आतंकवाद को लेकर मुस्लिम समाज जिस कटघरो में खडा दिखायी देता है उससे उन्हें यीत होने की जरुरत नहीं है । उनकी मानसिक संतुष्टि के लिए सरकार हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा को स्थापित कर रही थी जिसे बाद में पी चिदम्बरम में कांग्रेस की रणनीति के अनुसर गवा आतंकवाद कहना प्रारम् कर दिया । इससे मुसलमानों में कांग्रेस के रक्षक होने का ्रम ी बना रहता और  हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा के प्रचलन से आतंकवाद के मनौवैज्ञानिक अपराधिक बोध के ाव से ी मुक्ति मिलती । दूसरे संघ को  मुसलमानों की ॰ष्टि में एक बार फिर अपराधी सिद्ध किया जा सकता था लेकिन संघ ारत सरकार और कांग्रेस के बिछाए गए इस जाल में ी नहीं फंसा और  उसने स्पष्ट ही यह मांग की ईमानदारी से जांच के बाद अपराधियोें के दण्ड दिया जाएग । कारण ी स्पष्ट था संघ न कोई ूमिगत संगठन है और न ही उद्देश्य  की प्राप्ति के लिए आतंकवाद में विश्वास करता है । आतंकवाद कायारों का ही हथियार होता है और वैचारिक नपुंसकता वाले संगठन ही इसका उपयोग करते हैं । संघ एक सांस्कृतिक आंदोलन है । आतंकवाद से सांस्कृतिक आदोलनों को उर्जा नहीं मिलती बल्कि उसके ऊर्जा स्त्रोत सूखने लगते हैं । आतंकवाद से तानाशाही और एकाधिकारवादी प्रवृŸिायांे को ी बढावा  मिलता है । कांग्रेस एवं कम्युनिस्ट टोले में यह प्रवृŸिायां पायी जाती हैं । इतिहास इसका गवाह है । यही कारण है कि कांग्रेस एंव कम्युनिस्ट आतंकवाद से लडने के बजाय उसे अप्रत्यक्ष समर्थन देते हैं ।

अपनी इन्हीं प्रवृत्यिों के काण कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ को बदनाम करने के लिए, मुसलमानों के मन में उसका य पुनः सृजित करने के लिए दूसरी व्यूह रचना की । इस बार जांच एजेंसियों के माध्यम से इन्द्रेश कुमार का नाम जोड दिया गया । सरकार जानती थी आठ सौ पृष्ठों की जांच रिपोर्ट में एकाध बार संघ  और इन्द्रेश  कुमार का नाम आ जाने से  मीडिया  के एक वर्ग को मनमाफिक मसाला मिल जाएगा और संघ और इन्द्रेश कुमार की आतंकवाद में संलिप्तता की मसाालेदार कहानियां इधर -उधर तैरने लगेंगी । कहानी का अंत क्या होगा इसकी न कांग्रेस को चिंता है और न सरकार को । लेकिन इस बीच जब मीडिया से संघ  एवं इन्द्रेश कुमार का नाम उछलेगा  तो मुसलमानों के मन में संघ को लेकर ्रम पैछा हो सकेगा और आम ारतीय ी संघ को लेकर प्रष्न खडा कर सकता है । इसी रणनीति के तहत सरकार अजमेर बम विस्फोट के मामले में सुनियोजित प्रयास कर रही है । संघ और इन्द्रेश कुमार के नाम का उपयोग कर रही ह। । जबकि  लगग आठ सौ पृष्ठों  की जांच रिपोर्ट  मंे संगठन के नाते संघ और व्यक्ति के नामे इन्द्रेश कुमार पर कोई आरोप नहीं हैं ।
लेकिन जांच एजेंसी का उद्देश्य सत्य की तह तक पहुचना नही है बिल्क उसका नाटक करते हुए संघ को बदनाम करना है । इन्द्रेश कुमार का नाम लेने से कांग्रेस एक और फायदे की सम्ावना देखती है । उसे लगता है कि इन्द्रेश के नाम पर विवाद पैदा करने  से मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का जो सांस्कृतिक  आसन निर्मित हुआ है उसमें दरारें पड सकती है । संघ को बदनाम करने की ारत सरकार के ठन सी प्रयासों का यदि नामकरण करना हो तो उसे सरकारी आतंकवाद कहा जा सकता है । लेकिन कांग्रेस औ सरकार अपने इस  प्रयास में सफल नहीं होंगे । पंजाब के इतिहास में ी मन्नू का उद्धरण सामने आता है । इस विदेशी आका्रंता ने पंजाबियों पर अमानुषिक अत्याचार किए , उन्हें   मौत के घाट उतारा । तब पंजाब  में एक लाोक उक्ति प्रसिद्ध हुई -
मन्नू असाडी दातरी , असी मन्नू दे सोये ।
ज्यूं -ज्यूं मन्ने बड्ढ दा , असी दूणे चैणे होए ।

सोया सरसो की जाति का एक पौधा होता है  उसे जितना काटा जाता है वह उतना ही फलता फूलता है । इसी तरह मन्नू पंजाबियों को जैसे मारता काटता था वैसे -वैसे उनका उत्साह बढता , वे फलते -फूलते ।

सरकार ज्यों -ज्यों  संघ पर प्रहार करगी त्यो -त्यों संघ फलेगा -फूलेगा । यह ारतीय इतिहास की परम्परा है । लेकिन दुर्ाग्य से साम्यवादियों का ारतीय इतिहास से कुछ लेना -देना नहीं है और कांग्रेस धीरे -धीरे ारतीय इतिहास से कटती जा रही है । सरकार द्वारा संघ पर किया गया यह प्रहार ारतीय परम्परा पर किया गया प्रहार है और ारतीय परम्परा इस प्रहार को निष्प्रावी कर देगी ।