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Tuesday, 14 January 2014

आने वाले चुनावों में अमेरिका की दिलचस्पी:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 1 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
गुजरात के विधानसा चुनावों को कुल जमा छः महीने बचे हैं। इसलिए आक्रमणों का सारा जोर नरेन्द्र मोदी पर ही रहेगा। सोनिया गांधी ने आॅपरेशन इंडिया का मोटा-मोटा सारा काम लगग निपटा लिया है। गांधी नेहरू परिवार में सोनिया के सिवा अब और कोई नहीं बचा है। मेनका ी इस परिवार से जुड़ी थी लेकिन समय रहते उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया। इसलिए सारी की सारी विरासत सोनिया गांधी के ही हाथों में है। कांग्रेस की बागडोर कांग्रेसियों ने खुद ही सोनिया गांधी के हवाले कर दी थी। जिस प्रकार जाॅर्ज पंचम के दरबार में हाजिरी देने के लिए दिल्ली में देश र के राजा एकत्रित हुए थे उसी तरह राजीव गांधी की रहस्यमयी मौत के बाद कांग्रेसी क्षत्रप सोनिया के दरबार में दूर-दूर से चलकर आ पहुंचे थे। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के बाद सŸाा के समस्त सूत्र अत्यंत चालाकी से संाल लिए। देश के जाने माने अर्थशाóी और की इंदिरा गांधी के आर्थिक सलाहकार रह चुके प्रो. अशोक मित्रा की मानें तो मनमोहन सिंह की नियुक्ति अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने ही की है। इससे यह ी पता चल जाता है कि सŸाा के असील सूत्र कहां है? राष्ट्रपति वन बीच-बीच में सोनिया के साम्राज्य में कांटे की तरह चुता था। कलाम का कोई रोसा नहीं था। वे देश के हितों के प्रश्न पर अपनी बेबाक राय जाहिर करने के लिए मजबूर हो जाते थे। सोनिया और उसके मित्रों ने राष्ट्रपति वन का आॅपरेशन ी सफलतापूर्वक कर दिया है। प्रतिा पाटिल रायसीना हिल्ज़ की मालिक हो गई हैं। राष्ट्रपति बनने पर की ज्ञान जैल सिंह ने कहा था कि ‘इंदिरा गांधी मुझे झाडू लगाने के लिए कहे तो मैं वह ी करने के लिए तैयार हूँ।’ प्रतिा पाटिल को शायद ऐसा कहने की ी जरूरत नहीं है। ारत और श्रीलंका के बीच जिस तेजी और हड़बड़ी से ऐतिहासिक रामसेतु को तोड़ने का प्रयास सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह कर रहे हैं उससे ारतीयों की ावना को ठेस पहुंचती है-यह इस पूरे प्रकरण का एक पहलू है।असली मुद्दा तो यह है कि रामसेतु के टूटने पर ारत और श्रीलंका के बीच का जल क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय बन जाएगा और अमेरिका की मार हमारी जल सीमा तक हो जाएगी । बाकी जहां तक अमेरिका का अपना प्रश्न है अमेरिका ने पिछले दिनों स्पष्ट कर ही दिया है कि वह पाकिस्तान में सैनिक कार्यवाही ी कर सकता है। क्योंकि बकौल अमेरिका ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है। इसका निर्णय ी अमेरिका खुद ही करता है कि लादेन किस वक्त कहां होना चाहिए। इसलिए हमला करने के लिए देश और स्थान ी अमेरिका खुद ही चुनता है। अमेरिका पाकिस्तान पर हमला करता है या नहीं करता, यह हमारी चिंता का विषय नहीं है। चिंता इस बात की है कि यदि अमेरिका पाकिस्तान में आ जाता है तो उसका अधिकार क्षेत्र बाघा सीमा तक हो जाएगा। खूबसूरती यह है कि अमेरिका अपनी योजना का खुलासा ी करता जा रहा है और कई समझौतों के माध्यम से, जिसमें 123 परमाणु परीक्षा केवल एक समझौता है, ारत के ीतर अपनी दखलअंदाजी  ी बढ़ाता जा रहा है। किस्सा कोताह यह है कि सोनिया गांधी का आॅपरेशन इंडिया मुकम्मल हो गया है। अब उसके रास्ते का केवल एक ही कांटा है। वैसे कायदे से दो कांटे होने चाहिए थे। एक राष्ट्रवादी शक्तियों का मजमुआ संघ परिवार और दूसरा साम्यवादी शक्तियों का मजमुआ साम्यवादी परिवार। लेकिन इस मामले में सोनिया गांधी और अमेरिका दोनों की ही दाद देनी होगी कि जो साम्यवादी परिवार घोषित वैचारिक आधार के कारण अमेरिका रास्ते का कांटा होना चाहिए था, वह सोनिया गांधी और अमेरिका की पालकी का कहार बन गया है।

दूसरा कांटा बचा संघ परिवार, यदि ाजपा को उसकी राजनीतिक अिव्यक्ति मान लिया जाए तो ाजपा इस आॅपरेशन के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा माना जाएगा। ाजपा सरकार ने अपने शुरू के 13 महीने के शासनकाल में परमाणु धमाका करके अमेरिका को चैंका दिया था। शायद अमेरिका को ती लगने लगा होगा कि ारत की सŸाा के सूत्र उसके हाथों से निकल गए है। ाजपा का विरोध तो शायद अब ी बरकरार है परंतु उसकी धार कुंठित हो चुकी है। इसलिए नहीं कि वैचारिक संस्खलन हुआ है बल्कि इसलिए कि ाजपा देश की सŸाा में लंबे अरसे तक स्थाई रूप से बने रहने में सफल नहीं हुई है। राज्यों में उसकी सरकारों का आना जाना शुरू हो गया है। जिस राजनैतिक दल का आना जाना 4-5 साल के ीतर बदलता रहे वह स्थाई रूप से कुछ मौलिक परिवर्तन कर पाएगा, इसमें संदेह होने लगता है। 1977 के बाद से ाजपा वििन्न राज्यों में जिस तेजी से सŸाा संालती है, अगले पाँच सालों में उसी तेजी से बाहर हो जाती है। इसलिए ारत को नियंत्रित करने का सपना देख रही विदेशी शक्तियों को प्रारं में ाजपा से जितना य था वह धीरे-धीरे मिटता गया। नरेन्द्र मोदी ने इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ उपस्थित किया है। नरेन्द्र मोदी निरंतर दो बार विधानसा चुनावों में गुजरात में ाजपा की सरकार बना चुके हैं। अब यदि वे तीसरी बार ी चुनाव जीत जाते हैं तो सोनिया और अमेरिका दोनों को ही स्पष्ट हो जाएगा कि ाजपा का राष्ट्रवादी प्रयोग स्थाई रूप से जड़ जमा चुका है और यदि यह ऐसा ही चलता रहा तो पूरे ारत में एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हो जाएगा। इसलिए आने वाले चुनावों में सोनिया और अमेरिका दोनों के लिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ना बहुत जरूरी है। ऐसा ही एक प्रयोग अमेरिका ने स्वतंत्रता के शुरूआती दौर में ारत के केरल राज्य में किया था। कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को गिराने के लिए अमेरिका ने वहां रूपया ी खर्च किया और हर हथकंडा इस्तेमाल किया। वैसे ी लोकतांत्रिक देशों में अमेरिका सरकारों को कैसे बनाता और गिराता है इसकी एक बानगी सीआईके  के डीक्लासीफाई हो चुके दस्तावेजों को देखने से पता चल जाता है। 1957 के कम्युनिस्ट अमेरिका का विरोध कर रहे थे, लेकिन 2007 तक आते-आते वे उसकी और सोनिया की पालकी में कहार बन गए हैं। वैसे ी साम्यवादी आंदोलन दुनिया र से खत्म हो चुका है। इसलिए ारत के इन साम्यवादी समूहों पर क्रोध नहीं उनके विद्रूप को देखकर दया और हंसी आती है। साम्यवादी देश के कोने में पड़े हैं और उनके ारत में फैलने की अब लगग तमाम संावनाएं चुक गई हैं। वैसे ी अमेरिका अब साम्यवादियों को अपने विरोधी के रूप में नहीं बल्कि सहायक मित्र के रूप में देखता है। ाजपा का मामला ऐसा नहीं है। वह इस देश में एक केन्द्रीय शक्ति बनकर उरी है। गुजरात एक प्रकार से ारत की ावी राजनीति का प्रशिक्षण स्थल बन गया है।  इसलिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ने के लिए इतालवी और अमेरिकी तर्कश में जितने तीर होंगे वे इन छः महीनों में निरंतर चलेंगे। अमेरिका सरकार ने अी पिछले दिनों एक रपट जारी की है। जिससे ारत में अमेरिका की रणनीति का खुलासा होता है और यह ी पता चलता है कि अमेरिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ारत में कितनी दखलअंदाजी करता है। रपट में स्पष्ट कहा गया है कि नरेन्द्र मोदी को वीजा इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि वे ारत में धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे। इतना ही नहीं यह ी कहा गया है कि अमेरिकी कन्सुलेट के अधिकारी मुंबई में उद्योगपतियों, मीडिया के लोगों और अनेक गैर सरकारी संस्थाओं के लोगों से गुजरात के दंगों के परिणामों पर बातचीत करने के लिए मिले थे। ारत में अमेरिकी दूतावास के लोग मदरसों के संचालकों से ी मिले। अमेरिका सरकार ने स्पष्ट कहा है कि अी तक स्कूलों में से राष्ट्रीय ावनाओं वाली पाठ्य-पुस्तकों को हटाया नहीं गया हैं । रपट में इस बात पर चिंता की गई है कि अी ी ारत के कुछ राज्यों में ारतीय जनता पार्टी का राज है। बीजेपी धारा 370 का विरोध करती है। एक समान सिविल कोर्ड की वकालत करती है और सबसे बढ़कर बीजेपी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा है जो धर्मांतरण का विरोध करता है और ईसाइयों और मुसलमानों से ेदाव करता है। रपट में इस बात पर ी दुःख प्रकट किया गया है कि अनेक राज्य धर्मांतरण विरोधी कानून बना रहे हैं और आशा की जा रही है कि सरकार इन्हें रोकेगी। यह रपट अपने आप में आंखें खोलने वाली है। जाहिर है कि अमेरिका के निशाने पर संघ परिवार है क्योंकि उसे लगता है कि संघ परिवार ारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ आंदोलन है। यदि इस लड़ाई में नरेन्द्र मोदी का स्तं गिरा दिया जाए तो जोशुआ प्रोजेक्ट-2 को पूरा होते कितनी देर लगेगी? यहां यह बताना रूचिकर रहेगा कि यह प्रोजेक्ट ारत को ईसाई बनाने के लिए चलाया गया अमेरिकी प्रोजेक्ट है।
अमेरिका इस पूरी लड़ाई में ारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। वह केवल इस्तेमाल ही नहीं कर रहा बल्कि ारत सरकार से ी यह आशा कर रहा है कि वह पाकिस्तान को आतंकवादी देश न माने बल्कि आतंकवाद के खिलाफ हो रही लड़ाई में सहायक देश के रूप में अपना ाई समझे। यह कहने कि सोनिया के नेतृत्व में ारत सरकार अमेरिका की इस परीक्षा में खरी उतर रही है।

ारत सरकार के तथाकथित सुरक्षा सलाहकार के. नारायणन ने स्पष्ट कर दिया है कि ारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पाकिस्तान के साथ मिलकर लड़ेगा। लाल मस्जिद प्रकरण के बाद तो मुशर्रफ का चालीसा पढ़ने वालों की हरकतें देखकर ारत के ाग्य के बारे में सोचकर कंपकंपी होती है। राॅ के पूर्व अधिकारी रमन ने अपनी प्रकाशित होने वाली किताब में खुलासा किया है कि नरसिम्हाराव के काल में ी अमेरिका ने दबाव डाला था कि ारत को पाकिस्तान के  साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन नरसिम्हा राव ने इंकार कर दिया था। मनमोहन सिंह इंकार नहीं कर रहे हैं। वे सब कुछ पाकिस्तान और अमेरिका के साथ मिलकर ही करना चाहते हैं। अमेरिका की इस पूरी साजिश में नरेन्द्र मोदी रूकावट है। यदि अमेरिका नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जंग छेड़ता है तो जाहिर है सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को इसमें अमेरिका का ही साथ देना है। सोनिया गांधी की दृष्टि में परवेज मुशर्रफ ारत का मित्र है और नरेन्द्र मोदी दुश्मन। इस लड़ाई में जहां तक प्रचार का प्रश्न है अमेरिका उसमें पूरी मुस्तैदी से जुड़ा है अमेरिका के अनेक अधिकारिक प्रकाशनों में नरेन्द्र मोदी को ारत में चर्च के प्रसार के लिए बहुत बड़ा कांटा माना गया है। जहां तक नरेन्द्र मोदी के अखाड़े का प्रश्न है सीआईए ने अपनी अधिकारिक वेबसाइट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ारतीय जनता पार्टी को हिन्दू मिलिटेन्ट आॅर्गनाइजेशन घोषित कर रखा है। अमेरिका यह ी कहता है कि जहां ी मिलिटेन्ट तत्व होंगे वहां आक्रमण करने का उसे पूरा अधिकार है । वह इसी तर्क से अफगानिस्तान में घुसा था, इसी तर्क से इराक में घुसा था और इसी तर्क से ईरान में घुसने की घोषणा कर रहा है। ईरान के बाद ारत की बारी ी आ सकती है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों ही अमेरिका की इस रणनीति के हिस्सेदार बनने को तैयार दिखाई देते हैं, क्योंकि वे पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि मिलिटेन्ट ताकतों से लड़ने का विश्वव्यापी अधिकार अमेरिका के पास है।

मीडिया इस पूरी कंपेन में अपना धर्म बखूबी निाएगा ही। बने बनाए निष्कर्ष और अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर किए गए विश्लेषण मीडिया को परोसे जाएंगे और वह पूरी ईमानदारी से प्रयास करेगा कि दर्शक या पाठक उसकी जुगाली करते रहें। इस पृष्ठूमि में हमें गुजरात ाजपा में तथाकथित विद्रोह का विश्लेषण करना होगा। ाजपा के ीतर व्यक्तिगत उचित अनुचित कारणों से दुःखी आत्माओं का रणनीति के तौर पर प्रयोग करने का अियान जो कांग्रेस ने शुरू किया है, वह प्रकारांतर से अमेरिका की उसी लंबी रणनीति का हिस्सा है। विदेशी शक्तियों को मोहरे इस देश में पहले ी उपलब्ध होते रहे हैं और आज ी उपलब्ध हो रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हो रहा है, वह केवल हमारा इम्तिहान है कि क्या हमने इतने सालों की गुलामी से कुछ सीखा है या अी ी आपसी लड़ाईयों में विदेशी शक्तियों को निमंत्रित करने की परंपरा पर चले हुए हैं।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

भारत का अमेरिका के साथ आणविक करार:

 डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 20 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
ारत और अमेरिका में हुए आणविक करार में प्रधानमंत्री मनमोहन की स्थिति कितनी दयनीय है और इसमें ारतीय हितों की किस प्रकार से बली चढ़ाई गई है यह इससे सिद्ध होने लगा है कि सोनिया गांधी मनमोहन सिंह को अब इस समझौते की वकालत के लिए लक्ष्मीमलसिंघवी को  मैदान में उतारना पड़ा है। ऐसा नहीं है कि सोनिया व मनमोहन सिंह के पास समझौते का समर्थन करने के लिए अपने वकील नहीं थे। कपिल देव सिब्बल से लेकर पी. चिदंबरम तक वकीलों की फौज खड़ी है। परंतु लगता है सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह दोनों समझ गए हैं कि समझौते का ताना-बाना नंगा हो जाने के कारण जो स्थितियाँ बन गई हैं उसके लिए सिंघवी जैसे लोगों की सहायता की ी जरूरत है। सिंघवी ने पिछले दिनों अखबारों में एक लेख लिखकर समझौते की वकालत ही नहीं की बल्कि वामपंथी दलों एवं ाजपा पर कीचड़ ी उछाला है। अब इसे मनमोहन सिंह का दुर्ाग्य ही कहना चाहिए कि सिंघवी ने इस समझौते के पक्ष में बहुत मेहनत करके जो तर्क जुटाए हैं वे इस समझौते की पोल ही खोलते हैंऔर सरकार चला रहे शीर्ष पुरूषों को कटघरे में ज्यादा खड़ा कर रहे हैं। सिंघवी ने यह स्वीकार कर लिया है कि ारत के वैज्ञानिकों की इस समझौते को लेकर अनेक आशंकाएं हैं। उसके बाद सिंघवी प्रधानमंत्री की पीठ थपथपाना शुरू कर देते हैं और यह घोषणा करते हैं कि 18 जुलाई 2005 को प्रधानमंत्री ने उन सी आशंकाओं को दूर कर दिया था । सिंघवी यह नहीं बताते कि प्रधानमंत्री ने ये आशंकाएं किस प्रकार दूर कीं क्योंकि परमाणु शोध से जुड़े हुए ारतीय वैज्ञानिक तो अी तक सिर पीट रहे हैं कि इस समझौते से आगे के शोध कार्य पर रोक लग जाएगी। सिंघवी ये मानते हैं कि ारतीय वैज्ञानिकों की आशंकाओं में दम है। लेकिन उसके बाद वे स्वयं को केवल इतना कहकर संतुष्ट कर लेते हैं कि उनकी सब आपŸिायाँ दूर कर दी गईं हैं।
लेकिन सिंघवी को इस बात के लिए बधाई देनी होगी कि उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि यह समझौता राष्ट्रपति बुश के मनमोहन सिंह के साथ व्यक्तिगत संबंधों के कारण ही संव हो सका है। दुर्ाग्य से ारत के लोगों को ी यही आशंका है कि बुश के साथ इन व्यक्तिगत संबंधों के कारण ही मनमोहन सिंह ने ारतीय हितों को बलि दे दी और अमेरिका के हितों का ध्यान रखा । वैसे बंगाल के ूतपूर्व विŸामंत्री और जाने-माने अर्थशाóी प्रो0 अशोक मित्रा जो मनमोहन सिंह के मित्र ी है, कुछ अरसा पहले ही अपनी एक बांग्ला पुस्तक में इस बात का खुलासा कर चुके हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की  पूर्व में विŸामंत्री के पद पर नियुक्ति ही अमेरिका के कहने पर हुई थी। एहसान का ार बहुत दूर तक जाता है।
लेकिन सिंघवी की वकालत का असल चमत्कार कुछ दूसरा है। अमेरिका पिछले कुछ सालों से खासकर सोवियत रूस के पतन के बाद और सीटीबीटी, एनपीटी और डब्ल्यूटीओ जैसी शरारतों के बाद दुनिया र के देशों को यह पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहा है कि अब किसी देश कि पूर्ण संप्रुŸाा के दिन समाप्त हो गए हैं। सारी दुनिया एक गाँव बनती जा रही है इसलिए देशों को अपनी संप्रुŸाा के मामले पर समझौते करने होंगे। अप्रत्यक्ष अिप्राय कुछ-कुछ ऐसा है कि दुनिया के देशों को अपनी संप्रुŸाा का कुछ हिस्सा अमेरिका के पास गिरवी रखना होगा। सीटीबीटी, एनपीटी और डब्ल्यूटीओ जैसे जाल उस संप्रुŸाा को गिरवी रखने के अमेरिकी षड्यंत्र ही कहे जाने चाहिए। ारत अब तक अमेरिका के आगे झुकने से इंकार करता रहा है। लेकिन अब वह सहर्ष अमेरिका के आगे अपनी संप्रुŸाा को गिरवी रखने के लिए तैयार हो गया है। यह समझौता उसी दिशा में पहला घातक कदम है। कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि अमेरिका ने ारत में इस समय का धैर्य से इंतजार किया है। लेकिन वे अंधेरे में है। अमेरिका ने इंतजार नहीं किया बल्कि अमेरिका ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के हाथों में ारत को देने की परिस्थितियों का स्वयं निर्माण किया है और यह परमाणु समझौता अमेरिका के इस परिश्रम का स्वाविक फल है। लक्ष्मीमल सिंघवी ी अमेरिका के इसी तर्क का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि अब दुनिया के देशों को संप्रुŸाा की बढ़ी-चढ़ी ावना के स्वािमान में नहीं बहते रहना चाहिए। संप्रुŸाा का अर्थ अलगाव नहीं है और हर समझौते में लेनदेन होता ही है। लेकिन इसके आगे सिंघवी चुप हो जाते हैं। उन्होंने अंग्रेजी में एक शब्द ‘‘गिव एंड टेक’’ प्रयुक्त किया है यदि वह अपनी वकालत में यह ी खुलासा कर देते कि इस परमाणु समझौते में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह का अमेरिका के साथ क्या ‘गिव एंड टेक’ हुआ है तो शायद ारत के हितों की ज्यादा रक्षा होती । लेकिन सिंघवी ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि तब अमेरिका के हितों पर चोट पहुंचती। सिंघवी को सबसे ज्यादा गुस्सा ारतीय जनता पार्टी पर है। सिंघवी का तर्क है कि कामरेड तो समझौते का विरोध कर रहे हैं, यह उन्हें समझ में आ रहा है, परंतु ारतीय जनता पार्टी अमेरिका से हुए इस समझौते का विरोध क्यों कर रही है? यह सिंघवी की जिज्ञासा नहीं है। यह उनका गुस्सा है और वे गुस्से में घोषणा कर रहे हैं कि यह विरोध करके ाजपा बहुत ही गलत कार्य कर रही है। ाजपा पर बुश को ी गुस्सा आ रहा है। ाजपा पर सोनिया गांधी को ी गुस्सा आ रहा है और अब ाजपा पर लक्ष्मीमलसिंघवी को ी गुस्सा आ रहा है। सिंघवी का यह गुस्सा पिछले कुछ सालों तक शाकाहारी रहकर नए-नए बने मांसाहारी का गुस्सा है । इन तीनों के गुस्से से यह सिद्ध होता है कि ारतीय जनता पार्टी ठीक रास्ते पर चल रही है और यह समझौता देश के हितों के विपरीत है। क्या लक्ष्मीमलसिंघवी को इससे आगे ी कुछ कहना है?

( नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

मनमोहन सिंह की तरफदारी में उतरे है नौकरशाह:

 डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
अमेरिका से अी हाल ही में हुए आणविक करार को लेकर बहस चल रही है। कुछ राजनैतिक दल इसके पक्ष में हैं और कुछ इसके खिलाफ हैं । सब के अपने अपने तर्क हैं । अपनी अपनी दलीलंे हैं । मनमोहन सिह ही तरफदारी करने के लिए कांग्रेस के अनेकों दिग्गज राजनीतिज्ञ डटे हुए हैं । यह सारी बहस समझ में आने वाली है। परंतु सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को न कांग्रेस के समर्थकों पर रोसा है और न ही राजनीतिज्ञों पर । उन्होंने इस समझौते के समर्थन के लिए अब नौकरशाही को मैदान में उतारा है । सरकारी बाबू मनमोहन सिंह की ढाल बनने का उपक्रम करने लगे हैं। रोनेन सेन नाम के एक नौकरशाह हैं जिनका इस समझौते के समर्थन में एक लम्बा चैडा वक्तव्य अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन से प्रसारित हुआ है। ये सज्जन अमेरिका में ारत के राजदूत हैं। यदि इनके आलेख पर इनका नाम न छपा होता तो कोई ी इसे पढ़ कर शर्त लगा सकता था कि यह अमेरिका के विदेश मंत्री का वक्तव्य है। इस वक्तव्य में जिस निर्लज्जता और ढीठता से इस करारनामे की वकालत की गई है और ारतीयों को गालियां निकाली गईं हैं, वह केवल अमेरिका का प्रतिनिधि ही कर सकता था। इतना ही नहीं जहां ारत और ारतीयों के लिए गालियों की बौछार है वहीं अमेरिका की प्रशंसा के पुल बांध दिए गए हैं। यदि रोनेन नाम के इस सज्जन ने करार की पक्षदारी तर्क के आधार पर ी की होती तो क्षम्य हो सकती थी परंतु तर्क की बजाए सेन ने गलियों और बाजार की गालियों का सहारा लिया है ।

परंतु ारत के इतिहास में यह नई घटना नहीं है । पिछली सदी के पांचवे और छठे दशक में चीन में ारत के राजदूत श्री पणिक्कर ी अपने वक्त में चीन के हितों की ज्यादा रक्षा करते थे और ारत के हितों को ठेंगा दिखाते थे। इतना ही नहीं वे दिल्ली द्वारा पीकिंग को ेजे गए पत्रों में चीनी हितों की रक्षा के लिए फेर बदल ी कर देते थे। उन पर आरोप था कि ारत सरकार ने चीन को तिब्बत के बारे में जो पत्र लिखा था उसमें इंदराज था कि तिब्बत पर चीन का अधिराज्यत्व है। पणिक्कर ने अधिराज्य को काटकर सार्वौमिकता कर दिया था। उसकी इन्हीं हरकतों से दु,खी होकर सरदार पटेल ने कहा था पणिक्कर ारत के नहीं बल्कि चीन के राजदूत हैं। रोनेन सेन का किस्सा ी पणिक्कर को ही दोहराता है।

लेकिन रोनेन सेन के इस आलेख से यह बात अत्यंत स्पष्ट हो जाती है कि इस समझौते के लिए परदे के पीछे सोनिया गांधी मनमोहन सिह और अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश के बीच काफी लम्बे अर्से से खिचडी पक रही थी जिससे सम्पूर्ण ारत को अंधेरे में रखा गया। रोनेन सेन को शायद इसी लिए मनमोहन सिंह की सरकार ने शुरू में ही वाशिंगटन रवाना कर दिया था ताकि वह इस करार के लिए ूमिका तैयार कर सके। वाशिंगटन में बैठ कर सेन ारतीयों के लिए तृतीय पुरूष का प्रयोग करता है। वह ारतीयों को मानों ललकार रहा हो कि तुम्हंे इस समझौते की समझ ी है क्या? अमेरिका ने तुम लागों के लिए इतना किया है और तुम लोग एहसान फरामोश हो । ाव कुछ कुछ ऐसा है मानो इस समझौते के कारण ारतीयों को अमेरिका के पैर धो कर पीने चाहिए । रोनेन सेन का वक्तव्य ारत के सम्मान पर कलंक ही नहीं है बल्कि उसके स्वािमान को चुनौती ी । सेन वाशिंगटन में बैठ कर हुंकार र रहे हैं कि आखिर नई दिल्ली में यह क्या ड्रामा हो रहा है? हमने सुना था कि अमेरिका में जाकर ारतीय राजदूत झुकना सीख लेते हैं लेकिन अब शायद सोनिया मनमोहन सिंह की जोड़ी ने उन्हें रेंगने का आदेश ी दे दिया है। सेन की ाषा अजीबोगरीब है। वे मानों वाशिंगटन में बैठ कर ारत को चेतावनी दे रहे हैं कि जार्जबुश के राष्ट्रपति रहते हुए इस समझौते का क्रियान्वयन हो जाना चाहिए। उनकी दृष्टि में जार्ज बुश से बडा ारत का कोई मित्र नहीं है । वे कहते है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ी यही मानते है। सिंह और सेन की यह जोड़ी शायद ूल गई हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति जिस देश का मित्र बन जाता है उस देश की तो रात की नींद हराम हो जानी चाहिए। पाकिस्तान अमेरिका का मित्र देश है धीरे धीरे अमेरिका ने उसकी गर्दन ही दबोच ली है। अमेरिका के राष्ट्रपति इराक के ी सबसे बडे मित्र थे लेकिन आज उसकी दुर्दशा सबके सामने है।

रोनेन सेन की गाली गलौज और उसका प्रलाप यहीं नहीं रूकता। ारत में यह मांग की जा रही है कि ारत अमेरिका परमाणु संबंधों को लेकर अमेरिका द्वारा पारित हाइड अधिनियम पर ी पुनर्विचार होना चाहिए क्योंकि इसी अधिनियम के माध्यम से अमेरिका ारत के हाथ पाँव बांधने की तैयारी कर रहा है। यहां पर रोनेन सेन का क्रोध देखने लायक है। उनका कहना है कि तुम हाईड एक्ट में संशोधन की बात करते हो? इसको तो अब छुआ तक ी नहीं जा सकता क्योंकि इस पर राष्ट्रपति बुश के हस्ताक्षर हो चुके हैं । फिर वे चेतावनी देते हैं यदि ारत इस अधिनियम पर पुनर्विचार की कोशिश करता है तो उसकी विश्वसनीयता शून्य डिग्री तक पहुंच जाएगी । यदि यह करारनामा लागू न हुआ तो इसके नतीजे बहुत खतरनाक हांेंगे। इसके बाद रोनेन सेन की मानसिकता झलकती है। रोनेन सिंह के अनुसार इस समझौते से अमेरिका में इतना उत्साह है कि अमेरिका की बडी-बडी कम्पनियों के सी.ई.ओ हिन्दुस्तान की ओर ागे आ रहे हैं। अमेरिका के संसद के सदस्य, विश्वविद्यालयों के कुलपति, और तो और डेल्टा और कान्टिनेन्टल जैसी एअरलाइन हिन्दुस्तान में आ रही है। लगता है रोनेेन सेन इन सब से सचमुच ही अिूत हैं। खुशी के मारे उनके पैर धरती पर नहीं पड रहे । उनको ारतीयों पर गुस्सा आ रहा है । अरे ! च्यूंटी के घर नारायण आए हैं और तुम वंदनवार सजाने की बजाए आलोचना कर रहे हो?

मनमोहन सिंह और रानेने सेन दोनों नौकर शाह रहे हैं । ारत के बारे में ब्रिटिश परंपर में ढली इस नौकर शाही की सोच क्या है? यह रोनेन सेन के इस आलेख से स्पष्ट हो गया है। ारत अमेरिका परमाणु करार इसी मानसिकता से उपजा हुआ करार है । इसलिए वह अमेरिका के हितों की रक्षा तो कर सकता है ारत के हितों की नहीं। 

यदि रोनेन सेन द्वारा प्रयुक्त घटिया ाषा का ही प्रयोग करना हो तो एक आम ारतीय की ओर से यह टिप्पणी प्रर्याप्त होगी । जार्ज पंचम के आगे दिल्ली में नाचते हुए राजाओं के बारे में सुना था । इंग्लैण्ड की महारानी की ओर से सूबेदारों की तरह काम करते हुए काली ारतीय नौकरशाही को   कोर्निश करते हुए देखा नहीं था, केवल सुना था । आज जार्ज बुश जुनियर के आगे ांडों की तरह नाचते हुए रोनेन सेन को देख कर समझ आ रहा है कि ारत इतने लंबे अर्से तक गुलाम क्यों रहा ?

पिछले दिनों उडिया ाषा के एक चैनल में लोकसा के पूर्व अध्यक्ष वयोवृद्ध रविराय कह रहे थे कि हम आत्मसम्मान खोते जा रहे हैं और फिर गुलामी की ओर बढते जा रहे हैं। तब विश्वास नहीं होता था। अब रोनेन सेन का आचरण देख कर सचमुच आशंका हो रही है ।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचारद्ध


सोनिया और करात दोनों ही कर रहे हैं अमेरीकी लीला

- डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
दिनांक: 18 अक्टूबर 2007
स्थान: नई दिल्ली

सीपीएम के महासचिव  प्रकाश करात ने सोनिया गांधी को एक महत्वपूर्ण प्रश्न किया है । करात के अनुसार यदि ारतीय जनता पार्टी एनडीए सरकार को बचाने के लिए अपना हिन्दुत्व का मुद्दा छोड सकती है तो सोनिया गांधी यूपीए सरकार को बचाने के लिए अमेरिका के साथ कि या गया परमाणु समझौता क्यों नहीं छोड सकती  यह प्रश्न अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है । इससे ी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रकाश करात इसका उŸार जानते हुए ी अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं । लेकिन इस बात के लिए तो करात को धन्यवाद दिया ही जा सकता है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि एनडीए सरकार में ारतीय जनता पार्टी का कोई छुपा हुआ एजेंडा नहीं था । आज तक करात की टोली यह आरोप लगाती रही है कि ारतीय जनता पार्टी एऩडीए की  ढाल के पीछे अपना हिन्दुत्व का एजेंडा लागू कर रही है और एनड ीए सरकार क्यों टूटनी चाहिेए  इसका सबसे बडा कारण प्रकाश करात के साथी ाजपा के इसी हिन्दू एजेंडा को बताते थे । जब प्रकाश करात एंड कंपनी ने सोनिया गांधी की सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा की तब ी उन्होंने इसका मुख्य कारण यही बताया था कि यदि सोनिया गांधी की सरकार न बनी तो एनडीए की सरकार बन जाएगी जिसका अर्थ होगा ाजपा का छिपा हुआ हिन्दुत्व एजेंडा ।
अब प्रकाश करात स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि ाजपा ने एनडीए राज में अपना हिन्दुत्व का एजेंडा स्थगित कर दिया था। तब एक प्रश्न करात से ही पूछा जा सकता है यदि ऐसा उन्हें पता था तो उनकी पार्टी ने सोनिया गांधी की सरकार बनाने में सहायता क्यों की ? यदि प्रकाश करात अपने दिल के ीतर झांक कर ईंमानदारी से इस प्रश्न का उŸार दे देते हैं तो उन्हें उस प्रश्न का उŸार ी अपने आप ही मिल जाएगा जो वे इस समय़ सोनिया गांधी से कर रहे हैं । इस देश का सबसे बडा दुर्ाग्य यह है कि सीपीएम के लोगों ने सोनिया गांधी की इतिहास के उस मोड पर सहायता की जब अमेरिका सोनिया गांधी को ारत में स्थापित करने की अपनी महत्वपूर्ण रणनीति पर काम कर रहा था । ऐसा एक अवसर पहले ी आया था । जब सोनिया गांधी और उसके पीछे छिपे हुए एजेंडा पर काम कर रहे रणनीतिकारों ने 1999 में यह कोशिश की थी कि सोनिया गांधी का इस देश पर कब्जा हो जाए , इसके लिए सोनिया गांधी इतना आगे बढ गई कि  उन्होंने कैमरों के सामने खडे हो कर बिना कि सी संकोच के झूठ बोल दिया कि  उन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए लोक सा में बांछित बहुमत हासिल है । देश को इस बात के लिए मुलायम सिंह का आारी होना पडेगा कि उन्होेंने अत्यंत साहसपूर्वक देश पर कब्जा करने के इस षडयंत्र को असफल कर दिया । यदि मुलायम सिंह ऐसा न करते तो शायद उसी वक्त देश के सŸाा सूत्र पर सोनिया गांधी और उसके छिपे हुए रणनीतिकारों का कब्जा हो जाता । तब शायद सोनिया गांधी की सरकार उसी समय सीटीबीटी तथा एनपीटी पर हस्ताक्षर कर देती । तब श़ायद अमेरिका को आगे की लंबी रणनीति न बनानी पडती । परंतु मुलायम सिंह ने अमेरिका के सारे खेल को अपनी जमीनी बुद्धिमता से पराजित किया ।
अमेरिका ने उसी समय ारत के लिए अपनी रणनीति को बदल लिया था और यह ी निर्णय कर लिया लगता है कि वह ारत को किसी न किसी ढंग से अपना उपनिवेश बना कर ही छोडेगा । ऐसा अवसर 2004 में पुनः उपस्थित हुआ ़। इस वक्त मुलायम सिंह पर किसी ने दाँव नहीं लगाया और सीधा सीधा सोनिया गांधी ने सीपीएम से ही बात की । सीपीएम ने ी सोनिया गांधी को इतनी सहजता से समर्थन दिया कि लगता है कि परदे के पीछे काफी समय से दोनों की खिचडी पक रही थी । अब यह खिचडी इसी परमाणु समझैते के रुप में बाहर आयी है । देश जानता है कि इस  परमाणु समझौते से ारत को अमेरिका का बंधक बनाया जा रहा है । अप्रत्यक्ष रुप से अब अमेरिका ही ारत की नीतियां तय करेगा । ारत को किस देश से दोस्ती रखनी है और किस देश से नहीं इसका फैसला ी अमेरिका ही करेगा । संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी प्रस्ताव पर ारत को किस पक्ष में वोट देना है और किसके विरोेध में इसका फैसला ी अमेरिका ही करेगा । अमेरिका ने इतनी रुचि लेकर जिस उद्देश्य से ारत वर्ष के लिए सोनिया गांधी को मजबूत किया है उसकी पूर्ति में एक हिस्सा सीपीएम का ी बनता है । अब इस बात का उŸार को प्रकाश करात को ही देना होगा कि यह ूमिका उन्होंने जान बूझ कर निाई  या फिर अनजाने में । रहा प्रश्न यह कि सोनिया गांधी सरकार बचाने के लिए  परमाणु करार को क्यों नहीं छोड देती ?़। प्रकाश करात अच्छी तरह जानते हैं कि परमाणु करार को पूरा करने के लिए ही यह सरकार बनाई गई है ।़ इसको बनाने वालों ने जो जिम्मेदारी इस सरकार पर सौंपी थी यह सरकार उसे पूरा करने में पूरी इमानदारी से जुटी है । प्रकाश करात इतने ोले नहीं है कि वे अमेरिका की मंशा को नहीं जानते । इसके विपरीत प्रकाश करात और उनकी पार्टी का दावा तो यह है कि अमेरिका की मंशा को सबसे ज्यादा वही जानते हैं । इसलिए इस देश को अमेरिका के आगे गिरबी रखने की जितनी जिम्मेदारी सोनिया गांधी पर आती है उससे कहीं ज्यादा सीपीएम पर आती है जिसने उस ऐतिहासिक क्षण में अमेरिका की रणनीति में ागीदारी निाई । अलबŸाा इतना जरुर है कि आने वाले चुनावों में करात और उनके साथी अपने पापों को बुरके में छुपाएंगे और लोगों को धोखा देने के लिए अमेरिका को गालियां देते रहेंगे । रहा प्रश्न सोनिया गांधी का , उन्हें यह पाखंड करने की जरुरत ी नहीं है क्योंकि परमाणु करार के मुद्दे में कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका के हितों में ही ारत क ा हित है ।

धर्म परिवर्तन को रोकने वाले बिलों की शामत - 
छŸाीसगढ विधानसा ने पिछले दिनों धन, बल, य या धोखे से धर्मपरिवर्तन को रोकने वाला एक बिल विधानसा में पारित किया था । बिल पारित होने के बाद हस्ताक्षर के लिए राज्यपाल के पास गया । लेकिन सी को आश्चर्य  हुआ जब राज्य पाल ने उस पर हस्ताक्षर करने के बजाए उस पर ारत सरकार के विधि विशेषज्ञों की राय मांग ली । इससे पहले ऐसा किस्सा राजस्थान में ी हो चुका है । ऐसा ही बिल राजस्थान विधानसा ने पारित कि या था । लेकिन राज्यपाल ने उस पर अपनी आपŸिायां लगा कर उसे वापस विधानसा को ेज दिया था । विधानसा ने उसे पुनः पारित कर हस्ताक्षर के लिए राज्यपाल के पास ेजा । राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर करने के बजाए उसे राष्ट्पति की राय के लिए ेज दिया । राजस्थान की उस समय की राज्यपाल प्रतिा पाटिल अब खुद ही राष्ट्रपति बन गई हैं । इसलिए उनकी राय क्या है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है । ऐसा ही किस्सा गुजरात में हुआ है । यहां की विधानसा ने गलत तरीके से किये गये धर्मपरिवर्तन पर  रोक लगाने के लिए गुजरात अधिनियम में कुछ संशोधन पारित किये थे। राज्यपाल ने उस अधिमियम पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया । सी जानते हैं कि पिछले  10-15 सालों में ईसाई मिशनरियों व गैरसरकारी संस्थाओं को अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों से करोडों रुपये मिल रहे हैं और बडी तेजी से धर्म परिवर्तन हुआ है । ऐसा समय में राज्यपालों का यह व्यवहार संदेह उत्पन्न करता है । अंदर के स्रोतों का कहना है कि जबसे पोप ने ारत के राजदूत को धर्म परिवर्तन रोकने के लिए वििन्न विधान साओं में पारित किये जा रहे बिलों को लेकर सार्वजनिक रुप से फटकार लगाई है तब से सोनिया गांधी ने संकेतों में ही राज्यपालों को समझा दिया है । या फिर राज्यपाल ही इतने होशियार हो गये हैं कि वे बिना कुछ कहे सुने सब समझ गये हैं ।

और अंत में -

देश र में रामलीलाओं का जोर चलने  वाला है और बेचारे कांग्रेसी संकट में फंसे हुए हैं । न रामलीला में जाते बनता है और न बिना जाए रहा जाता है । दिल्ली की कुछ रामलीलाओं में तो पूजा के लिए राम सेतु की रामशिलाएं ी रखी जाने वाली  हैं । रामशिला का नाम ही सुन कर  कांग्रेसी ऐसे ागते हैं मानों सांप पर पैर पड गया हो । पता चला है कि कांग्रेस के ीतर की लडाई ी इस संकट को गहरा कर रही है । दिल्ली क्योंकि सŸाा का केन्द्र है इसलिए उसका संकट और ी गहरा है । आज ज्यों ही रामपूजन शुरु हुआ दिल्ली के  एक बडे कांग्रेसी नेता ी उसमें पहुंच गये । विरोधी ने तुरंत सोनिया गांधी के खेमे में खबर कर दी । इधर रामपूजन करने वाले कांग्रेसी नेता ने ी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं । इस चुगली का शक तो उन्हें पहले ही था । वे ी तुरंत 10 जनपथ पहुंचे और बताया कि रामपूजन बगैरा कुछ नहीं था । बच्चे मेले में मिठाई की जिद्द कर रहे थे । इसलिए उन्हें लेकर चला गया था । जब तक रामलीलाएं चलती रहेगी तब तक इस प्रकार के कांग्रेसी लीला ी होती ही रहेंगी । यही मानना चाहिए ।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)


आने वाले चुनावों में अमेरिका की दिलचस्पी:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
गुजरात के विधानसा चुनावों को कुल जमा छः महीने बचे हैं। इसलिए आक्रमणों का सारा जोर नरेन्द्र मोदी पर ही रहेगा। सोनिया गांधी ने आॅपरेशन इंडिया का मोटा-मोटा सारा काम लगग निपटा लिया है। गांधी नेहरू परिवार में सोनिया के सिवा अब और कोई नहीं बचा है। मेनका ी इस परिवार से जुड़ी थी लेकिन समय रहते उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया। इसलिए सारी की सारी विरासत सोनिया गांधी के ही हाथों में है। कांग्रेस की बागडोर कांग्रेसियों ने खुद ही सोनिया गांधी के हवाले कर दी थी। जिस प्रकार जाॅर्ज पंचम के दरबार में हाजिरी देने के लिए दिल्ली में देश र के राजा एकत्रित हुए थे उसी तरह राजीव गांधी की रहस्यमयी मौत के बाद कांग्रेसी क्षत्रप सोनिया के दरबार में दूर-दूर से चलकर आ पहुंचे थे। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के बाद सŸाा के समस्त सूत्र अत्यंत चालाकी से संाल लिए। देश के जाने माने अर्थशाóी और की इंदिरा गांधी के आर्थिक सलाहकार रह चुके प्रो. अशोक मित्रा की मानें तो मनमोहन सिंह की नियुक्ति अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने ही की है। इससे यह ी पता चल जाता है कि सŸाा के असील सूत्र कहां है? राष्ट्रपति वन बीच-बीच में सोनिया के साम्राज्य में कांटे की तरह चुता था। कलाम का कोई रोसा नहीं था। वे देश के हितों के प्रश्न पर अपनी बेबाक राय जाहिर करने के लिए मजबूर हो जाते थे। सोनिया और उसके मित्रों ने राष्ट्रपति वन का आॅपरेशन ी सफलतापूर्वक कर दिया है। प्रतिा पाटिल रायसीना हिल्ज़ की मालिक हो गई हैं। राष्ट्रपति बनने पर की ज्ञान जैल सिंह ने कहा था कि ‘इंदिरा गांधी मुझे झाडू लगाने के लिए कहे तो मैं वह ी करने के लिए तैयार हूँ।’ प्रतिा पाटिल को शायद ऐसा कहने की ी जरूरत नहीं है। ारत और श्रीलंका के बीच जिस तेजी और हड़बड़ी से ऐतिहासिक रामसेतु को तोड़ने का प्रयास सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह कर रहे हैं उससे ारतीयों की ावना को ठेस पहुंचती है-यह इस पूरे प्रकरण का एक पहलू है।असली मुद्दा तो यह है कि रामसेतु के टूटने पर ारत और श्रीलंका के बीच का जल क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय बन जाएगा और अमेरिका की मार हमारी जल सीमा तक हो जाएगी । बाकी जहां तक अमेरिका का अपना प्रश्न है अमेरिका ने पिछले दिनों स्पष्ट कर ही दिया है कि वह पाकिस्तान में सैनिक कार्यवाही ी कर सकता है। क्योंकि बकौल अमेरिका ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है। इसका निर्णय ी अमेरिका खुद ही करता है कि लादेन किस वक्त कहां होना चाहिए। इसलिए हमला करने के लिए देश और स्थान ी अमेरिका खुद ही चुनता है। अमेरिका पाकिस्तान पर हमला करता है या नहीं करता, यह हमारी चिंता का विषय नहीं है। चिंता इस बात की है कि यदि अमेरिका पाकिस्तान में आ जाता है तो उसका अधिकार क्षेत्र बाघा सीमा तक हो जाएगा। खूबसूरती यह है कि अमेरिका अपनी योजना का खुलासा ी करता जा रहा है और कई समझौतों के माध्यम से, जिसमें 123 परमाणु परीक्षा केवल एक समझौता है, ारत के ीतर अपनी दखलअंदाजी  ी बढ़ाता जा रहा है। किस्सा कोताह यह है कि सोनिया गांधी का आॅपरेशन इंडिया मुकम्मल हो गया है। अब उसके रास्ते का केवल एक ही कांटा है। वैसे कायदे से दो कांटे होने चाहिए थे। एक राष्ट्रवादी शक्तियों का मजमुआ संघ परिवार और दूसरा साम्यवादी शक्तियों का मजमुआ साम्यवादी परिवार। लेकिन इस मामले में सोनिया गांधी और अमेरिका दोनों की ही दाद देनी होगी कि जो साम्यवादी परिवार घोषित वैचारिक आधार के कारण अमेरिका रास्ते का कांटा होना चाहिए था, वह सोनिया गांधी और अमेरिका की पालकी का कहार बन गया है।

दूसरा कांटा बचा संघ परिवार, यदि ाजपा को उसकी राजनीतिक अिव्यक्ति मान लिया जाए तो ाजपा इस आॅपरेशन के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा माना जाएगा। ाजपा सरकार ने अपने शुरू के 13 महीने के शासनकाल में परमाणु धमाका करके अमेरिका को चैंका दिया था। शायद अमेरिका को ती लगने लगा होगा कि ारत की सŸाा के सूत्र उसके हाथों से निकल गए है। ाजपा का विरोध तो शायद अब ी बरकरार है परंतु उसकी धार कुंठित हो चुकी है। इसलिए नहीं कि वैचारिक संस्खलन हुआ है बल्कि इसलिए कि ाजपा देश की सŸाा में लंबे अरसे तक स्थाई रूप से बने रहने में सफल नहीं हुई है। राज्यों में उसकी सरकारों का आना जाना शुरू हो गया है। जिस राजनैतिक दल का आना जाना 4-5 साल के ीतर बदलता रहे वह स्थाई रूप से कुछ मौलिक परिवर्तन कर पाएगा, इसमें संदेह होने लगता है। 1977 के बाद से ाजपा वििन्न राज्यों में जिस तेजी से सŸाा संालती है, अगले पाँच सालों में उसी तेजी से बाहर हो जाती है। इसलिए ारत को नियंत्रित करने का सपना देख रही विदेशी शक्तियों को प्रारं में ाजपा से जितना य था वह धीरे-धीरे मिटता गया। नरेन्द्र मोदी ने इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ उपस्थित किया है। नरेन्द्र मोदी निरंतर दो बार विधानसा चुनावों में गुजरात में ाजपा की सरकार बना चुके हैं। अब यदि वे तीसरी बार ी चुनाव जीत जाते हैं तो सोनिया और अमेरिका दोनों को ही स्पष्ट हो जाएगा कि ाजपा का राष्ट्रवादी प्रयोग स्थाई रूप से जड़ जमा चुका है और यदि यह ऐसा ही चलता रहा तो पूरे ारत में एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हो जाएगा। इसलिए आने वाले चुनावों में सोनिया और अमेरिका दोनों के लिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ना बहुत जरूरी है। ऐसा ही एक प्रयोग अमेरिका ने स्वतंत्रता के शुरूआती दौर में ारत के केरल राज्य में किया था। कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को गिराने के लिए अमेरिका ने वहां रूपया ी खर्च किया और हर हथकंडा इस्तेमाल किया। वैसे ी लोकतांत्रिक देशों में अमेरिका सरकारों को कैसे बनाता और गिराता है इसकी एक बानगी सीआईके  के डीक्लासीफाई हो चुके दस्तावेजों को देखने से पता चल जाता है। 1957 के कम्युनिस्ट अमेरिका का विरोध कर रहे थे, लेकिन 2007 तक आते-आते वे उसकी और सोनिया की पालकी में कहार बन गए हैं। वैसे ी साम्यवादी आंदोलन दुनिया र से खत्म हो चुका है। इसलिए ारत के इन साम्यवादी समूहों पर क्रोध नहीं उनके विद्रूप को देखकर दया और हंसी आती है। साम्यवादी देश के कोने में पड़े हैं और उनके ारत में फैलने की अब लगग तमाम संावनाएं चुक गई हैं। वैसे ी अमेरिका अब साम्यवादियों को अपने विरोधी के रूप में नहीं बल्कि सहायक मित्र के रूप में देखता है। ाजपा का मामला ऐसा नहीं है। वह इस देश में एक केन्द्रीय शक्ति बनकर उरी है। गुजरात एक प्रकार से ारत की ावी राजनीति का प्रशिक्षण स्थल बन गया है।  इसलिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ने के लिए इतालवी और अमेरिकी तर्कश में जितने तीर होंगे वे इन छः महीनों में निरंतर चलेंगे। अमेरिका सरकार ने अी पिछले दिनों एक रपट जारी की है। जिससे ारत में अमेरिका की रणनीति का खुलासा होता है और यह ी पता चलता है कि अमेरिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ारत में कितनी दखलअंदाजी करता है। रपट में स्पष्ट कहा गया है कि नरेन्द्र मोदी को वीजा इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि वे ारत में धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे। इतना ही नहीं यह ी कहा गया है कि अमेरिकी कन्सुलेट के अधिकारी मुंबई में उद्योगपतियों, मीडिया के लोगों और अनेक गैर सरकारी संस्थाओं के लोगों से गुजरात के दंगों के परिणामों पर बातचीत करने के लिए मिले थे। ारत में अमेरिकी दूतावास के लोग मदरसों के संचालकों से ी मिले। अमेरिका सरकार ने स्पष्ट कहा है कि अी तक स्कूलों में से राष्ट्रीय ावनाओं वाली पाठ्य-पुस्तकों को हटाया नहीं गया हैं । रपट में इस बात पर चिंता की गई है कि अी ी ारत के कुछ राज्यों में ारतीय जनता पार्टी का राज है। बीजेपी धारा 370 का विरोध करती है। एक समान सिविल कोर्ड की वकालत करती है और सबसे बढ़कर बीजेपी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा है जो धर्मांतरण का विरोध करता है और ईसाइयों और मुसलमानों से ेदाव करता है। रपट में इस बात पर ी दुःख प्रकट किया गया है कि अनेक राज्य धर्मांतरण विरोधी कानून बना रहे हैं और आशा की जा रही है कि सरकार इन्हें रोकेगी। यह रपट अपने आप में आंखें खोलने वाली है। जाहिर है कि अमेरिका के निशाने पर संघ परिवार है क्योंकि उसे लगता है कि संघ परिवार ारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ आंदोलन है। यदि इस लड़ाई में नरेन्द्र मोदी का स्तं गिरा दिया जाए तो जोशुआ प्रोजेक्ट-2 को पूरा होते कितनी देर लगेगी? यहां यह बताना रूचिकर रहेगा कि यह प्रोजेक्ट ारत को ईसाई बनाने के लिए चलाया गया अमेरिकी प्रोजेक्ट है।
अमेरिका इस पूरी लड़ाई में ारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। वह केवल इस्तेमाल ही नहीं कर रहा बल्कि ारत सरकार से ी यह आशा कर रहा है कि वह पाकिस्तान को आतंकवादी देश न माने बल्कि आतंकवाद के खिलाफ हो रही लड़ाई में सहायक देश के रूप में अपना ाई समझे। यह कहने कि सोनिया के नेतृत्व में ारत सरकार अमेरिका की इस परीक्षा में खरी उतर रही है।

ारत सरकार के तथाकथित सुरक्षा सलाहकार के. नारायणन ने स्पष्ट कर दिया है कि ारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पाकिस्तान के साथ मिलकर लड़ेगा। लाल मस्जिद प्रकरण के बाद तो मुशर्रफ का चालीसा पढ़ने वालों की हरकतें देखकर ारत के ाग्य के बारे में सोचकर कंपकंपी होती है। राॅ के पूर्व अधिकारी रमन ने अपनी प्रकाशित होने वाली किताब में खुलासा किया है कि नरसिम्हाराव के काल में ी अमेरिका ने दबाव डाला था कि ारत को पाकिस्तान के  साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन नरसिम्हा राव ने इंकार कर दिया था। मनमोहन सिंह इंकार नहीं कर रहे हैं। वे सब कुछ पाकिस्तान और अमेरिका के साथ मिलकर ही करना चाहते हैं। अमेरिका की इस पूरी साजिश में नरेन्द्र मोदी रूकावट है। यदि अमेरिका नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जंग छेड़ता है तो जाहिर है सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को इसमें अमेरिका का ही साथ देना है। सोनिया गांधी की ॰ष्टि में परवेज मुशर्रफ ारत का मित्र है और नरेन्द्र मोदी दुश्मन। इस लड़ाई में जहां तक प्रचार का प्रश्न है अमेरिका उसमें पूरी मुस्तैदी से जुड़ा है अमेरिका के अनेक अधिकारिक प्रकाशनों में नरेन्द्र मोदी को ारत में चर्च के प्रसार के लिए बहुत बड़ा कांटा माना गया है। जहां तक नरेन्द्र मोदी के अखाड़े का प्रश्न है सीआईए ने अपनी अधिकारिक वेबसाइट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ारतीय जनता पार्टी को हिन्दू मिलिटेन्ट आॅर्गनाइजेशन घोषित कर रखा है। अमेरिका यह ी कहता है कि जहां ी मिलिटेन्ट तत्व होंगे वहां आक्रमण करने का उसे पूरा अधिकार है । वह इसी तर्क से अफगानिस्तान में घुसा था, इसी तर्क से इराक में घुसा था और इसी तर्क से ईरान में घुसने की घोषणा कर रहा है। ईरान के बाद ारत की बारी ी आ सकती है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों ही अमेरिका की इस रणनीति के हिस्सेदार बनने को तैयार दिखाई देते हैं, क्योंकि वे पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि मिलिटेन्ट ताकतों से लड़ने का विश्वव्यापी अधिकार अमेरिका के पास है।

मीडिया इस पूरी कंपेन में अपना धर्म बखूबी निाएगा ही। बने बनाए निष्कर्ष और अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर किए गए विश्लेषण मीडिया को परोसे जाएंगे और वह पूरी ईमानदारी से प्रयास करेगा कि दर्शक या पाठक उसकी जुगाली करते रहें। इस पृष्ठूमि में हमें गुजरात ाजपा में तथाकथित विद्रोह का विश्लेषण करना होगा। ाजपा के ीतर व्यक्तिगत उचित अनुचित कारणों से दुःखी आत्माओं का रणनीति के तौर पर प्रयोग करने का अियान जो कांग्रेस ने शुरू किया है, वह प्रकारांतर से अमेरिका की उसी लंबी रणनीति का हिस्सा है। विदेशी शक्तियों को मोहरे इस देश में पहले ी उपलब्ध होते रहे हैं और आज ी उपलब्ध हो रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हो रहा है, वह केवल हमारा इम्तिहान है कि क्या हमने इतने सालों की गुलामी से कुछ सीखा है या अी ी आपसी लड़ाईयों में विदेशी शक्तियों को निमंत्रित करने की परंपरा पर चले हुए हैं।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
2007