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Tuesday, 14 January 2014

क्या सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी कोई दिल्ली में सुनने वाला है ?;



डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
सर्वोच्च न्यायालय ने दारा सिंह को फांसी देने की केन्द्रीय सरकार की अपील को नामंजूर कर दिया है । कुछ साल पहले ओडिशा में आस्ट्रेलिया के एक मिशनरी ग्राहम स्टेन्स की जंगल में हत्या हो गई थी । वह अपनी गाडी में था कि कुछ लोगों ने उसकी आग लगा दी । बाद में पुलिस ने इस घटना के लिए जिम्मेदार बता कर कुछ लोगों को गिरफ्तार किया और उसमें दारा सिंह नामका व्यक्ति प्रमुख था । ग्राहम स्टेन्स पर यह आरोप था कि वह विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन के बल पर भोले भाले जनजातीय समाज के लोगों का मतांतरण कर रहा था । इसके लिए वे अनेक प्रकार के अमानवीय व निंदनीय तरीकों का इस्तमाल करता था । जनजातीय समाज की परंपराओं को तोडने के लिए वे मतांतरित लोगों को भडकाता था और उन लोगों की आस्थाओं व विश्वासों का मजाक उडाता था । कबीले के लोगों इसाई मजहब की फौज में शामिल करवाने के लिए वे लगभग उन सभी तरीकों को इस्तमाल करता था जिनका उल्लेख जस्टिस नियोगी की अध्यक्षता में गठित आयोग ने किया है । इन्हीं परिस्थितियों में उसकी हत्या हुई और ओडिशा हाइकोर्ट ने दारा सिंह को हत्या का आरोपी मान कर उसे उम्र कैद की सजा सुनाई । ओडिशा हाइकोर्ट के इस फैसले से भारत में मतांतरण के काम में जुटा हुआ चर्च अति क्रोध में था  और वह दारा सिंह को किसी भी हालत में जिंदा नहीं देखना चाहता था । इसलिए केन्द्रीय सरकार की जांच एजेंसी सीबीआई ने दारा सिंह को फांसी पर लटकाये जाने की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई । उस वक्त कुछ मानवाधिकारप्रेमियों ने इस बात पर आपत्ति भी जाहिर की थी । लेकिन सीबीआई अंततः दारा सिंह के लिए फांसी की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में गई । इसी बीच ग्राहम स्टेन्स की आस्ट्रेलियाई पत्नी ग्लैडिस भारत को छोड कर वापस अपने देश चली गई ।

अब उच्चतम न्यायालय ने इस बहुचर्चित केस में अपना निर्णय सुना दिया है । न्यायालय ने भारत सरकार की अपील को खारिज करते हुए दारा सिंह को फांसी देने से इंकार कर दिया है । सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि ग्राहम स्टैंस की हत्या जघन्यतम अपराधों की श्रेणी में नहीं आती । सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि लोग ग्राहस स्टैंस को सबक सिखाना चाहते थे क्योंकि वह उनके इलाके में मतांतरण के काम में जुटा हुआ था । इस विषय पर  टिप्पणी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक बहुत ही महत्नपूर्ण टिप्पणी की है जो मतांतरण के काम में लगी हुई अलग अलग मिशनरियों के लिए मार्गदर्शक हो सकती है । सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति की आस्था व विश्वासों में दखलदाजी करना और इसके लिए बल का प्रयोग करना, उत्तेजना का प्रयोग करना, लालच का प्रयोग करना या किसी को यह झुठा विश्वास दिलवाना कि एक मजहब दूसरे से अच्छा है और इन सभी तरीकों का इस्तमाल करते हुए किसी व्यक्ति का मतांतरण करना, इसको किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता । सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि इस प्रकार के मतांतरण से हमारे समाज की उस आधारभित्ति पर चोट होती है जिसकी रचना संविधान के निर्माताओं ने की थी ।

सर्वोच्च न्यायालय के इस टिप्पणी से पहले भी अनेक न्यायालयों ने यह निर्णय दिये हैं कि भारतीय संविधान में अपने मजहब का प्रचार करने का अधिकार तो दिया हुआ है लेकिन किसी को भी अनुचित साधनों के प्रयोग से मतांतरण का अधिकार नहीं है । यही कारण है कि ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश जनजातीय बहुल राज्यों ने मतांतरण को रोकने के लिए कानून बनाया हुआ है । लेकिन दुर्भाग्य से इस कानून के होते हुए भी ग्राहम स्टेंस जैसे विदेशी लोग अकेले ओडिशा में ही हजारों हजारों लोगों का मतांतरण करवा पाने में सफल हो गये और राज्य सरकार आंखें मुंद कर सोयी रही । यही परिस्थितियां रही होगी ओडिशा के लोगों ने राज्य सरकार के असफल हो जाने पर ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाने की सोची होगी । यद्यपि इस तरीके को अच्छा नहीं माना जा सकता लेकिन फिर भी एक बात का ध्यान रखना चाहिए यदि जनजातीय समाज में मिशनरियों की इस प्रकार की अमानवीय गतिविधियों को रोका न गया तो वह समाज इसे रोकने के लिए स्वयं किसी भी सीमा तक जा सकता है । लेकिन दुर्भाग्य से केन्द्रीय सरकार खतरे की इस घंटी को सुनने के बजाए दारा सिंह को ही फांसी पर लटकाने को ज्यादा सुविधाजनक मान कर चल रही है । ओडिशा में ही दो साल पहले चर्च के लोगों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या कर दी थी । ये भी जनजातीय समाज में मिशनरियों के उस मतांतरण आंदोलन का ही विरोध कर रहे थे । स्वामी जी की हत्या के विरोध में जब पूरा कंध समाज ऊफान पर आ गया तो राज्य सरकार एक बार फिर चर्च के साथ खडी दिखाई दी  और कंध समाज को प्रताडित और डराने धमकाने के कार्य में लगी रही । ग्राहम स्टैंस के हत्यारों को पकडने के लिए राज्य सरकार ने जितनी तत्परता दिखाई थी उसकी शतांश भी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्यारों को पकडने और दंड दिलवाने में नहीं दिखाई । अलबत्ता इस भीतर केन्द्रीय सरकार ने आस्ट्रेलिया से ग्राहम स्टेंस की पत्नी ग्लैडिस को वापस बुला कर पद्मश्री से सम्मानित किया था । यह जनजातीय समाज के मुंह पर एक और तमाचा था ।

अब समय आ गया है कि इस गंभीर मुद्दे पर गहरी चर्चा की जाए और भविष्य के लिए ठोस रणनीति बनायी जाए ताकि विदेशी ताकतों से संचालित मिशनरियां मतांतरण के बल पर भारत की पहचान और अस्मिता को समाप्त न कर सकें । इस रणनीति के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया यह दिशानिर्देश अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकता है । लेकिन पिछले कुछ सालों से केन्द्रीय सरकार के व्यवहार और आचरण से यह लगता है कि उसकी रुचि भारत में छल और बल से किये जा रहे मतांतरण के आंदोलन को रोकने में उतनी नहीं है जितनी उसे प्रोत्साहित करने में है । यही कारण है कि जब राजस्थान विधानसभा ने राज्य में मतांतरण को रोकने के लिए विधेयक दो दो बार बहुमत से पारित किया तो उस समय की राज्यपाल श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने ( जो अब राष्टपति पद पर विराजमान हैं)  अनेक प्रकार के अडंगे लगा कर उसे कानून नहीं बनने दिया । इसी प्रकार गुजरात विधानसभा ने जब इसी प्रकार के एक विधेयक को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए उसमें संशोधन को बहुमत से स्वीकृत किया तो राज्यपाल ने केन्द्रीय सरकार के निर्देशों के चलते उसमें अडंगे लगाये । जिन प्रदेशों में इस प्रकार का कानून बना हुआ भी हैं वहां भी शायद ही कोई पादरी होगा जिसको इस कानून का उल्लंघन करने के आरोप में सजा सुनायी गई है । सजा की बात तो दूर है किसी पर मुकद्दमा ही चलाया गया हो, यह भी संदेहात्मक है । यही कारण है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में मतांतरण रोकने संबंधी विधेयक प्रभावी होने पर भी वहां लाखों की संख्या में जनजातीय समाज को मतांतरित किया जा चुका है ।
दुर्भाग्य से भारत में जिन लोगों के हाथों में सत्ता सूत्र आ गये हैं उनकी वैटिकन के राष्ट्रपति में ज्यादा आस्था है, भारत के इतिहास, विरासत, आस्था व विश्वासों से कम । पोप का यही मानना है कि अंतिम मोक्ष तक ले जाने के लिए ईसाई मजहब ही सर्वश्रेष्ठ है बाकि सब मजहब शैतान के मजहब हैं । सत्ता के उच्च स्थानों पर बैठे हुए कुछ लोग पोप के इसी एजेंडा को भारत में लागू करना चाहते हैं । चाहे उसके लिए दारा सिंह को फांसी पर लटकाना पडे, त्रिपुरा के शांति काली जी महाराज और कंधमाल के स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को उनके ही आश्रम में गोलियों से उडाना पडे । परंतु देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इतिहास के इस मोड पर एक बहुत ही सही और सामयिक चेतावनी दी है । क्या दिल्ली में कोई सुनने वाला है ?


आने वाले चुनावों में अमेरिका की दिलचस्पी:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 1 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
गुजरात के विधानसा चुनावों को कुल जमा छः महीने बचे हैं। इसलिए आक्रमणों का सारा जोर नरेन्द्र मोदी पर ही रहेगा। सोनिया गांधी ने आॅपरेशन इंडिया का मोटा-मोटा सारा काम लगग निपटा लिया है। गांधी नेहरू परिवार में सोनिया के सिवा अब और कोई नहीं बचा है। मेनका ी इस परिवार से जुड़ी थी लेकिन समय रहते उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया। इसलिए सारी की सारी विरासत सोनिया गांधी के ही हाथों में है। कांग्रेस की बागडोर कांग्रेसियों ने खुद ही सोनिया गांधी के हवाले कर दी थी। जिस प्रकार जाॅर्ज पंचम के दरबार में हाजिरी देने के लिए दिल्ली में देश र के राजा एकत्रित हुए थे उसी तरह राजीव गांधी की रहस्यमयी मौत के बाद कांग्रेसी क्षत्रप सोनिया के दरबार में दूर-दूर से चलकर आ पहुंचे थे। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के बाद सŸाा के समस्त सूत्र अत्यंत चालाकी से संाल लिए। देश के जाने माने अर्थशाóी और की इंदिरा गांधी के आर्थिक सलाहकार रह चुके प्रो. अशोक मित्रा की मानें तो मनमोहन सिंह की नियुक्ति अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने ही की है। इससे यह ी पता चल जाता है कि सŸाा के असील सूत्र कहां है? राष्ट्रपति वन बीच-बीच में सोनिया के साम्राज्य में कांटे की तरह चुता था। कलाम का कोई रोसा नहीं था। वे देश के हितों के प्रश्न पर अपनी बेबाक राय जाहिर करने के लिए मजबूर हो जाते थे। सोनिया और उसके मित्रों ने राष्ट्रपति वन का आॅपरेशन ी सफलतापूर्वक कर दिया है। प्रतिा पाटिल रायसीना हिल्ज़ की मालिक हो गई हैं। राष्ट्रपति बनने पर की ज्ञान जैल सिंह ने कहा था कि इंदिरा गांधी मुझे झाडू लगाने के लिए कहे तो मैं वह ी करने के लिए तैयार हूँ।प्रतिा पाटिल को शायद ऐसा कहने की ी जरूरत नहीं है। ारत और श्रीलंका के बीच जिस तेजी और हड़बड़ी से ऐतिहासिक रामसेतु को तोड़ने का प्रयास सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह कर रहे हैं उससे ारतीयों की ावना को ठेस पहुंचती है-यह इस पूरे प्रकरण का एक पहलू है।असली मुद्दा तो यह है कि रामसेतु के टूटने पर ारत और श्रीलंका के बीच का जल क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय बन जाएगा और अमेरिका की मार हमारी जल सीमा तक हो जाएगी । बाकी जहां तक अमेरिका का अपना प्रश्न है अमेरिका ने पिछले दिनों स्पष्ट कर ही दिया है कि वह पाकिस्तान में सैनिक कार्यवाही ी कर सकता है। क्योंकि बकौल अमेरिका ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है। इसका निर्णय ी अमेरिका खुद ही करता है कि लादेन किस वक्त कहां होना चाहिए। इसलिए हमला करने के लिए देश और स्थान ी अमेरिका खुद ही चुनता है। अमेरिका पाकिस्तान पर हमला करता है या नहीं करता, यह हमारी चिंता का विषय नहीं है। चिंता इस बात की है कि यदि अमेरिका पाकिस्तान में आ जाता है तो उसका अधिकार क्षेत्र बाघा सीमा तक हो जाएगा। खूबसूरती यह है कि अमेरिका अपनी योजना का खुलासा ी करता जा रहा है और कई समझौतों के माध्यम से, जिसमें 123 परमाणु परीक्षा केवल एक समझौता है, ारत के ीतर अपनी दखलअंदाजी  ी बढ़ाता जा रहा है। किस्सा कोताह यह है कि सोनिया गांधी का आॅपरेशन इंडिया मुकम्मल हो गया है। अब उसके रास्ते का केवल एक ही कांटा है। वैसे कायदे से दो कांटे होने चाहिए थे। एक राष्ट्रवादी शक्तियों का मजमुआ संघ परिवार और दूसरा साम्यवादी शक्तियों का मजमुआ साम्यवादी परिवार। लेकिन इस मामले में सोनिया गांधी और अमेरिका दोनों की ही दाद देनी होगी कि जो साम्यवादी परिवार घोषित वैचारिक आधार के कारण अमेरिका रास्ते का कांटा होना चाहिए था, वह सोनिया गांधी और अमेरिका की पालकी का कहार बन गया है।

दूसरा कांटा बचा संघ परिवार, यदि ाजपा को उसकी राजनीतिक अिव्यक्ति मान लिया जाए तो ाजपा इस आॅपरेशन के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा माना जाएगा। ाजपा सरकार ने अपने शुरू के 13 महीने के शासनकाल में परमाणु धमाका करके अमेरिका को चैंका दिया था। शायद अमेरिका को ती लगने लगा होगा कि ारत की सŸाा के सूत्र उसके हाथों से निकल गए है। ाजपा का विरोध तो शायद अब ी बरकरार है परंतु उसकी धार कुंठित हो चुकी है। इसलिए नहीं कि वैचारिक संस्खलन हुआ है बल्कि इसलिए कि ाजपा देश की सŸाा में लंबे अरसे तक स्थाई रूप से बने रहने में सफल नहीं हुई है। राज्यों में उसकी सरकारों का आना जाना शुरू हो गया है। जिस राजनैतिक दल का आना जाना 4-5 साल के ीतर बदलता रहे वह स्थाई रूप से कुछ मौलिक परिवर्तन कर पाएगा, इसमें संदेह होने लगता है। 1977 के बाद से ाजपा वििन्न राज्यों में जिस तेजी से सŸाा संालती है, अगले पाँच सालों में उसी तेजी से बाहर हो जाती है। इसलिए ारत को नियंत्रित करने का सपना देख रही विदेशी शक्तियों को प्रारं में ाजपा से जितना य था वह धीरे-धीरे मिटता गया। नरेन्द्र मोदी ने इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ उपस्थित किया है। नरेन्द्र मोदी निरंतर दो बार विधानसा चुनावों में गुजरात में ाजपा की सरकार बना चुके हैं। अब यदि वे तीसरी बार ी चुनाव जीत जाते हैं तो सोनिया और अमेरिका दोनों को ही स्पष्ट हो जाएगा कि ाजपा का राष्ट्रवादी प्रयोग स्थाई रूप से जड़ जमा चुका है और यदि यह ऐसा ही चलता रहा तो पूरे ारत में एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हो जाएगा। इसलिए आने वाले चुनावों में सोनिया और अमेरिका दोनों के लिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ना बहुत जरूरी है। ऐसा ही एक प्रयोग अमेरिका ने स्वतंत्रता के शुरूआती दौर में ारत के केरल राज्य में किया था। कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को गिराने के लिए अमेरिका ने वहां रूपया ी खर्च किया और हर हथकंडा इस्तेमाल किया। वैसे ी लोकतांत्रिक देशों में अमेरिका सरकारों को कैसे बनाता और गिराता है इसकी एक बानगी सीआईके  के डीक्लासीफाई हो चुके दस्तावेजों को देखने से पता चल जाता है। 1957 के कम्युनिस्ट अमेरिका का विरोध कर रहे थे, लेकिन 2007 तक आते-आते वे उसकी और सोनिया की पालकी में कहार बन गए हैं। वैसे ी साम्यवादी आंदोलन दुनिया र से खत्म हो चुका है। इसलिए ारत के इन साम्यवादी समूहों पर क्रोध नहीं उनके विद्रूप को देखकर दया और हंसी आती है। साम्यवादी देश के कोने में पड़े हैं और उनके ारत में फैलने की अब लगग तमाम संावनाएं चुक गई हैं। वैसे ी अमेरिका अब साम्यवादियों को अपने विरोधी के रूप में नहीं बल्कि सहायक मित्र के रूप में देखता है। ाजपा का मामला ऐसा नहीं है। वह इस देश में एक केन्द्रीय शक्ति बनकर उरी है। गुजरात एक प्रकार से ारत की ावी राजनीति का प्रशिक्षण स्थल बन गया है।  इसलिए नरेन्द्र मोदी को उखाड़ने के लिए इतालवी और अमेरिकी तर्कश में जितने तीर होंगे वे इन छः महीनों में निरंतर चलेंगे। अमेरिका सरकार ने अी पिछले दिनों एक रपट जारी की है। जिससे ारत में अमेरिका की रणनीति का खुलासा होता है और यह ी पता चलता है कि अमेरिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ारत में कितनी दखलअंदाजी करता है। रपट में स्पष्ट कहा गया है कि नरेन्द्र मोदी को वीजा इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि वे ारत में धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे। इतना ही नहीं यह ी कहा गया है कि अमेरिकी कन्सुलेट के अधिकारी मुंबई में उद्योगपतियों, मीडिया के लोगों और अनेक गैर सरकारी संस्थाओं के लोगों से गुजरात के दंगों के परिणामों पर बातचीत करने के लिए मिले थे। ारत में अमेरिकी दूतावास के लोग मदरसों के संचालकों से ी मिले। अमेरिका सरकार ने स्पष्ट कहा है कि अी तक स्कूलों में से राष्ट्रीय ावनाओं वाली पाठ्य-पुस्तकों को हटाया नहीं गया हैं । रपट में इस बात पर चिंता की गई है कि अी ी ारत के कुछ राज्यों में ारतीय जनता पार्टी का राज है। बीजेपी धारा 370 का विरोध करती है। एक समान सिविल कोर्ड की वकालत करती है और सबसे बढ़कर बीजेपी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा है जो धर्मांतरण का विरोध करता है और ईसाइयों और मुसलमानों से ेदाव करता है। रपट में इस बात पर ी दुःख प्रकट किया गया है कि अनेक राज्य धर्मांतरण विरोधी कानून बना रहे हैं और आशा की जा रही है कि सरकार इन्हें रोकेगी। यह रपट अपने आप में आंखें खोलने वाली है। जाहिर है कि अमेरिका के निशाने पर संघ परिवार है क्योंकि उसे लगता है कि संघ परिवार ारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ आंदोलन है। यदि इस लड़ाई में नरेन्द्र मोदी का स्तं गिरा दिया जाए तो जोशुआ प्रोजेक्ट-2 को पूरा होते कितनी देर लगेगी? यहां यह बताना रूचिकर रहेगा कि यह प्रोजेक्ट ारत को ईसाई बनाने के लिए चलाया गया अमेरिकी प्रोजेक्ट है।
अमेरिका इस पूरी लड़ाई में ारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। वह केवल इस्तेमाल ही नहीं कर रहा बल्कि ारत सरकार से ी यह आशा कर रहा है कि वह पाकिस्तान को आतंकवादी देश न माने बल्कि आतंकवाद के खिलाफ हो रही लड़ाई में सहायक देश के रूप में अपना ाई समझे। यह कहने कि सोनिया के नेतृत्व में ारत सरकार अमेरिका की इस परीक्षा में खरी उतर रही है।

ारत सरकार के तथाकथित सुरक्षा सलाहकार के. नारायणन ने स्पष्ट कर दिया है कि ारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पाकिस्तान के साथ मिलकर लड़ेगा। लाल मस्जिद प्रकरण के बाद तो मुशर्रफ का चालीसा पढ़ने वालों की हरकतें देखकर ारत के ाग्य के बारे में सोचकर कंपकंपी होती है। राॅ के पूर्व अधिकारी रमन ने अपनी प्रकाशित होने वाली किताब में खुलासा किया है कि नरसिम्हाराव के काल में ी अमेरिका ने दबाव डाला था कि ारत को पाकिस्तान के  साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन नरसिम्हा राव ने इंकार कर दिया था। मनमोहन सिंह इंकार नहीं कर रहे हैं। वे सब कुछ पाकिस्तान और अमेरिका के साथ मिलकर ही करना चाहते हैं। अमेरिका की इस पूरी साजिश में नरेन्द्र मोदी रूकावट है। यदि अमेरिका नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जंग छेड़ता है तो जाहिर है सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को इसमें अमेरिका का ही साथ देना है। सोनिया गांधी की दृष्टि में परवेज मुशर्रफ ारत का मित्र है और नरेन्द्र मोदी दुश्मन। इस लड़ाई में जहां तक प्रचार का प्रश्न है अमेरिका उसमें पूरी मुस्तैदी से जुड़ा है अमेरिका के अनेक अधिकारिक प्रकाशनों में नरेन्द्र मोदी को ारत में चर्च के प्रसार के लिए बहुत बड़ा कांटा माना गया है। जहां तक नरेन्द्र मोदी के अखाड़े का प्रश्न है सीआईए ने अपनी अधिकारिक वेबसाइट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ारतीय जनता पार्टी को हिन्दू मिलिटेन्ट आॅर्गनाइजेशन घोषित कर रखा है। अमेरिका यह ी कहता है कि जहां ी मिलिटेन्ट तत्व होंगे वहां आक्रमण करने का उसे पूरा अधिकार है । वह इसी तर्क से अफगानिस्तान में घुसा था, इसी तर्क से इराक में घुसा था और इसी तर्क से ईरान में घुसने की घोषणा कर रहा है। ईरान के बाद ारत की बारी ी आ सकती है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों ही अमेरिका की इस रणनीति के हिस्सेदार बनने को तैयार दिखाई देते हैं, क्योंकि वे पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि मिलिटेन्ट ताकतों से लड़ने का विश्वव्यापी अधिकार अमेरिका के पास है।

मीडिया इस पूरी कंपेन में अपना धर्म बखूबी निाएगा ही। बने बनाए निष्कर्ष और अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर किए गए विश्लेषण मीडिया को परोसे जाएंगे और वह पूरी ईमानदारी से प्रयास करेगा कि दर्शक या पाठक उसकी जुगाली करते रहें। इस पृष्ठूमि में हमें गुजरात ाजपा में तथाकथित विद्रोह का विश्लेषण करना होगा। ाजपा के ीतर व्यक्तिगत उचित अनुचित कारणों से दुःखी आत्माओं का रणनीति के तौर पर प्रयोग करने का अियान जो कांग्रेस ने शुरू किया है, वह प्रकारांतर से अमेरिका की उसी लंबी रणनीति का हिस्सा है। विदेशी शक्तियों को मोहरे इस देश में पहले ी उपलब्ध होते रहे हैं और आज ी उपलब्ध हो रहे हैं। गुजरात में जो कुछ हो रहा है, वह केवल हमारा इम्तिहान है कि क्या हमने इतने सालों की गुलामी से कुछ सीखा है या अी ी आपसी लड़ाईयों में विदेशी शक्तियों को निमंत्रित करने की परंपरा पर चले हुए हैं।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

म्यांमार में लोकतंत्र की आड़ में चर्च का गंदा खेल:

 डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
दिनांक:  1 अक्तूबर 2007
स्थान: नई दिल्ली
म्यांमार में कुछ बौद्ध िक्षुओं ने लोकतंत्र के पक्ष में नारे लगाते हुए पिछले दिनों प्रदर्शन किए। प्रदर्शन उग्र हुए तो पुलिस ने लाठी चार्ज किया और गोली ी चली उसमें कुछ लोग मारे ी गए। उनमें से एक जापानी पत्रकार ी था। जाहिर है चीवर पहने िक्खु का खून बहेगा तो लोगों को क्रोध तो आएगा ही और यांगून में लोग क्रोध का प्रदर्शन कर ी रहे हैं। म्यांमार में 1962 में ही जनरल नेविन ने सैनिक सŸाा स्थापित कर ली थीऔर उसने 26 साल तक वहां राज्य किया। 1988 में म्यांमार में लोकतंत्र के पक्ष में लोग सड़कों पर निकल आए। जनरल नेविन को सŸााच्युत करते हुए एक अन्य सैनिक विद्रोह में जनरल साँ मुआंग ने सŸाा संाल ली । जनरल साँ मुआंग ने 1990 में देश में पहली बार स्वतंत्र चुनाव करवाए । इन चुनावों में औंग स्वांग सूकी की नेशनल लीग फाॅर डेमोक्रेसी ने 489 में से 392 सीटें जीतकर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। परंतु जनरल साँ मुआंग ने सŸाा छोड़ने के बजाए 20 जुलाई 1999 को औंग स्वांग सूकी को गिरफ्तार कर लिया। सूकी तो तब से जेल में ही है अलबŸाा जनरल साँ मुआंग ने बाद में त्याग पत्र दे दिया और उनकी जगह थान श्वेह सŸाारूढ़ हुए।
सूकी का म्यांमार के स्वतंत्रता संघर्ष से पुराना समन्वय रहा है। चाहे प्रत्यक्ष चाहे अप्रत्यक्ष। सूकी के पिता औंग स्वांग ने 1940 में म्यांमार में बर्मा स्वतंत्रता सेना का गठन किया था और यह सेना  बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करती रही। वैसे कुछ लोगों का यह आरोप ी है कि औंग स्वांग पहले जापानियों के साथ थे। जापानियों ने ही उन्हें प्रशिक्षित किया था लेकिन बाद में उन्होंने जापानियों के खिलाफ ब्रिटेन से हाथ मिला लिया। 1947 में बर्मा में जो अस्थाई सरकार बनी उसमें औंग स्वांग उपसापति थे। परंतु इसके बनने के कुछ महीने बाद ही 1947 में विरोधियों ने औंग स्वांग समेत उनके अनेक मंत्रिमंडलीय सहयोगियोें को कत्ल कर दिया। इसे इतिहास का दुर्याेग कहा जाए या संयोग कि 1947 से 43 साल बाद औंग स्वांग की बेटी सूकी ने लोकतांत्रिक चुनावों में बर्मावासियों का समर्थन हासिल किया। लेकिन इस बीच इरावती में इतना पानी बह चुका था कि इस यात्रा को अथ से प्रारं करना संव नहीं था।
जिस समय अंग्रेजों का ारत और बर्मा पर एक साथ साम्राज्य था उस समय और 1937 के बाद ी जब बर्मा को ारत के प्रशासन से अलग कर दिया गया अंग्रेजों ने बर्मा के लोगों में फूट डलवाने के साम्राज्यवादी प्रयास किए। इस देश को दिया गया बर्मा नाम ी अंग्रेजों का ही षड्यंत्र था। जिस प्रकार उन्होंने हिन्दुस्थान और ारत को इंडिया बना दिया इसी प्रकार उन्होंने इरावती की धरती के पुराने नामों को दरकिनार करते हुए इस देश का नाम बर्मा कर दिया। बर्मा मूलतः अपनी पुरानी ऐतिहासिक विरासत को संाले हुए बुद्ध वचनों में विश्वास करने वाला देश है। इसकी राष्ट्रीयता का मूलाधार ी बुद्ध प्रतीक, इतिहास और संस्कृति के ीतर से उपजा है। अंग्रेजों ने एक निश्चित योजना के अनुसार बर्मा का ईसाइकरण प्रारं किया। ारत के  साथ बर्मा के पर्वतीय सीमांत पर बसी हुई जनजातियों का सरकारी सहायता से ईसाई मिशनरियों ने धर्मांतरण कर उनके गले में यीशु मसीह की सलीव लटका दी। धर्मांतरण के इन कुप्रयासों का फल यह हुआ कि बर्मा के ीतर ही वििन्न सम्प्रदायों में अविश्वास बढ़ा और झगड़े हुए। लोकतंत्र की सरकार का जो प्रयोग थोड़े अरसे वहाँ हुआ उसमें अमेरिका के साम्राज्यवादी रवैय्ये के कारण मैदानी क्षेत्रों में ी ईसाईकरण की प्रक्रिया तेज होने लगी। बर्मा में सेना ने सŸाा संालने के बाद ईसाई मिशनरियों की इन अराष्ट्रीय गतिविधियों पर रोक लगादी और बहुत सीमा तक धर्मांतरण के माध्यम से राष्ट्रांतरण की यह प्रकिया रूकी ।
लेकिन इसी बीच औंक स्वांग की बेटी सूकी के बारे में जान लेना ी रूचिकर होगा। इसी बीच औंग स्वांग की बेटी सूकी पढ़ने के लिए लंदन चली गई और वहाँ बर्मा में पूर्व ब्रिटिश राजदूत लाॅर्ड गौरबूथ के घर में रही। यही उनका परिचय एक अंग्रेज माइकल एरिस से हुआ और 1972 में दोनों नेे शादी कर ली। 1988 में सूकी बर्मा वापिस आई और वहीं उन्होंने देश की राजनीति में पुनः ाग लेने का निर्णय लिया। आगे की कथा इतिहास है । बर्मा साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए एक प्रकार से क्रीड़ा ूमि बन गया है। जब से पोप ने दिल्ली में यह घोषणा की है कि 21वीं शताब्दी में एशिया के बचे खुचे देशों में ी सलीव लटका दी जाएगी तब से ारत के आसपास के 8-10 छोटे-छोटे बौद्ध देश ईसाई मिशनरियों का निशाना बन गए हैं। बर्मा उनमें से एक है। सैनिक शासन ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण की आज्ञा नहीं दे रहा। इसलिए लोकतंत्र बचाने की आड़ में बर्मा के पर्वतीय क्षेत्रों के ईसाई बहुल इलाकों के लोग यत्र-तत्र प्रदर्शन करते रहते हैं। अमेरिका और अन्य यूरोपीय देश बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के लिए इसीलिए लालयित है कि वहां ईसाइकरण की प्रक्रिया को तेज किया जा सके। अन्यथा अमेरिका पाकिस्तान में तानाशाही का ही समर्थन करता है। अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी देशों को यह लगता है औंग स्वांग सूकी उनके उपकारों से इतनी दबी हुई है कि यदि उसे सŸाा प्राप्त होती है तो वह ना तो अमेरिका के साम्राज्यवादी षड्यंत्रों को रोक पाएगी और ना ही ईसाई मिशनरियों पर लगाम लगा पाएगी। अमेरिका और यूरोप बर्मा के ईसाईकरण की प्रक्रिया में इतनी रूचि ले रहे हैं कि जब बर्मा सरकार ने देश का नाम प्राचीन परंपरा के अनुसार म्यांमार कर दिया तो अमेरिका आस्ट्रेलिया आयरलैण्ड और इंग्लैण्ड ने उसे स्वीकार करने से इंकार कर दियाऔर वे अी ी बर्मा नाम का ही प्रयोग करते हैं। यही स्थिति यूरोप संघ की है। म्यांमार के ीतर के ईसाई समुदाय तो म्यांमार नाम का विरोध कर ही रहे हैं।

म्यांमार इतिहास के चैराहे पर खड़ा है। एक ओर उसे चीन घेरना चाहता है। दूसरी ओर अमेरिका और ईसाई मिशनरियाँ अपने साम्राज्यवादी एजेण्डा को म्यांमार में लागू करना चाहती है। सैनिक तानाशाही म्यांमार के सांस्कृतिक विरासत को संाल रही है। लेकिन उसका तरीका तानाशाही का है और किसी ी देश में तानाशाही का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन दुर्ाग्य से लोकतंत्र बचाओ आंदोलन की आड़ में अमेरिका और यूरोप म्यांमार में धर्म परिवर्तन का जो गंदा खेल खेल रहा है उससे ी आँखे नहीं चुराई जा सकती। गवान बुद्ध ने कहा था कि- अप्प दीपों व । लेकिन अमेरिका इसी दीपक को बुझा देना चाहता है। तब प्रश्न पैदा होता है कि अंधेरे में लोकतंत्र कैसे जिंदा रहेगा।? लोकतंत्र के बिना म्यांमार की संस्कृति ी जिंदा नहीं रह सकती । उसका कंकाल तो बचा रह सकता है लेकिन आत्मा नहीं । चीन के दोनों हाथों में लड्डू हैं। उसे ना  तानाशाही से कुछ लेना देना है ना लोकतंत्र से। जो ी सरकार आ जाए वह उसी के पक्ष में है। क्योंकि चीन का लोक से कोई वास्ता नहीं है। उसका वास्ता केवल सरकार से है। परंतु ारत को तो लोक की ी । चिंता करनी है और अपने हितों की ी यहाँ एक और दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के उकसाने पर और उसकी कार्यसूची को पूरा करने की योजना के अंतर्गत वर्तमान ारत सरकार में म्यांमार में लोक की हत्या को लेकर ज्यादा ही चिंता जताई जा रही है। ारत सरकार को न तिब्बत के लोक की चिंता है ना पाकिस्तान में लोक हत्या की चिंता है। उसे केवल यांगून के लोग की चिंता हो रही है। क्या यह लोकचिंता अमेरिका और  ईसाई मिशनरियों के हितों की पूर्ति के लिए तो नहीं है? (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार) 

कंधमाल के बहाने चर्च कर रहा ब्लैकमेल

- डाँ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

उड़ीसा के कंधमाल में दो साल पहले जन्माष्टमी के दिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की अमानुंषिक ढंग से हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के बाद उपजी रोष लहर में पूरे जिला में हिन्दुओं और इसाईयों को काफी नुकसान उठाना पड़ा। कुछ कीमती जाने ी गई। लेकिन धीरे धीरे कंधमाल में जीवन फिर अपनी रफ्तार पकड़ने लगा और घाव रने लगे। यघपि अी तक स्वामी जी के हत्यौरों को सजा नहीं हुई। जो लोग इस हत्या में पकड़े गये हैं वे सचमुच इस षडयंत्र में शामिल थे या फिर असली हत्यारों को बचाने के लिए पुलिस ने कुछ लोग पकड़ लिये हैं ताकि कागजी खानापुरी ी हो जाये और असली हत्यारे बच ी जायें। परन्तु इसके बावजूद कंधमाल शांति की और बढ़ रहा है। लेकिन दुर्ाग्य से शांत कंधमाल चर्च को अनुकूल नहीं लगता। इसलिए इसाई मिशनियारियां कंधमाल में अविश्वास और दुर्ावना पैदा करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हैं इसी रणनीति के तहत कुछ मास पहले चर्च ने यूरोपीय यूनियन के प्रतिनिधि मंडल को कंधमाल बुलाया था। यह प्रतिनिधि मंडल कंधमाल के अनेक गाॅव में घूमा और वहाॅ के प्रषासकिय अधिकारियों को गोरी चमड़ी के रौब में डराता धमकाता रहा। यहाॅ तक कि यह प्रतिनिधि मंडल मुकदमों की सुनवाई कर रहे न्यायधीशों से ी मिलना चाहता था परन्तु वकीलों के विरोध के कारण मिल नहीं पाया। इस सारे प्रयोग में चर्च का एक ही उद्देश्य रहता है कि दुनियां र में यह प्रचारित किया जाये कि कंधमाल में मतांतरित इसाईयों पर अत्याचार हो रहे हैं। यूरोप में इन अत्याचारों की काल्पनिक अत्याचारों की कथाए पढ़ कर चर्च को पैसा ेजते रहें।यह अलग बात है कि इस पैसे का एक हिस्सा मतांतरण के काम में खर्च होता है व दूसरा हिस्सा चर्च के अधिकारी डकार जाते है। और शायद एक हिस्सा उस सेक्सुयल एब्यूज में ी खर्च होता हो जिसकी खबरें आये दिन अखबारों में छपती रहती हैं। इस अियान का एक दूसरा हिस्सा राज्य सरकार को ब्लेकमेल करना ी होता है क्योंकि जब चर्च पहले ही अपने पीडि़त होने का शोर मचाना शुरु कर देता है तो राज्य सरकार उन कु.त्यों की जांच करने से घबराने लगती है जो मिशनारियों के कार्यालयों और चर्च की दिवारों के ीतर होते हैं।

कंधमाल को लेकर ी चर्च यही रणनीति अपना रहा है।चर्च जितनी जोर से अपने आपको पीडि़त पक्ष घोषित करेगा, उसे पता है उतना ही उड़ीसा सरकार स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के असली हत्यारों को पकड़ने से डरेगी। इस रणनीति के तहत पिछले महीने चर्च ने दिल्ली में एक बौद्विक प्रयास का पाखंड किया। कंधमाल में स्वामी जी के हत्यारों को बेनकाब करने की प्राथमिकता को धूमिल करने के उद्देश्य से चर्च ने पचास तथाकथित संस्थाओं का एक नेशनल सोलीडेरीटी फोरम बनाया। ध्यान रहे जिन 50 संस्थाओं को उल्लेख चर्च कर रहा है वे 50 संस्थाएं इसाईयों की ही संस्थाएं हैं और इनमें से अधिकांश को देश- विदेश के संदिग्ध स्रौतों से पैसा मिलता रहता है। उड़ीसा के लोग मांग करते रहते हैं कि इन संस्थाओं की गतिविधियों और इनके आर्थिक स्रौतों की जाँच करने के लिए आयोग बैठाया जाये इस नेशनल सोलीडेरीटी फोरम ने आगे एक और संस्था खड़ी कर दी जिसका नाम नेशनल पीपलस टि-ब्युनल आन नकंधमाल रखा। इस टि-ब्युनल ने पिछले महीने इसी प्रकार का एक बौद्विक अनुष्ठान किया। टि-ब्युनल का कहना है कि उसने 13 सदस्यों की एक ज्यूरी का गठन किया है। इस तथाकथित ज्युरी ने 22 से लेकर 24 अगस्त तक दिल्ली में जन सुनवाई की और इसके अनुसार कंधमाल जिला से एसे 50 दुखी लोग अपनी कथा सुनाने के लिए आये जिनको वहां तंग किया गया है। जाहिर है कि उनके अनुसार ये सी के सी 50 दुखी लोग मतांतरित इसाई ही हैं। दिल्ली के वातानुकूलित कांस्टीच्यूशन कलब में बैठ कर ज्युरी ने कंधमाल के वनवासियों की व्यथा कथा सुनी और उसके बाद अंग्रेजी ाषा में अपनी रपट ी जारी की। रिकार्ड के लिए इस तथाकथित ज्युरी में जो लोग शामिल थे उनके नाम ी पढ़ लिये जाये। ज्यूरी के अध्यक्ष ए0पी0 शाह हैं जो की दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश रह चुके हैं। दूसरे सदस्य हर्ष मेंढर हैं जो सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट-ीय सलाहकार परिषद के सदस्य ी हैं। फिल्म बनाने वाले महेष ट्ट , योजना आयोग की सदस्या सैयदा हमीद और अपने आप को अन्तरराष्ट-ीय कानून की विशेषज्ञ बताने वाली वाहेदा नायेनार, जल सेना के पूर्व अध्यक्ष विश्णुागवत, जिन्हें लेकर जल सेना में ी काफी विवाद हुआ था।

ताज्जुब है कि एन.पी.टी. ने स्वामी अग्निवेश, अरूंधती राय और तीस्ता सीतलबाड़  को ज्यूरी का सदस्य नहीं बनाया। वैसे हो सकता है कि उनके पास समय न रहा हो क्योंकि आजकल वे  आतंकवादियों और माओवादियों के मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

वैसे पूछा जा सकता है कि यदि ए.पी. शाह और महेश ट्ट को कंधमाल के मतांतरित इसाईयों की सचमुच चिन्ता थी तो वे ज्यूरी का यह जनअधिवेशन कंध माल के जंगलों में ही करते ताकि वहाॅ के बनवासी इन्हें सचमुच क्या हुआ यह बता सकते। ज्यूरी इतना तो जानती होगी कि कंधमाल के साधारण वनवासियों के लिए कंधमाल से दिल्ली आना सम्व नहीं है यह अलग बात है कि चर्च कुछ गिने चुने लोगों को दिल्ली लाकर जो चाहे कहलवा सकता है और वही उसने किया ी। वैसे तो सुनामधन्य ज्यूरी को ी न्याय -अन्याय से कुछ लेना देना नहीं था उनको ी इसाईयों पर हो रहे तथाकथित अत्याचारों की रपट जारी करनी थी ताकि चर्च विदेशों से ज्यादा से ज्यादा पैसा बटोर सके और उड़ीसा सरकार को यीत करके उससे मनमाफिक काम करवाया जा सके। वैसे इस जमावड़े में राम दयाल मुंडा ी थे जो ारत सरकार को ललकार कर कहते हैं कि तुम माओवादियों को हरा नहीं सकते। वैसे मुंडा ी सोनिया गांधी की सलाहकार परिषद में हैं और उनका घोषित एजेंडा झारखंड को पूरी तरह इसाई प्रदेश बनाना है। कंधमाल को लेकर की जा रही इस ब्लेकमेल से एक दिन पहले अपने आप को हिन्दुस्थान के इसाईयों की परिषद का महासचिव बताने वाले जाॅन दयाल ने लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की दूसरी बरसी पर एक रपट राष्ट- के नाम जारी की। रपट को पढ़कर एसा लगता है कि यह रपट ारत राष्ट- के नाम पर नहीं है बल्कि वैटिकन राष्ट- के नाम है । इस रपट के अनुसार कंधमाल में इसाईयों को बचाने में ारत सरकार ी असफल रही, उड़ीसा की नवीन पटनायक सरकार की तो उसमें हिस्सेदारी ही रही। उस समय के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने इसाईयों के दुःखों से मुह मोड़ लिया। देश की राष्ट-पति प्रतिा पाटिल ी इसाईयों को बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकी। प्रदेश की सारी नौकरशाही इसाईयों के खिलाफ है। कंधमाल जिले का जिलाधिकारी तो इसाईयों के खिलाफ वनवासियों से मिला हुआ है। सारी की सारी पुलिस मतांतरित इसाईयों की सहायता करने के स्थान पर कंध वनवासियों की सहायता कर रही है। न्याय पालिका न्याय नहीं दिला पा रही। जाॅन दयाल के अनुसार थोड़ी बहुत आषा उन विदेशी प्रतिनिधियों से जागी थी जो कंधमाल में आकर मतांतरित इसाईयों के दुःखदर्द को समझ पाये थे। जाहिर है जाॅन दयाल की यह रपट ारत राष्ट- के खिलाफ अियोग पत्र है जो उसने अप्रत्यक्ष रूप् से वैटिकन के दरबार में अथवा दूसरी विदेशी शक्तियों के दरबार में पेश किया है। आशा की जानी चाहिए कि देश के अन्य मतांतरित इसाई जाॅन दयाल के इस राष्ट- विरोधी .त्य में शामिल नहीं हैं। ज्यूरी ने अपने इस तथाकथित जनअधिवेशन के बाद अनेक सिफारिशें की हैं उनमें एक सिफारिश ये ी है कि प्रदेश में मतांतरण को रोकने वाले अधिनियम पर पुर्नविचार किया जाये।

दरअसल पूरे नाटक का उद्देश्य बहुत गहरा है। चर्च का यह आरोप है कि कंधमाल में लगग 300 चर्च नष्ट हुए हैं। दरअसल बनवासी क्षेत्रों में यदि किसी झोंपड़ी के बाहर क्रास का चिन्ह लटका दिया गया तो मिशनरियों ने उसे ी गिरजाघर घोषित कर दिया। जो पक्के गिरजाघर बने हुए हैं वे आमतौर पर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके बनाये गये हैं।अब मिष्नरियों की योजना है कि उड़ीसा सरकार को ब्लेकमेल करके सरकारी खर्चें पर कंधमाल जिला में 300 गिरजाघर बनवा लिये जाये और अवैध कब्जे को ी वैध घोषित करवा लिया जाये। चर्च के अपने आंकड़ों के अनुसार ही रोष लहर के कारण लगग दस हजार परिवार अपने घर छोड़कर पुर्नवास शिबिरों में चले गये थे। उनमें से अधिकांश लोग वापिस आ गये हैं लेकिन चर्च उनकी वापसी से प्रसन्न नहीं है। चर्च की योजना है कि ये लोग षिवरों में ही रहे ताकि इनको दिखाकर विदेशों से पैसा बटोरा जा सके। दूसरे चर्च सरकार पर यह दवाब डाल रहा है कि इन लोगों को सरकारी जमीन आबंटित की जाये और उस पर सरकारी खर्चे से इनको मकान बनाकर दिये जायें। चर्च उड़ीसा की जनता के पैसे से कंधमाल मे कुछ शत प्रतिशत इसाई गांव बना लेना चाहता है।

ताजुब है कि चर्च के इस ड-ामा में नन बलात्कार के बारे में कुछ नहीं कहा गया। यह चुप्पी रहस्य जनक लगती है। 2008 में चर्च ने बहुत शोर मचाया था कि कंध माल के दंगों में मीना नाक की एक नन के साथ लोंगों ने सामूहिक बलात्कार किया था। इस नन के साथ केरल का एक पादरी रहता था। उस पादरी ने ी कहा कि मुझे पीटते हुए लोगों ने जलुस निकाला। लेकिन कुछ दिनों के बाद पादरी और नन ने बलात्कार की कहानी सुनानी शुरु कर दी और उसे लेकर एफ0आई0आर0 ी लिखवाई। इसके कुछ दिन बाद नन गायब ही हो गई और पुलिस के लिए उसे ढुंढना मुश्किल हो गया। तब एक दिन अचानक वह दिल्ली में दिल्ली के आर्कबिशप के साथ प्रकट हुई। ये अलग बात है िकवह इस प्रकार पर्दे में छुपी हुई थी कि उसे पहचानना मुश्किल था। तब उसने रो रो कर बलातकार की कहानी पत्रकारों को सुनाई। सर्वाेच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई की बलात्कार की जांच सी0बी0आई0 करे। सर्वाेच्च न्यायलय ने यह याचिका खारिज कर दी। लेकिन चर्च इस बलात्कार को लेकर इतना हा हा कार मचाता रहा कि उसकी गुंज विदेशों में ी सुनाई देने लगी।तब नन ने उड़ीसा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी कि मुझे कंधमाल में न्याय नहीं मिल सकता इसलिए वहाँ के न्यायलय से मेरा केस कटक में स्थानांतरित कर दिया जाये। उच्च न्यायलय ने नन की अर्जी स्वीकार करते हुए यह कैस कटक स्थानांतरित कर दिया और उसके आदेष पर जुलाई 2010 में इस पर सुनवाई शुरु हुई। तब से लेकर आज तक यह नन अपना ब्यान दर्ज करवाने के लिए बार बार समन ेजे जाने के बावजूद न्यालय में हाजिर नहीं हुई। हर बार बिमारी का कारण बताया जाता रहा। यह अलग बात है कि इसी बीच कटक में ही चैद्वार जैल में वह अपराधियों की शिनाख्त करने के लिए शिनाख्ती परेड में शामिल हुई। शिनाख्ती परेड में तथाकथित अपराधियों के साथ लोगों को ी खड़ा कर दिया जाता है। नन ने इस परेड में एक नकली को ही बलात्कारी बता दिया। कुछ ऐसा ही पादरी ने ी किया। जब एन0पी0टी0 की यह ज्यूरी कंधमाल को लेकर इतनी हायतौबा मचा रही थी तो नन के मामले में उसकी चुप्पी कई प्रश्नों को जन्म देती है। रिकार्ड क लिए कटक न्यायालय ने नन को 23अक्तूबर को न्यायलय में हाजिर होने के लिए अन्तिम अवसर प्रदान किया था और यह ी कहा था कि यदि वह हाजिर न हुई तो उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट निकाल दिये जायेंगे। लेकिन नन ने दो दिन पहले उड़ीसा उच्च न्यायालय में एक और याचिका दायर कर यह मांग की कि कटक न्यायालय में चल रहे केस को स्थगित किया जाये। उच्च न्यायालय ने उसकी यह याचिका खारिज कर दी और नन  अी तक न्यायलय में हाजिर नहीं हुई। लगता है नन को लेकर चर्च ने जो षडयंत्र रचा था और जिसके बलबुते वह स्वामी लक्ष्माणानंद सरस्वती के असली हत्यारों को बचाना चाहते थे वह धीरे धीरे बेनकाब होता जा रहा है। शायद इसलिए चर्च अब कंधमाल की लड़ाई दिल्ली में लड़ना चाहता है क्योंकि यहां उसे समर्थन करने वाले कुछ न कुछ लोग मिल ही जायेंगे जिनका न कंधमाल से वास्ता है न वनवासियों से।


23.10.2010

भारतीय प्रतीकों पर प्रहार

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डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
किसी ी संस्कृति अथवा राष्ट्र  के लिए उसके प्रतीक अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। वास्तव में प्रतीक किसी राष्ट्र  की अस्मिता और पहचान बन जाते हैं। इन प्रतीकों के नष्ट होने से अथवा उनके प्रति श्रद्धा  ाव का ह्यास होने से राष्ट्र  की पहचान धुंधली होने लगती है और राष्ट्रीयता का स्वरूप बदलने लगता है। आधुनिक युग में किसी दूसरे देश पर आक्रमण करने का तौर तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है। पुराने युग में किसी राष्ट्र  को परास्त करने के लिए विरोधी उसे सेना बल से कुचलते थे और राष्ट्रांतरण के लिए शारीरिक बल से ही मतांतरण के लिए विवश करते थे। लेकिन, आधुनिक युग में जब से पश्चिमी शक्तियों का विश्व की राजनीति में बोल बाला बढा है तब से उन्होंने अपने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के प्रसार के लिए उसके तौर तरीके ी बदल दिए हैं। अब मतान्तरण के लिए छलकपट और लो का प्रयोग किया जाता है और राष्ट्र  अंतरण के लिए किसी ी देश के प्रतीकों को धीरे-धीरे लाछित किया जाता है।
अति प्राचीन काल से ारत की पहचान के बाह्य प्रतीकों में से संतों का और मंदिरों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वास्तव में याजा बरी साधु संत इस देश की राष्ट्रीय एकता और मेरूदण्ड रहे हैं। मध्य एशिया के सुदूर वाकु तक में पंजाब का कोई साधु ज्वाला माई का धूणा रमा कर बैठा रहा है और मंदिर की दीवारों पर पंजाबी में कोयले से ज्वाला माई के जन लिखता रहा है। यह शंकर देव और उनके शिष्य माधव देव ही थे जो सुदूर नगा प्रदेश में वहां के नगाओं को वैष्णव क्ति से सराबोर कर रहे थे। आधुनिक युग में जब ारत सरकार ने पंथ निरपेक्षता के नाम पर अपने आपको ारतीय संस्कृति, उसकी अस्मिता विरासत और पहचान से वैधानिक तौर पर असंबंधित घोषित कर दिया है तो यह साधु संत ही हैं जो बिना किसी राजकीय सहायता और प्रोत्साहन से ही यूरोप, अमेरिका और आस्ट-ेलिया जैसे सुदूर महाद्वीपों में ारतीय अथवा हिन्दु संस्कृति का प्रसार ही नहीं कर रहे बल्कि इसके मानव मूल्यों से वहां की अशांत तनावग्रस्त जनता को जीने का एक नया मकसद ी प्रदान कर रहे हैं। महेश योगी, ओशो रजनीश स्वामी प्रुपााद स्वामी राम, साईं बाबा जैसे अनेक साधु संतों ने वर्तमान युग में ारतीय संस्कृति की दिग दिगंत तक दुन्दु ी बजाई है।
जहां साधु संत है वहां मंदिर या मठ ी हैं। दोनों मिलकर ारत अथवा ारतीय संस्कृति के एक सशक्त रूप में स्थापित होते हैं। पिछली लगग एक शताब्दी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ी ारत में और विदेशों में ी हिन्दुत्व अथवा ारत वर्ष की राष्ट्रीय चेतना का सशक्त प्रतीक बनकर उरा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना आज से लगग 85 वर्ष पहले ारत के नाथि केंद्र नागपुर में डा. केशव राम बलिराम हेडगेवार ने की थी। यह वह समय था जब ब्रिटिश साम्राज्य़वादी  ताकतें ारत पर राजनैतिक शिकंजा कस चुकी थी और उसे सांस्कृतिक रूप से म्रत्य प्रायः करने के प्रयासों में जुटी थी और उधर ीतर से सŸाा गवा चुकी मुगल शक्ति के बचे हुए अवशेष हताशा में ारत की सांस्कृतिक पहचान को बदरंग करने के लिए इन्हीं ब्रिटिश साम्राज्यावादी से हाथ मिला रही थी। लगग सात-आठ सौ वर्षों तक देश में अरबों ईरानियों अफगानों और अंत में मुगलों के आक्रमणों के कारण और उनकी निरंतर बनी रही सŸाा के कारण ारत के कुछ लोग य अथवा प्रलोन से इस्लाम मजहब में दीक्षित हो चुके थे। परंतु उसके बावजूद उनकी जडें ारतीय विरासत में शक्ति से जमी हुई थी। उन्होंने इस्लाम को वस्त्र की तरह ओढ तो लिया था परंतु वह उनकी धमनियों में रक्त बनकर नहीं पसरा था। इतिहास के इस मोड पर ब्रिटिश साम्राज्य़वादी  ताकतें और ारत के ीतर की यह इस्लामी ताकतें एक साझां मकसद के लिए इकट्ठा हो रही थी। 1857 के आजादी के प्रथम संग्राम के बाद अंग्रेज इस बात को अच्छी तरह समझ गए थे कि ारत के मुसलमानों ने विष्णु या शिव की जगह अल्लाह को अपनाया है। उन्होंने अपनी विरासत को नहीं त्यागा है। अपने राजनीतिक हितों के लिए अंग्रेजी  शासन के लिए यह जरूरी था कि इस्लाम मजहब में दीक्षित हुए यह ारतीय इस देश की मिट्टी से ी टूटे। जिन्ना का और ब्रिटिश साम्राज्य़वादी  ताकतों का आपसी समझौता साम्रायवादियों का इस दिशा में पहला कदम था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ारतीयता की मूल पहचान को बचाने के लिए संगठित हिंदु अथवा ारतीय प्रयास था। स्वाविक ही था कि ारत की संस्कृति के खिलाफ लडी जा रही इस लडाई में वह राष्ट्र ीयता के प्रतीक के रूप में अवस्थित होने लगा। इसी प्रकार कुछ शब्द रंग, वस्त्र, पेड, पक्षी राष्ट्र ीयता के प्रतीक के रूप में धीरे-धीरे आकार ग्रहण करने लगते हैं। गवा रंग गऊ, पीपल इत्यादि ारतीय राष्ट्रीयता के मान बिन्दु माने जाते हैं।
पिछले कुछ अरसे से एक योजनाबद्घ ढंग से ारतीय अथवा हिन्दु संस्कृति के प्रतीक चिन्हों को लाछित करने का अत्यंत सुनियोजित ढंग से प्रयास किया जा रहा है। साधु संतों को तो बदनाम करने का तो मानों एक आंदोलन ही छेड दिया गया हो। इसमें विदेशी शक्तियां ी शामिल हैं और ारत के ीतर की शक्तियां ी शामिल हैं जो ारत की पहचान बदलने के लिए ी आमादा हैं। जब से सोनिया गांधी ने कांग्रेस पर कब्जा किया है तब से यह कांग्रेस अपने पुराने नाम के रहते हुए ी एक नये संगठन के तौर पर स्थापित हुई है और जाहिर है कि इसका मकसद ी बदला है और उस मकसद को प्राप्त करने के लिए कार्य पद्घति ी। संगठन के तौर पर ारतीयता के मान बिन्दुओं और प्रतीकों को लाछित करने के इस अियान में कांग्रेस ी हराबल दस्ते के रूप में कार्य कर रही है। कांग्रेसी नेताओं द्वारा बार-बार गवा शब्द को आतंकवाद के साथ जोडने का प्रयास उसकी इसी नई रणनीति का परिचायक है। हिन्दु आतंकवाद और प्रकारान्तर में गवा आतंकवाद की अवधारणा को स्थापित करने के प्रयास इसी की ओर संकेत करते हैं। हिन्दु दर्शन, हिन्दु चिन्तन और उससे उपजी हिन्दु जीवन शैली स्वाव और प्रकृति से ही आतंकवाद विरोधी है। हिन्दु के ीतर अनेकों उपासना पद्घतियां प्रचलित हैं। और अनेकों चिन्तन धाराएं ी और यह सब इस देश में लाखों वर्षों से निरंतरता में चला आ रहा है। यह वहीं सम्व हो सकता है जहां कोई किताब चिन्तन की बंद किताब नही बन जाती और न ही कोई मसीहा अंतिम मसीहा मान लिया जाता है। चिंतन के इस प्रकार के वातावरण में सैन्य बल पशु बल अथवा बन्दूक बल से आतंक फैलाने की ावना विद्यमान ही नहीं रह सकती। आतंकवाद के बीज उन्हीं समाजों में छिपे रहते हैं जो किसी एक किताब को ही अंतिम किताब घोषित कर देते हैं और किसी एक मसीहा को ही अंतिम मानने का हठ करते हैं। जब यह हठ बढ जाता है तो स्वााविक ही उन समाजों में आतंकवाद के यह बीज अंकुरित होने लगते हैं और उदारवादी समाजों और चिंतन प्रणालियों को पशु बल से धमकाने की मुद्रा में आ जाते हैं। हिन्दु समाज स्वाव और प्रकृति से आतंकवाद का विरोधी ही नहीं है बल्कि वह दूसरी उपासना पद्घतियों अथवा साम्प्रदायों को सुरक्षा की गारंटी ी देता है। यही कारण था कि अपने देश में सामी साम्प्रदायों के आतंकवाद से पीडित होकर सैकडों वर्ष पहले ईरानी, यहूदी और सिरियाई ईसाई इस देश में शरण लेने के लिए आए और इतिहास गवाहा है कि इस देश में उनके साथ कोई ेदाव नहीं किया गया। शरण देने से पहले उन पर उपासना पद्घति बदलने की शर्त नहीं थोपी गई। यह फिर उन्हें अपना मजहब बदलने के लिए आतंकतित नहीं किया गया।  दुर्ागय से ारत सरकार और कुछ विदेशी शक्तियां आज उसी हिन्दुत्व अथवा गवा चेतना को आतंकवाद से जोडकर इस देश के मेरूदण्ड पर प्रहार कर रही है।





ईसा मसीह फिर आए लेकिन नोबो के माध्यम से:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
ईसा मसीह को लेकर ारत में विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। अी पिछले दिनों द विंसी कोडफिल्म ारत में दिखाई गई थी तो अनेक राज्य सरकारों के चेहरे लाल हो गए थे। द विंसी कोडफिल्म में यह कहा गया थाकि ईसा मसीह को न तो क्रास पर लटकाया गया था और न ही उन्हें उस प्रकार शहीद किया गया था, जिस प्रकार चर्च सारी दुनिया को बता रहा है। इस ऐतिहासिक उपन्यास के लेखक का मत था कि ईसा मसीह ने शादी ी की थीऔर उनके बच्चे ी हुए थे और उन्होंने एक सामान्य जीवन जीया था। ारत में अनेक राज्यों की कांग्रेस सरकारों ने इस फिल्म पर प्रतिबंध ही लगा दिया। आखिर कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी है जो खालिस रोम की रहने वाली हैं। कांग्रेसी मुख्यमंत्री सोनिया गांधी की हाजिरी में ईसा मसीह के बारे में इस प्रकार की बातें कैसे सुन सकते थे? लेकिन धीरे-धीरे यह बात ठंडी होती जा रही थी कि अब ईसा मसीह को लेकर एक बार फिर विवाद नए रूप में सामने आ रहा है।
लखनऊ के लाॅरेटो पब्लिक स्कूल में यीशु मसीह के एक उपासक नब कुमार ने दावा कर दिया कि उसमें ईसा मसीह की आत्मा आ गई है। वह मंच पर ही घूम-घूम कर बचकानी हरकतें करने लगा। एक अखबार के अनुसार- बच्चों को इकट्ठा किया गया। फादर सेबस्टीन ने नब कुमार को पेश किया और कहा कि इसके अंदर प्रु यीशु प्रवेश करेंगे । वह सबको आर्शीवाद देंगे। फादर ने धार्मिक अनुष्ठान किया। उसके बाद नब कुमार डरावनी आवाजें निकालने लगा और अजीब सी हरकतें करने लगा। इस पर कई बच्चियां बेहोश हो गई।स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां घबरा गईं। लेकिन नब कुमार उनके सिरों पर पवित्र पानी छिड़क रहा था और उन्हें हर हालत में ईसा मसीह से साक्षात्कार कराने के लिए आमादा था । स्वााविक ही स्कूल में गदड़ मची। लेकिन स्कूल के प्रबंधक ी पहुँचे हुए आध्यात्मिक पुरूष ठहरे । वे ी अपने वचनों पर कायम थे। स्कूल की पिं्रसीपल का कहना था कि स्कूल के बच्चों की आध्यात्मिक उन्नति का जिम्मा ी उन्हीं का है। इसलिए नब कुमार द्वारा की जाने वाली ये हरकतें उचित हैक्योंकि ये बच्चों को आध्यात्मिक उन्नति के सोपान पर ले जाती हैं। लेकिन बच्चे शायद आध्यात्मिक उन्नति की इतनी ज्यादा सीढि़यां चढ़ने के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए वे घबरा रहे थे और चिल्ला रहे थे। स्कूल वालों के लिए तो यह मानो एक उत्सव पर्व ही था। अी तक स्कूल में ईसा मसीह के एजेन्ट पादरी, विशप इत्यादि ही आते जाते थे। इस बार साक्षात ईसा मसीह खुद ही पहुँच गए। चाहे वे नब कुमार के शरीर के माध्यम से ही प्रकट हुए थे। लेकिन महापुरूषों का तो किसी ी ेष में आ जाना ही लाकारी होता है। हिन्दुस्थान समाचार के कोलकाता के संवाददाता श्री किंशुक पल्लव विश्वास ने नब कुमार के बारे में कुछ रोचक जानकारियां जुटाई हैं। ‘‘लखनऊ  के लारेटो विवाद का मुख्य सूत्रधार नब कुमार मण्डल है जिसे  मुर्शिदाबाद के बहरामपुर चर्च के फादर सेबस्टीन कझीपाला ने यीशु के प्रतिनिधि के तौर पर समाज में प्रचारित किया । यह तथाकथित चमत्कारी व्यक्ति नादिया जिले में शान्तिपुर में चांदरा गाँव का रहने वाला है । 1999 तक वह रिक्शागाडी चलाता था और आस पास के क्षेत्रों में सब्जी बेचता था । नब कुमार मण्डल एक विकलांग और बीमार व्यक्ति था । 
नब कुमार  ने प्रचारित किया कि उसकी दोनों किडनी खराब हो गई थीं परन्तु एक रात यीशु और मेरी उसके सपनों में आये और एक गिलास पानी देकर उसे पीने को कहा। पानी पीते ही वह स्वस्थ हो गया । नब कुमार ने ये बातें अन्य गाँववालों को बतानी शुरू कीं । यद्यपि गाँव के स्थानीय अध्यापक  ने इस पर आश्चर्य जताया कि दोनों किडनी खोकर कोई कैसे जी सकता है परन्तु स्थानीय गाँव वाले नब कुमार के पास अपने इलाज के लिये आने लगे । नब कुमार फादर सेबस्टीन की सहायता से मुर्शिदाबाद जिले के बहरामपुर सप्ताह में एक दिन जाने लगा।  सांपों के  इस क्षेत्र में नब कुमार ने अपना जादू दिखाना शुरू किया क्योंकि उसे पता था कि अधिकांश सांप जहरीले नहीं होते । 17 सितम्बर को दिलीप हलदर को जहरीले सांप ने काट लिया और नबकुमार ने अपना जादुई पत्थर लगाया परन्तु उसकी हालत बिगड़ती गई और अस्पताल जाते समय रास्ते में उसकी मौत हो गई । नब कुमार के यीशु के प्रतिनिधि या शरीर में यीशु के प्रवेश करने के दावे पर स्थानीय गाँव वालों के बीच स्थानीय विज्ञान क्लबों ने जागरूकता अियान ी चलाया । बारह विज्ञान क्लबों ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में नब कुमार के विरूद्ध ज्ञापन ी दिया था । शान्तिपुर पुलिस स्टेशन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की । बाद में पता चला कि रिपोर्ट न लिखने के पीछे स्थानीय सŸााधारियों का दबाव था । फादर सेबस्टीन और सŸााधारी दल क सहयोग से नब कुमार शक्तिशाली होता गया । इस बीच उसने अपनी जादुई चिकित्सा और यीशु पर एक पुस्तिका छापी । एक स्थानीय पत्रकार ने आरोप लगाया कि इस पुस्तिका के प्रकाशन में प्रिन्टिंग कानून का उल्लंघन किया गया था । नब कुमार ने ने चांदरा गाँव में फातिमा और पवित्र वन नाम से चर्च बना लिया और  देखाल के लिये एक व्यक्ति को नियुक्त किया । नब कुमार के साथ रिक्शा गाड़ी चलाने वाले उसके पूर्व मित्र और इस्लाम से ईसाई बने आसान विज ने नब कुमार को ऐसी हरकतें करने से रोका और  न मानने पर  नबकुमार की इस फर्जी चिकित्सा के विरूद्ध गाँववालों को जागरूक करना शुरू किया । आसान को अनेक झूठे मामलों में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया । इस समय वह जमानत पर है । ’’
वैसे तो यह ारत का सौाग्य हैकि पहले इस देश की ौतिक उन्नति के लिए रोम से सोनिया गांधी आईं और अब आध्यात्मिक उन्नति के लिए साक्षात ईसा मसीह ही प्रकट हो गए। इस युगान्तरकारी घटना पर ारत का मीडिया ी स्तब्ध है। मानस में गोसाईं जी कहते है उसकी कृपा हो जाए तो गूंगा बोलने लगता है। इधर मामला कुछ उल्टा है। वेटिकन के इन नए आध्यात्मवादियों की कृपा से ारत का मीडिया बोलते-बोलते अचानक गूंगा हो गया है। पीछे गणेश जी के दूध पीने की चर्चा चली थी। तीर्थंकर की मूर्ति से पानी निकलने की चर्चा ी चली थी। तब सारे मीडिया की हालत देखने लायक होती थी। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया इस घटना की खबर देने के बाद तुरंत उछलना शुरू कर देते थेऔर ऊंची-ऊंची आवाज में चिल्लाते हुए गला बिठा लेते थेकि यह अंधविश्वास की पराकाष्ठा है।  ारतीय समाज अी ी मध्यकाल में जी रहा है। मीडिया के कई लोग तो कई दिन इसी दुःख में रोते रहे कि पढ़े-लिखे लोग ी मंदिर के आगे लाइन लगाकर खड़े हैं। लेकिन लगता है अब लखनऊ के लाॅरेटो पब्लिक स्कूल में ईसा मसीह के आगमन की घोषणा करने वालों के मामले में वे गूंगे हो गए हैं। हो सकता है मीडिया की ी आध्यात्मिक उन्नति हो रही हो। कोई यह कहने को तैयार नहीं हैकि यह पाखंड और धूर्तता की पराकाष्ठा है। स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों को रहस्यवादी मनोवैज्ञानिक क्रियाओं द्वारा उलझाने और डराने का षड़यंत्र है।
पता चला है इधर सरकार ने एक ऐसा कानून ी बना रखा हैकि जो इस प्रकार के अंधविश्वासों और पाखंड को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही का प्रावधान करता है । लेकिन अी तक ऐसी कोई खबर नहीं आई है कि सोनिया गांधी की सरकार इस अनोखे नब कुमार के खिलाफ कोई कार्यवाही करने की सोच रही हो। देश र में फैले हुए चर्च और उनके द्वारा चलाए जा रहे स्कूल एवं अन्य संस्थाएं बाल मानस में अंधविश्वास तो जगा ही रहीं हैं, साथ ही उनके मन में छोटी उम्र में ही ईसा मसीह का य बैठा रही हैं। चर्च ने पता नहीं नब कुमार जैसे कितने एजेन्ट ारत वर्ष में छोड़ रखे हैं, जो जगह-जगह यीशु के नाम पर अंधों को रोशनी प्रदान करने का दम् र रहे हैंऔर लंगड़ों को दुड़की चाल में दौड़ा रहे हैं। कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री रह चुके धर्म सिंह ने तो अपने कार्यकाल में चर्च के एक ऐसे ही एजेन्ट हैनरी बिन को बुलाया था जो मंच पर उछलकूद कर लोगों का कैंसर दूर करने का दावा कर रहा था। आश्चर्य की बात यह थी कि कर्नाटक का सारा मंत्रिमंडल हैनरी बिन की जी हजूरी में हाथ बांधकर खड़ा नजर आ रहा था। लाॅरेटो पब्लिक स्कूल की पिं्रसिपल की ॰ष्टि में तो नब कुमार एक बहुत पहुँचा हुआ संत है। हो सकता है वह हैनरी बिन से ी बड़ा संत हो। लेकिन पिं्रसिपल का दुर्ाग्य है कि नब कुमार के ीतर आए हुए ईसा मसीह के नाम से बच्चे यीत हो रहे थे, शांति का अनुव नहीं कर रहे थे। अब अपने देश में सोनिया गांधी है, हैनरी बिन है और अब ये एक नई चीज नब कुमार ी है। तो देश के लोग निश्चय ही यीत होंगे। शांति का अनुव तो नहीं कर सकते।  लेकिन इटली और वैटिकन में तो निश्चय ही शांति का ही अनुव किया जा रहा होगा, क्योंकि उनके ेजे हुए नब कुमार अपने काम ठीक ढंग से अंजाम दे रहे हैं।
वैसे नब कुमार के माध्यम से ईसा मसीह के ारत आने का एक और कारण ी हो सकता है। ईसा मसीह ने जिस ईसाई समाज का निर्माण किया थाउसमें कोई जाति नहीं है। परन्तु इधर विशपों ने ारत सरकार को एक लम्बा ज्ञापन दिया हैकि ईसाई समाज में अनेक जातियां हैंऔर कई जातियां तो अछूत हैं। हो सकता है कि विशपों ने यह ज्ञापन ी सरकार के कहने पर ही दिया हो क्योंकि सोनिया गांधी की सरकार ने ज्ञापन के मिलते ही या एक प्रकार से उससे पहले ही ईसाई समाज में अछूत जातियों की पहचान करने और उन्हें आरक्षण देने के प्रश्न पर संस्तुति करने के लिए एक आयोग का गठन कर दिया। अब हो सकता है कि यीशु ने अपने विशपों और कार्डिनलों द्वारा ईसाई मत के इस अपमान से दुःखी होकर स्वयं ारत आने का निर्णय कर लिया हो । उन्हें आशा होगी कि उन्हें अपने बीच में पाकर तो विशप यह मान लेंगे कि ईसाई समाज में कोई जाति नहीं है। परन्तु यदि ऐसा ी है तब ी ईसा को निराशा ही हाथ लगेगी, क्योंकि कार्डिनल और विशप ारत को बांटने के साम्राज्यवादी कार्य में जुटे हुए हैं । ईसा मसीह तो उनके लिए केवल एक माध्यम ही है।
(हिन्दुस्थान समाचार)

9.19.2006


धर्मांतरण से राष्ट्रीयता बदलती है

डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
धर्मांतरण शब्द का क्या अर्थ है? सामान्य धारणा के अनुसार एक धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपना लेना ही धर्मांतरण है। यदि धर्मांतरण की परिाषा इतनी सहज है तो इसके साथ जुड़ा हुआ एक और प्रश्न पैदा होता है कि धर्मांतरण पर किसी दूसरे को आपŸिा क्यों होनी चाहिए? धर्म किसी का ी व्यक्तिगत मसला है। वह एक धर्म को स्वीकार करें या दूसरे धर्म को स्वीकार करें इसमें किसी अन्य व्यक्ति अथवा संगठन चाहे वह राज्य ही क्यों न हो दखल देने का अधिकार नहीं है। ऊपर से देखने पर यह ाष्य निर्दाेष दिखाई देता है। लेकिन इसमें सत्य का उतना ही अंश है जितना सर्प-रज्जु प्रकरण में रज्जु को ्रम में साँप समझने वाले व्यक्ति का अपनी इस धारणा पर ॰ढ़ता से अड़े रहना । धर्मांतरण को समझने से पहले धर्म को समझ लेना बहुत जरूरी है। इससे ी बढ़कर यह जरूरी है कि धर्म की अवधारणा को ारतीय पृष्ठूमि में समझा जाए न कि पश्चिमी पृष्ठूमि में। पश्चिम में धर्म की अवधारणाएं चर्च के संगठित होने के बाद में उपजी है और पश्चिम में इन अवधारणाओं के लिए अंग्रेजी के जिस शब्द रिलीजन का प्रयोग किया जाता है। उसका समानार्थी या पर्यायवाची धर्म नहीं है। पश्चिमी अवधारणाओं के अनुसार रिलीजन के दायरे में बहुत सीमा तक ईश्वर को स्वीकारने, उसके स्वरूप और उसके आगे नमन करने या उसकी पूजा करने के तौर-तरीके आते हैं। मौटेतौर पर इन कृत्यों अथवा गतिविधियों का धर्म से कोई तालुक नहीं है। ारतीय पृष्ठ ूमि में धर्म की जो अवधारणा व्याप्त है। वह बहुत सीमा तक कर्Ÿाव्य से मिलती जुलती है। अंग्रेजी में लाॅ शब्द जिस अर्थ को व्यक्त करता है उसका समावेश ी कुछ सीमा तक धर्म में हो जाता है। इसलिए यदि धर्म का अंग्रेजी ाषा में अनुवाद करना अनिवार्य ही हो तो वह कुछ सीमा तक लाॅ और ड्यूटी में समाहित हो सकता है।
धर्म की इस ारतीय पृष्ठूमि से एक और बात स्पष्ट होती हैकि धर्म स्थान व काल से निरपेक्ष है। धर्म सनातन है उसका किसी विशेष सम्प्रदाय से कोई तालुक नहीं है। मनु ने जो धर्म के जो 10 लक्षण दिए हैं वे अपने आप में सार्वौम है। इसलिए ारतीय शाóों में धर्म के आगे किसी विशेषण का प्रयोग नहीं किया।
यहां एक और प्रश्न पर ी विचार करना क्या धर्म का ईश्वर से कोई संबंध है? ईश्वर के अस्तित्व पर विचार करना उसकी प्रकृति के बारे में अनुसंधान करना जगत और जीव और ईश्वर के परस्पर संबंधों की व्याख्या करना प्रकृति और पुरूष की अवधारणाओं पर चिंतन करना ये सारे विषय ारतीय परंपरा में दर्शन शाó के विषय है । मौटेतौर पर धर्म का इनसे कोई संबंध नहीं है। कुछ लोग यह मान लेते है कि धर्म आस्तिक प्राणियों का विषय है । जबकि धर्म का आस्तिक होने या नास्तिक होने से कोई संबंध नहीं है। धर्म नास्तिक के लिए ी और आस्तिक के लिए ी उसी समान रूप से मान्य होना चाहिए। धर्म का विपरीत अधर्म है न कि नास्तिक । धर्म को लेकर जो ्रम फैला हुआ है उसका कारण यह है कि लोग धर्मशाó, दर्शनशाó और सम्प्रदाय शाó का एक साथ घालमेल कर देते हैं। इस विवेचन में सम्प्रदाय की अवधारणा को ी स्पष्ट करना जरूरी है। सम्प्रदाय से क्या निहितार्थ है? जो लोग ईश्वर के एक विशेष स्वरूप को मानते हैं, उसकी एक विशेष ढंग से पूजा करते हैं, पूजा विधि के लिए निश्चित पद्धति का पालन करते हैं। वे एक सम्प्रदाय के अंग माने जाएंगे। जाहिर है कि एक सम्प्रदाय के लोग ीतर ही ीतर किसी एक तंतु से बंधे हुए होंगे। लेकिन यह बंधन नकारात्मक नहीं हैऔर इसका कहीं धर्म से टकराव ी नहीं है । धर्म का क्षेत्र अलग है और सम्प्रदाय अथवा पंथ, जिसे अंग्रेजी ाषा में रिलीजन कहा जाता है, का क्षेत्र बिल्कुल अलग है। इस पूरे ाष्य के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि धर्मांतरण नाम की कोई प्रक्रिया नहीं है। क्योंकि धर्म सी के लिए एक समान है। या तो कोई व्यक्ति धर्म का पालन करने वाला हो सकता है या फिर वह अधर्मी हो सकता है।  धर्म बदलने की स्थिति तब आती है यदि अनेक धर्म हों। वास्तव में ऐसा तो है नहींं विश्व में धर्म सी के लिए समान है और उसका पालन ी व्यक्ति को अपने कर्Ÿाव्य के अनुसार ही करना होता है।
धर्मांतरण तो संव नहीं है लेकिन मतांतरण संव है। मत अथवा पंथ अथवा सम्प्रदाय मूलतः एक ही अवधारणा के द्योतक है। कोई व्यक्ति यदि अपना मत अथवा पंत छोड़कर दूसरे मत अथवा पंथ में दीक्षित हो जाता है तो इसको मतांतरण कहा जाएगा। उदाहरण के लिए कोई वैष्णव मत को मानने वाला है। अब यदि वह उसको छोड़कर शैव मत को स्वीकार कर ले तो इसे मतांतरण कहा जाएगा। इसी प्रकार कोई शैव पंथी यदि मोहम्मद पंथी हो जाता है तब ी यह मतांतरण की कहलाएगा। इस उदाहरण को आगे ी बढ़ाया जा सकता है। कोई रविदास पंथी या नानक पंथी यीशु पंथी हो जाता हैतो यह ी मतांतरण के खाते में ही आएगा।
अब प्रश्न पैदा होता हैकि मतांतरण से संबंधित व्यक्ति को छोड़कर इस पूरी प्रक्रिया में किसी दूसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप कैसे हो सकता है? कोई व्यक्ति राम को स्वीकार करता है, या फिर अपनी विशिष्ट पद्धति से दुर्गा की पूजा करता है या फिर मस्जिद में जाकर अल्लाह को सिजदा करता है तो इसमें किसी तीसरे व्यक्ति को क्या आपŸिा हो सकती है? विवेचन के इस मरहले पर हमें राष्ट्र और राष्ट्रीयता की अवधारणाओं पर विचार करना होगा। क्योंकि अनुव ने सिद्ध किया हैऔर तथ्यात्मक अनुसंधान के निष्पक्ष निष्कर्षों से पता चलता है कि मतांतरण से राष्ट्रातांतरण की प्रक्रिया प्रारं होती है।
राष्ट्र क्या है? इसे समझने के लिए राज्य की अवधारणा को समझना होगा। राज्य एक स्थूल ईकाई है। एक निश्चित ूमि खंड है। इसे विश्व के मानचित्र पर नंगी आँखों से देखा जा सकता है इसकी सीमाओं को पहचाना जा सकता है। लेकिन क्या राष्ट्र को ी किसी मानचित्र पर अंकित किया जा सकता है? मौटे तौर पर कहा जाता है कि राष्ट्रीयता की अवधारणा के लिए किसी ूमिखंड का होना जरूरी नहीं है। राष्ट्रीयता एक समान संस्कारों सांझी विरासत इतिहास, ावनाओं, संवेदनाओं से निर्मित होती है। इन सी के प्रति समान ाव से लगाव राष्ट्रीयता को जन्म देता है। इसमें संस्कृति सम्मेलन ी होता है। संस्कृति में ईश्वर संबंधी अवधारणाएं और उसकी पूजा पद्धति का समावेश ी अपने आप ही होता है। ाषा राष्ट्रीयता के निर्माण में महत्वपूर्ण ूमिका अदा करती है। साहित्य की ी अपनी ूमिका है । परंतु इससे ी बढ़कर महत्वपूर्ण है। ाषा और साहित्य के ीतर का कथ्य । ाषाएं अलग-अलग ी हो सकती है । लेकिन कथ्य एक समान रहता है। तीर्थस्थान, प्रतीक, बिम्ब ये सी ी राष्ट्रीयता के निर्माण में महत्वपूर्ण ूमिका अदा करते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो राष्ट्रीयता एक मानसिक स्थिति का नाम है। जिसको अनुव किया जा सकता है । जिससे हृदय द्रवित होता है। राष्ट्रीयता मूलतः ाव पक्ष है। परंतु यहां यह ी ध्यान रखना चाहिए कि इस ाव पक्ष की रचना किसी न किसी ूमि खंड पर ही होती हैऔर ाव पक्ष के कारण वह ूमि । ूमि न रहकर माता का दर्जा पा जाती है। नदियाँ साधारण जल का स्रोत न रहकर देवत्व को प्राप्त हो जाती है। वृक्ष देवी देवताओं के समकक्ष हो जाते हैंऔर प्रतीक या बिम्ब राष्ट्रीय अस्मिता के वाहक हो जाते हैं। राष्ट्रीयता का विकास होता हैऔर उसके स्वरूप को विकसित करने में हजारों-हजारों वर्ष लगते हैं। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीयता ाव ही जड़ ाव है। वह चेतन ाव है, उसमें परिवर्तन ी होता रहता है। लेकिन वह परिवर्तन उसी प्रकार है जिस प्रकार माता पिता की आँखों के सामने पाँच मास का बच्चा पचास साल का हो जाता है। लेकिन उन्हें अन्ततः पता नहीं चल पाता कि यह कब बड़ा हो गया। राष्ट्रीयता अपने आप में जल से गंगा जल बनने की प्रक्रिया का नाम है। यह जरूरी नहीं है कि कोई राष्ट्रिक उसी ूमि पर निवास करे जिस ूमि के इर्द-गिर्द राष्ट्रीयता का विकास हुआ है। राष्ट्रीयता राष्ट्रिक के हृदय में निवास करती है । वह विश्व के किसी ी ू-ाग में रहे। अपनी राष्ट्रीयता को वह अपने साथ ही ढोता है। जिस प्रकार अस्थियों पर मज्जा का आवरण है। जिस प्रकार शरीर में आत्मा का निवास है परंतु यह पहचानना है मुश्किल है कि यह आत्मा कहां रहती है? उसी प्रकार मानव मस्तिष्क के ीतर राष्ट्रीयता का निवास हैं ।
इस विवेचन के बाद हम इस प्रश्न पर चर्चा करेंगे कि मतांतरण से राष्ट्रांतरण कैसे होता है? लेकिन इस प्रश्न पर विचार करने से पहले इससे जुड़ा हुआ एक छोटा सा और बिंदू हमारा ध्यान आकर्षित करता है। ारत के ीतर ही अनेक अलग-अलग मतावलंबी है। शैव, वैष्णव, शाक्त, लिंगायत, वीरशेव, राधा स्वामी, नरेन्द्र कारी, कबीर पंथी, दादू पंथी और न जाने कितने ही । अब प्रश्न यह है यदि कोई शैव मतावलंबी वैष्णव मतावलंबी हो जाता हैतो उससे राष्ट्रांतरण का खतरा क्यों उत्पन्न नहीं होता? दरअसल ारत के ीतर जितने मत अथवा पंथ विद्यमान है। वे ऊपर से अलग होने पर ी ीतर से हजारों-हजारों तंतुओं के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए है। उनमें इतने समान धरातल हैकि आस्था के असमान धरातल ी अंततः उन्हीं समान धरातलों की ओर ले जाते हैं। वििन्न मतावलंबियों के बीच दर्शन शाó की गुथियों को लेकर मतेद है और यह मतेद ारतीय परंपरा में सकारात्मक माना जाता है, नकारात्मक नहीं और एक ्रप्रकार से इसे प्रोत्साहन ी दिया जाता है। अतः वििन्न ारतीय मतों को मानने वालों के अंतर संबंध शाóार्थ के माध्यम से कुष्ट होते रहते हैं। ीतर का मतांतरण तुष्टिकरण का मार्ग है। अलगाव का मार्ग नहीं ।
इसलिए मौटेतौर पर रत में व्याप्त वििन्न मतावलंबियों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है।
1 ारतीय मतावलंबी
2 अारतीय मतावलंबी ।
अारतीय मतावलंबियों में ईसाई और इस्लाम मत का समावेश होता है। इसमें यहूदी सम्प्रदाय ी आता है परंतु क्योंकि यहूदियों मतांतरण की परंपरा नहीं है इसलिए इस विवेचन में उनको बाहर ही रखा गया है। विवेचना के इस मोड़ पर हमारा विश्लेषण और मुद्दे अत्यंत स्पष्ट हो गए हैं।
1. क्या ारतीय मतावलंबियों के अारतीय मतों को ग्रहण करने से राष्ट्रांतरण होता है
2. यदि होता है तो उसकी प्रक्रिया क्या है?
जहां तक पहले प्रश्न का उŸार है उसके लिए बहुत ज्यादा प्रमाण एकत्र करने की जरूरत नहीं हैक्योंकि वह परिणाम रूप में हमारे सामने आ चुका है। ारत के जिस ूमि खंड पर सर्वाधिक मतांतरण हुआ उस ूमि खंड ने कालांतर में स्वयं को ारतीय राष्ट्र से अलग घोषित कर दियाऔर अपने आपको इस राष्ट्र का अंग मानने से मना कर दियाऔर यहां की राष्ट्रीयता से अपना संबंध विच्छेद कर लिया। पाकिस्तान और बांग्लादेश का निर्माण मतांतरण से राष्ट्रांतरण हो जाने की मान्यता का स्पष्ट प्रमाण है।
(हिन्दुस्थान समाचार)
 
राजनांद गांव में कांग्रेस की जीत के अर्थ: डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
Ÿाीसगढ़ में पिछले दिनों लोकसा के राजनांद गांव क्षेत्र के परिणामों ने कुछ लोगों को चैंका दिया है। यह सीट मूलतः राज्य के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की सीट है। फिलहाल इस पर ारतीय जनता पार्टी के श्री प्रदीप कुमार सांसद थे। लेकिन पिछले साल जब लोकसा में पैसे लेकर प्रश्न पूछने का ंड़ा फोड़ हुआतो प्रदीप ी उसमें गुल हो गए। उस सीट पर पिछले दिन हुए चुनाव में ाजपा 50 हजार से ी  ज्यादा मतों से हार गई हैऔर यह सीट कांग्रेस ने जीत ली है। अखबारों ने सीधी-सीधी व्याख्या दे ही दी है कि राज्य से में ाजपा की लोकप्रियता कम हो रही है। ऊपर से देखने पर कोई ी विश्लेषक इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा। लेकिन थोड़ा गहराई से विचार करने पर कुछ तथ्य ध्यान में आते हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी शुरू से ही इस बात का दावा कर रहे थे कि यह सीट ाजपा किसी ी हालत में नहीं जीत सकती। इस पर कांग्रेस ही जीतेगी । उधर नक्सलवादियों ने चुनाव के बहिष्कार का आह्नान किया हुआ था। नक्सलवादियों ने शायद कांग्रेस को यह ी निर्देश दिया हुआ था कि इस चुनाव के क्षेत्र में चुनाव प्रचार करने के लिए विधान सा में कांग्रेस प्रतिपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा को न बुलाया जाए। महेन्द्र कर्मा ने पूरे प्रदेश में नक्सलवादियों के खिलाफ जन जागरण अियान छेड़ा हुआ हैऔर आश्चर्य का विषय यह है कि महेन्द्र कर्मा इस चुनाव में कांग्रेस का चुनाव प्रचार करने नहीं गए। जब अजीत जोगी से इस पर प्रश्न किया गया तो उनका कहना था कि वहां के कांग्रेसी प्रत्याशी को महेन्द्र कर्मा की सहायता की जरूरत नहीं थी। वैसे छŸाीसगढ़ में आम चर्चा है कि नक्सलवादियों का कांग्रेस के साथ गठजोड़ है। पूरी कांग्रेस के मामले में शायद यह सही न ी हो परंतु ीतरी जानकार यह कहने से नहीं हिचकिचाते कि अजीत जोगी के गुट का नक्सलवादियों के साथ कहीं न कहीं तालमेल बैठा हुआ है। अन्यथा नक्सलवादियों के बहिष्कार के आह्नान के बावजूद नक्सल प्रावित क्षेत्रों में 70 प्रतिशत से ी ज्यादा मतदान कैसे संव हो सकता है? प्रयवेक्षक मानते हैं कि चर्च और नक्सलवादी कहीं न कहीं एक दूसरे का समर्थन करते हैं। क्योंकि चर्च ी ईसाईयों के लिए अलग राष्ट्रीयता का नारा लगाता है और नक्सलवादी ी ारतीय संस्कृति को वैचारिक तौर पर नकारते हैं। जहां तक कांग्रेस का ताल्लुक है कांग्रेस के लिए ारतीय संस्कृति और ारतीय राष्ट्रीयता प्राथमिकता का मुद्दा नहीं है। कांग्रेस के लिए संस्कृति और राष्ट्रीयता के वही अर्थ है जो मैकाले और माक्र्स स्थापित कर गए थे। सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरातल पर शिखर च्युत होने से जो शून्य पैदा होता है उसी शून्य को रने का प्रयास नक्सलवाद और चर्च कर रहा है। नक्सलवाद और चर्च इस प्रक्रिया के अंतर्गत पहले शून्य उत्पन्न करता है उसके बाद उसको रता है। इस पूरी प्रक्रिया में सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संस्खलन हो जाता है। इसलिए पूँजीवाद, उत्पादन और उत्पादन के साधन के मुद्दे पर चाहे चर्च और नक्सलवाद अलग ध्रुवों पर खड़े हों लेकिन जहां तक ारतीयता और उसके सांस्कृतिक प्रवाह को अवरूद्ध करने का प्रश्न है दोनों एक दूसरे के पूरक नजर आते हैं। छŸाीसगढ़ में चर्च और नक्सलवाद के इस ध्रुवीकरण में अजीत जोगी एक महत्वपूर्ण ूमिका में अवस्थित है क्योंकि वे जहां एक ओर चर्च का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे दूसरी ओर कांग्रेस के प्रतिनिधि हैं।  इन दोनों के हितों से नक्सलवादियों के हित कहीं नहीं टकराते। नक्सलवादी ये जानते हैं कि ाजपा से इनका विरोध केवल राज्य शासन की ॰ष्टि में कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर नहीं है। बल्कि यह विरोध वैचारिक धरातल पर ी है। कांग्रेस से विरोध केवल कानून व्यवस्था के ॰ष्टिकोण से ही हो सकता है । इन सी कारणों से छŸाीसगढ़ में नक्सवादियों को कांग्रेस अपने ज्यादा अनुकूल लगती है और ाजपा धुरविरोधी । यहाँ इस बात का ी ध्यान रखना चाहिए कि जब से आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने राज्य सŸाा संाली है तो नक्सलवादियों की गतिविधियाँ वहां सीमित हो गई हैं और सारा जोर छŸाीसगढ़ के बस्तर पर सिमट आया है। ऐसा नहीं कि आंध्र प्रदेश में नक्सलवादियों ने अपना कार्य बंद कर दिया है। नक्सलवादियों का अियान उसी जोर शोर से जारी है। राज्य सŸाा ने उसमें अवरोध लगाना बंद कर दिया है। इस पूरी पृष्ठ ूमि में राजनांद गांव की सीट कांग्रेस के लिए इतनी प्रतिष्ठा की सीट नहीं थी जितनी नक्सलवादियों के लिए बन गई थी।
परंतु इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि ाजपा को अपनी पराजय के इन कारणों को जानकर अपने उŸारदायित्व से पल्ला झाड़ लेना चाहिए। छŸाीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त कराना ाजपा का वैचारिक दायित्व ी हैऔर क्योंकि राज्य में ाजपा की सरकार है  इसलिए संविधानिक दायित्व ी । परंतु प्रश्न यह है कि राजनांद गांव की पराजय के बाद क्या इसमें छिपे संदेश को ाजपा पढ़ पाएगी?

(हिन्दुस्थान समाचार)

प्रतिभा पाटिल की प्रतिा के शुरू हुए चर्चे

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 23 जून 2007

स्थान: नई दिल्ली

जब सोनिया गांधी की कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद के लिए जलगांव की श्रीमती प्रतिा पाटिल का नाम प्रस्तुत किया तो राजनैतिक विश्लेषक उसी प्रकार चैंके थेजिस प्रकार इंदिरा गांधी द्वारा ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किए जाने पर चैंके। यह ठीक है कि राष्ट्रपति पद ज्यादातर रबड़ की मोहर ही मानी जाती है और इस पद के साथ बहुत ज्यादा संवैधानिक शक्तियाँ नहीं हैं। परंतु राजनीतिज्ञों ने इस रबड़ की मोहर को ी धीरे-धीरे ुरुरी रबड़ ही बना दिया है। प्रतिा पाटिल की क्या प्रतिा है इस पर विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह प्रश्न व्यक्ति सापेक्ष है। प्रतिा देखने वाले की नजर में होनी चाहिए। व्यक्ति के ीतर की प्रतिा का प्रश्न बाद में पैदा होता है। हो सकता है कि सोनिया गांधी को प्रतिा में खास प्रतिा दिखाई देती होऔर जयललिता को वह बिल्कुल ी दिखाई न देती हो। इसलिए इस प्रश्न पर चर्चा करना बेमानी है। परंतु राष्ट्रपति वन में पहुंचने से पहले ही प्रतिा पाटिल को लेकर जो चर्चा हो रही है वह उनकी आंतरिक प्रतिा के बारे में नहीं है बल्कि उनके कर्म क्षेत्र के बारे में है। जलगांव की एक कांग्रेसी नेता रंजनी पाटिल ने बकायदा एक प्रेस कांफ्र्रेस करके आरोप लगाया है कि उसके पति की हत्या में प्रतिा पाटिल के ाई का हाथ है और उन्होंने अपने ाई को बचाने के लिए आजतक उसके पति की हत्या की निष्पक्ष जांच नहीं होने दी। रजनी पाटिल का कहना है कि वे अपने पति के हत्यारों को कटघरे में खड़ा करने के लिए जमीन आसमान एक करती रही लेकिन प्रतिा पाटिल के चलते उसे न्याय नहीं मिल सका। अंततः सर्वाेच्च न्यायलय के कहने पर हत्या की जांच का काम सीबीआई को सौंपा गया। रजनी पाटिल का आरोप है कि प्रतिा पाटिल ने विवेक के क्षणों में अपने तथाकथित हत्या के आरोपी ाई का साथ दिया और न्याय प्रक्रिया को बाधित किया।

प्रतिा पाटिल की प्रतिा का दूसरा किस्सा हत्या या न्याय से संबंधित नहीं है बल्कि जलगांव की एक चीनी सहकारी मिल को एक बैंक द्वारा दिए गए साढ़े सत्रह करो़ड का है। ऊपर से देखने पर कहा जा सकता है कि यदि किसी सहकारी मिल ने बैंक का पैसा नहीं लौटाया तो इसमें प्रतिा पाटिल क्या कर सकती है? दरअसल इस सहकारी मिल की अध्यक्षा प्रतिा पाटिल ही थींऔर जब उन्होंने अध्यक्ष पद त्याग दिया तो उनके पति इस मिल के अध्यक्ष बन गए। जहां यह ी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इस मिल की स्थापना ही प्रतिा पाटिल ने की थी। यदि मौटे तौर पर गांव की ाषा में बात की जाए तो कहा जा सकता हैकि प्रतिा पाटिल ने अपने कुछ मित्रों और पारिवारिक लोगों के साथ मिलकर एक सहकारी मिल की स्थापना की । किसी बैंक से साढ़े सत्रह करोड़ रुपया कर्जा लिया। परंतु वापिस करने के नाम पर अंगूठा दिखा दिया। बैंक वाले इस किस्से में कानूनी स्थिति और कानूनी अडचनंे क्या हैं? यह तो कानूनविद् ही जानते होंगे लेकिन आम आदमी यह मानकर चलता है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को केवल कानून की ॰ष्टि से ही ईमानदार नहीं होना चाहिए बल्कि जन अवधारणा में ी उसकी छवि शंका से परे रहनी चाहिए।
प्रतिा पाटिल के ऊपर लगे ये आरोप अर्थ क्षेत्र और कर्म क्षेत्र के है। परंतु दूसरी स्थिति इससे ी चिंताजनक  है। आखिर सोनिया गांधी प्रतिा पाटिल को राष्ट्रपति बनाने के पीछे किस रणनीति पर काम कर रही हैं और विष्य में यह रणनीति किधर ले जाएगी ? ारत में पिछले कुछ अरसे से ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां बहुत तेजी से बढ़ रही है। इस शताब्दी में ारत को ईसाई बनाने की घोषणा  पोप खुद ारत में आकर कर गए थे। ारत में ी बहुत से लोग ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों से चिंतित है क्योंकि अनुव यह बताता है कि मतांतरण से राष्ट्रांतरण हो जाता है। शायद इसी चिंता के कारण कुछ राज्य सरकारों ने छल, बल, य और धन के प्राव से हो रहे मतांतरण को रोकने के लिए कानून बना दिए हैं। सी जानते हैं कि ारतवर्ष में ईसाई मिशनरियों द्वारा किए जा रहे इस मतांतरण के पीछे की रणनीतियां वेटिकन में बनती हैं। परंतु ारतीयों के इस चुनौती को स्वीकारने के लिए जागृत हो जाने के  कारण वेटिकन की योजनाएं मुश्किल में पड़ती जा रही हैं। इसीलिए पिछले साल मई मास में जब ारत के राजदूत अमिता त्रिपाठी वेटिकन में पोप वेनिडिक्ट को अपने दौत्यपत्र प्रस्तुत कर रहे थेतो पोप ने सी परंपराओं का उल्लंघन करते हुए त्रिपाठी को लताड़ लगाई और यह कहा कि ारत जो राज्य सरकारें मतांतरण के विरोध में कानून बना रही है, वे संविधान विरोधी हैं और इन कानूनों को रद्द किया जाना चाहिए। सोनिया गांधी के वेटिकन से रिश्ते जगजाहिर हैं। पोप की इस झाड़ के तुरंत बाद प्रतिा पाटिल ने राजस्थान के राज्यपाल की हैसियत से मतांतरण को रोकने वाले उस बिल पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया जिसे विधानसा ने पारित करके उनके पास ेजा था। जब विधानसा ने उसे दोबारा पारित किया और पुनः प्रतिा पाटिल के पास ेजा तो उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने के बजाय उसे सलाह के लिए राष्ट्रपति को ेज दिया। जाहिर है कि पोप की फटकार के बाद सोनिया गांधी की सरकार ने उनके सुझाए मार्ग पर अमल करना शुरु कर दिया। प्रतिा पाटिल सोनिया गांधी की इस रणनीति में सहर्ष अपनी ूमिका निाने के लिए तैयार हो गईं। ऐसा नहीं कि मतांतरण के मामले में सी कांग्रेसियों ने सोनिया गांधी के सामने हथियार डाल दिए हो। राजस्थान विधानसा द्वारा धर्मांतरण विरोधी बिल पारित किए जाने और उसे प्रतिा पाटिल द्वारा रोक दिए जाने के बाद ही हिमाचल प्रदेश की कांग्रेसी सरकार ने राजा वीरद्र सिंह के नेतृत्व में धर्मांतरण विरोधी बिल पारित कियाऔर राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर ी कर दिए। वीरद्र सिंह ने धर्मांतरण के मामले में सोनिया गांधी के कार्यालय के समस्त दबावों को नकारा क्योंकि यह प्रश्न राष्ट्रीयता से ताल्लुक रखता था। परंतु दुर्ाग्य से प्रतिापाटिल सोनिया गांधी की इस रणनीति का अंग बनने के लिए सहर्ष तैयार हो गईं। राजस्थान का वह धर्मांतरण विरोधी बिल अब राष्ट्रपति के पास लंबित पड़ा है। उसे रद्द करवाने के लिए सोनिया गांधी के पास इससे अच्छा रास्ता और क्या हो सकता है कि प्रतिा पाटिल को ही राष्ट्रपति वन में स्थापित कर दिया जाए। वेटिकन के राष्ट्रपति पोप बेनिडिक्ट प्रसन्न तो होंगे ही । क्योंकि उन्होंने जो कहा ारत सरकार ने उसे पूरा करके दिखा दिया। कैथोलिक ईसाई मानते हैं कि पोप के प्रसन्न होने पर स्वर्ग मिलता है। उस स्वर्ग के लिए प्रतिा पाटिल को राष्ट्रपति बनाना तो बहुत छोटी सी कीमत है।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

चर्च फंस गया कबूतर बाजी में

 डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
जुलाई के अंतिम सप्ताह में आस्ट्रेलिया में विश्व युवा दिवस संपन्न हुआ। इसमें वेटिकन के पोप ने ी ाग लिया। जाहिर है कि जहां पोप आएंगे वहां दुनिया र के ईसाई इक्ट्ठे होंगे। आखिर मजहबी आस्था की बात है। पोप को वैसे ी ईसाई मत में क्त और ईश्वर के बीच मध्यस्थ माना जाता है। इसलिए ईसाई जगत में पोप का रूतबा साधारण साधुसंतों से कहीं ज्यादा होता है। अमूमन तो उनका दर्जा ईश्वर के आसपास ही ठहरता है। ऐसे अवसर पर हर आस्थावान ईसाई सांसारिक पचड़ों से दूर रहकर पोप के प्रवचन सुनने के लिए उपस्थित होना चाहेगा। दुनिया र से लगग दो लाख श्रद्धालु वहां इक्ट्ठे हुए । ऐसे अवसर प्रायः आध्यात्मिकता से परिपूर्ण होते हैं और क्तों की इच्छा रहती  है कि वे जितना संव हो सके सांसारिक बुराइयों से दूर रहने का प्रयास करें। लेकिन चर्च ने यहां ी घपलेबाजी शुरू कर दी और कबूतरबाजी का काम शुरू कर दिया। कहा जा रहा हैकि ारत से जाने वाले ईसाइयों का जत्था सबसे बड़ा था। इन ईसाइयों को न्यूजीलैंड से होते हुए आस्ट्रेलिया पहुंचना था और वहां पोप के दर्शन करने थे और उनका प्रवचन सुनना था। लेकिन चर्च ने जिन यीशु पुत्रों की फौज र्ती की थी  उन क्तों में और चर्च में शायद आध्यात्मिकता का रिश्ता कम था और व्यवसायिक रिश्ता ज्यादा था। वैसे ी नियोगी आयोग ने वर्षों पहले खुलासा कर दिया था कि चर्च ारत के लोगों को छल-बल-कपट से ईसाई मजहब में दीक्षित कर रहा है। बाद में कुछ राज्य सरकारों ने ऐसे कानून ी बनाए या कानून बनाने का प्रयास किया कि किसी ी व्यक्ति का कपट अथवा लो से मजहब परिवर्तन न किया जाए। परन्तु तब पोप ने इतनी आंखें लाल की कि वेटिकन में गए ारतीय राजदूत को सी के सामने अपमानित किया सोनिया गांधी तो ठहरीं इसी पोप की अनुयायी । इसलिए उसने ारत में राज्य सरकारों के लिए ऐसे कानून बनाना ही लगग असंव बना दिया। राजस्थान विधानसा लो और छल से मजहब परिवर्तन को रोकने के लिए अनेक बार बिल पारित कर चुकी है। लेकिन राज्यपाल प्रतिा पाटिल ने उसको राष्ट्रपति तक पहुंचा दियाऔर कहीं गलती से राष्ट्रपति उस बिल को स्वीकृति न दें दें इसलिए सोनिया ने प्रतिा पाटिल को ही राष्ट्रपति वन पहुंचा दिया। जाहिर है चर्च पर अब इस देश में कोई रोक नहीं है और चर्च ने अब लोगों का मजहब परिवर्तन करवाने के लिए कबूतरबाजी का सहारा लेना शुरू कर दिया है। कुछ लोगों को लालच दिया गया होगा कि आपको किसी न किसी ढंग से न्यूजीलैंड या आस्ट्रेलिया पहुंचा देंगे। शर्त यह है कि आप अपना मजहब छोड़कर ईसाई मजहब ग्रहण कर लो। पंजाब और दिल्ली में विदेशों में बस जाने की चाह अन्य प्रांतों से कहीं ज्यादा है और पंजाब में चर्च के पांव गहराई से जम ी नहीं पा रहे थे। इसलिए चर्च ने पंजाबियों की बाहर जाने की कमजोरी को ही पकड़ा और उनके गले में चर्च का सलीव लटकाना शुरू कर दिया। चर्च की सहायता से न्यूजीलैण्ड पहंुचे इन नव परिवर्तित ईसाइयांे में से 40 के लगग तीर्थयात्री न्यूजीलैण्ड में ही गायब हो गए। ये ईसाई न्यूजीलैण्ड के चर्च में ठहरे हुए थे। जब न्यूजीलैण्ड की पुलिस ने सख्ती की तो उनमें से कुछ पकड़े ी गए। उनमें से कुछ ने यह बताया कि हमें न्यूजीलैण्ड में स्थाई रूप से बसाने के लिए प्रति व्यक्ति 17 हजार डाॅलर लिए गए। ताज्जुब इस बात का है कि जब चर्च की यह कबूतर बाजी दिन दहाड़े नंगी हो गई है तो न्यूजीलैण्ड के कैथोलिक चर्च की प्रतिलिपि लिन्डसे फ्रीरर  कह रही है कि जो लोग गायब हुए हैं इसमें आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं है इतने ज्यादा ईसाई क्तों में से 32 का गायब हो जाना कोई मायने नहीं रखता। ये सब वास्तविक तीर्थ यात्री ही हैं। बेचारी फ्रीरर ठीक ही कह रही हैं। चर्च के लिए मुख्य उद्देश्य अपनी ेड़ों की संख्या बढ़ाना है। चर्च को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह ेड़ें पोप के सामने हाजिर होती हैं या फिर न्यूजीलैण्ड मे रहकर ही यीशु की तलाश करती हैं।
यह बड़े दुख का विषय है कि ारत में अपनी ेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए चर्च अब इस स्तर तक उतर आया है बताया तो यह ी जा रहा है कि पोप का आर्शीवाद लेने के लिए दुनिया र से जाने वाले ईसाइयों में सबसे बड़ा जत्था इन ारतीय परिवर्तित ईसाइयों का ही था। जरूरी है कि ारत सरकार इस बात की जांच करवाए कि चर्च कबूतर बाजी के इस काम में कब से जुटा हुआ है? यह अकस्मात ही हुआ कि न्यूजीलैण्ड पुलिस ने गायब होने वाले इन चर्च क्तों को पकड़ लिया अन्यथा पता नहीं चर्च का यह खेल कितनी देर तक और चलता रहता। चर्च अच्छी तरह जानता है कि वह ारत में यीशु मसीह के सलीव या छल से या य से या लो से ही लटकाये जा सकते हैं अन्यथा इनका कोई नाम लेवा नहीं मिल सकता क्योंकि ारतीय परंपरा में ईश्वर और क्त का सीधा संवाद है उसमें दलालों की ूमिका नगण्य है। जब-जब ईश्वर और क्त के बीच दलाल उरे ती समाजसुधारकों  और साधकों ने उसका विरोध किया और दलालों को ईश्वर पथ के रास्ते से हटाया ारतीय परंपरा में गुरु की ूमिका वंदनीय है। दलाल की ूमिका निंदनीय है। लेकिन दुर्ाग्य से ईसाई मत में सारी संरचना ही दलाल की ूमिका पर टिकी हुई है। यही कारण है कि प्रारंिक दौर में ईसाई मत ारत में अपने पैर नहीं जमा पाया । लेकिन पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और ब्रिटिश सŸाा काल में, Ÿाा के बलबूते पर ही चर्च ने साम दाम दंड ेद सी उपायों का प्रयोग करके ईसाई ेड़ों की संख्या बढ़ाने में सफलता प्राप्त की। तब यह प्रश्न उठ सकता है कि यदि चर्च में आध्यात्मिकता और क्ति का पुट नहीं है तो आखिर ारत में ईसाइयों की संख्या बढ़ाने में उसकी रूचि क्यों है? यूरोप का और चर्च का इतिहास जानने वालों के लिए  यह रहस्य छिपा हुआ नहीं है। चर्च आध्यात्मिक क्षेत्र में इतना सक्रिय की नहीं रहा जितना सांसारिक क्षेत्र में । ऐसा माना जाता है कि चर्च यूरोपीय साम्राज्यवाद का हरावल दस्ता है जो किसी ी देश को मानसिक तौर पर अपने गोरे महा प्रुओं की शरण  में जाने के लिए तैयार करता है। ारत में चर्च के इस काले इतिहास में कबूतर बाजी का एक नया अध्याय जुड़ गया है और यदि सोनिया गांधी सचमुच इस देश की मिट्टी से जुड़ गई है तो उनकी पहली परीक्षा का यही अवसर है कि वे चर्च के इन कारनामों की कार्रवाई करवाए।


दिनांक: 20 जुलाई 2008

अनुसूचित जाति समाज को छोड़ कर चले गए लोगों को आरक्षण देने का प्रश्न


- डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
जाति व्यवस्था ारतीय समाज अथवा हिन्दू समाज की आधारूत संरचना में निहित है। इस व्यवस्था के गुण और दोषों पर लंबे अरसे से बहस होती रही है और अब ी हो रही है। कई दफा ऐसा ी होता है कि कोई व्यवस्था किसी समय लादायक और समाज के लिए उपयोगी होती है लेकिन काल प्रवाह में उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है और वह फालतु बोझ बन जाती है। बाज मामलों में ऐसा ी होता है कि वह व्यवस्था केवल बोझ ही नहीं बल्कि समाज की आंतरिक संरचना को खोखला ी करने लगती है। जाति व्यवस्था को लेकर यह तीनों स्थितियां समय-समय पर देखी जा सकती है। इस्लामी आक्रमणों के समय जाति व्यवस्था ने इस देश के लोगों का मजहब परिवर्तन होने से बचाया । ारत हजार वर्ष की इस्लामी गुलामी के बाद ी ारत ही बना रहा। यह व्यवस्था दुनिया के अन्य देशों जिन्होंने इस्लाम अथवा ईसाई देशों के आक्रमणों को झेला है उनकी दिखाई नहीं देती। दुनिया के अधिकांश देश इस्लाम के पहले हल्ले में ही दम तोड़ गए और अपनी संस्कृति, इतिहास और विरासत को छोड़कर उन्होंने नई संस्कृति, नई विरासत और नए इतिहास को ग्रहण कर लिया । उसके बाद इस्लामी आक्रमणों के काल में ी कमोवेश यही स्थिति रही। यही कारण था कि अग्निदेवता की पूजा करने वाला और नित्य प्रति या करने वाला संपूर्ण ईरानी समाज केवल मात्र तीस सालों में ही अपने इतिहास और विरासत पर लानत ेजने लगा और उसने अरबों का इस्लामी चोला धारण कर लिया । संपूर्ण मध्य एशिया, जिसमें की बुद्धम् शरणम् गच्छामि का मंत्र गूंजता था, वह कुछ दशकों में ही इस्लामी आक्रमण की आंधी से दम घुटने के कारण दम तोड़ गया।
ारत ने लगग आठ शताब्दियों तक इस्लाम के आक्रणों का मुकाबला किया । यह काल पराजय का काल ी था और संघर्ष का काल ी था। इसके बाद लगग दो सौ साल तक ईसाई देशों के आक्रमण का मुकाबला किया। लेकिन इसके बावजूद ारत अपनी परंपरा, इतिहास, संस्कृति और विरासत से जुड़ा रहा । सूत्र रूप में से कहना हो तो प्राचीनता में निरंतरता विद्यमान रही। ारत सचमुच ारत ही बना रहा। मोहम्मद इकबाल ने जब लिखा होगा-
यूनान मिश्र रोमा मिट गए जहां से ।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। ।
तो जिस बात के कारण हमारी हस्ती न तो मिटती है और न आजतक मिटी है, उस बात में जाति का ी महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि जाति एक प्रकार की बिरादरी बन गई और जो उस बिरादरी को छोड़कर बाहर जाकर इस्लामपंथी अथवा ईसाईपंथी बना उसको बिरादरी ने बाहर का दरवाजा दिखला दिया। उन दिनों बिरादरी से बाहर हो जाने का अर्थ जीवन का दुर हो जाना ही था। मौलाना हाली ने ी लिखा था-
वो दिने इलाही को बेबाग बेड़ा
किए पार जिसने थे सातों समंद्र
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर
पूरब-पश्चिम, Ÿार-दक्षिण और सातों समुद्रों को जीतने वाला इस्लाम का बेड़ा आखिर गंगा के दहाने में आकर क्यों डूब गया? मोहम्मद इकबाल और हाली इसका कारण  समझा पाए हो या न हो लेकिन कुछ विद्वानों का ऐसा मानना है।  इस दहाने में जाति व्यवस्था के ऐसे गड्ढे थे जिसमें से इस बेड़े का निकलना दुश्वार हो गया थ।
लेकिन धीरे-धीरे यह जाति व्यवस्था अपनी उपयोगिता खोने लगी और इस देश का वास्ता पश्चिमी देशों के इस्लामी आक्रमणों से हुआ। इस्लाम के हाथ में तलवार थी और पश्चिमी देशों के ईसाई आक्रणकारियों के हराबुल दास्ता ें रूप में चर्च चल रहा था जिसके हाथ में तलवार तो नहीं थी लेकिन सेवा का पाखंड और ढाल थी। जिसको आगे करके वह इस देश के लोगों का ईसाई पंथ में परिवर्तन करवाने लगा। अब की बार अंग्रेजों ने जाति व्यवस्था को अपने पक्ष में उपयोग करने की कुटिल  नीति का सहारा लिया। उन्होंने एक लंबी योजना के अंतर्गत जातियों में विषमता उत्पन्न करने का अियान चलाया। इसका अर्थ यह नहीं कि वििन्न जातियों में वैमनस्य नहीं था। लेकिन अंग्रेजों ने उस वैमनस्य को आगे बढ़ाया। जातियों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने में महत्वपूर्ण ूमिका निाई । जात वैमनस्य को बढ़ाने में अंग्रेजों की ूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। इसका उदाहरण ब्रिटिश इंडिध्या और रियासती ारत के सामाजिक विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है। हिमाचल प्रदेश का नीचे का हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अंतर्गत वहां जाति वैमनस्य स्पष्ट देखा जा सकता है। केवल तथाकथित कुछ और निम्न जातियों में ही नहीं बल्कि ब्राह्मण और राजपूत जैसी जातियों में ी। इसके विपरीत रियासिती हिमाचल में जहां सŸाा रियासती राजाओं की थी। जातिगत वैमनस्य बहुत कम देखने को मिलता है। इसका एक प्रमुख कारण यह था कि राजाओं की सŸाा जातियों समीकरण पर निर्र नहीं थी जबकि अंग्रेजों की सŸाा के बने रहने के लिए अनिवार्य था कि वििन्न जातियों के लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाए। अंग्रेज सरकार ने ारत की अनेक जातियों में से कुछ जातियों को सूचीबद्ध करके उन्हें राजपत्र में अनुसूचित कर दिया। ये जातियां अनुसूचित जातियां कहलाई जाने लगी। अंग्रेजों का मानना था कि इन जातियों से जन्मगत कारणों के कारण ेदाव किया जाता है और अनेक जातियों के साथ तो अस्पृश्यता का व्यवहार ी किया जाता है। उनका यह नया सिद्धांत कुछ तथ्य पर कुछ कल्पना पर आधारित था। परंतु इसको आधार बनाकर चर्च ने इस प्रकार अनुसूचित घोषित की गई जातियों के लोगों को जातिविहीन समाज का सपना दिखाया। वास्तव में यह लुावना सपना था। एक ऐसे समाज की कल्पना जिसमें न कोई जाति हो और न ही किसी विशेष जाति में जन्म लेने के कारण ेदाव का शिकार होना पड़े। जिसमें जन्म से चिपका हुआ जाति का नकारात्मक बोझ हट जाए और मनुष्य को विकास का समान अवसर उपलब्ध हो जाए ।
 ईसाईपंथी और इस्लामपंथी दोनों ही इस अियान में सक्रिय हुए । जातिेद के कारण, जो कुछ सीमा तक यथार्थ में विद्यमान था और कुछ सीमा तक अंग्रेजों ने उसे योजनापूर्ण ढंग से आगे बढ़ाया था, कुछ लोग इस्लाम, इस्लामी समाज और ईसाई समाज की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने अपना मजहब परिवर्तित कर लिया । मजहब परिवर्तन का यह अियान तेजी से अंग्रेजी शासन काल में चलने लगा। उनका सारा जोर अनुसूचित जात के लोगों या फिर अनुसूचित जनजाति के लोगों पर ही रहा। लेकिन चर्च के दुर्ाग्य से 1947 में अंग्रेजों को अपना बोरिया बिस्तरा गोल करके यहां से कूच करना पड़ा। उनके सामने बड़ा प्रश्न था कि सŸाा का हस्तांतरण किसको किया जाए? जाहिर था कि अंग्रेज उनको ही सŸाा सौपेंगे जो उनके जाने के बाद ी सांस्कृतिक, शैखिक और मजहबी क्षेत्रों में उनकी नीतियों को जारी रखेंगे। शायद इसीलिए लार्ड माउन्टबेटन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को सŸाा सौंपने की लाजवाब योजना बनाई ।
Ÿाा हस्तांतरण के बाद ारत के लिए नया संविधान बनाने की जरूरत बनी तो उसमें स्पष्ट ही दो विचारधाराओं का का स्पष्ट टकराव देखा जा सकता है। एक विचारधारा ऐसी थी जो पंथ निरपेक्षता के नाम पर ारत में चर्च को ईसाईकरण की खुली छुट देने की पक्षधर थी। इसलिए संविधान में यह प्रयास किया गया कि ऐसे प्रावधान रखें जाए जिनके अंतर्गत चर्च को पंथ परिवर्तन की खुली छुट मिली रहे। इस मरहले पर डा0 बाबासाहब अंबेडकर का ध्यान आता हैै । हिन्दू समाज के प्रताडि़त वर्ग के लिए कुछ सुविधाओं का प्रावधान किया जाए । यह सी की इच्छा थी इसलिए जिन जातियों को अंग्रेजों ने अनुसूचित जातियों के वर्ग में रखा था उनके लिए सरकारी नौकरियों में और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान किया जाए ऐसी व्यवस्था संविधान में की गई। डा0 अंबेडकर स्वयं ी इस जाति व्यवस्था से दुखी थे। वे स्वयं महार जाति के थे इसलिए जाति ेद और उसका दर्द क्या होता इसे उनसे अच्छी तरह कौन जा सकता था? इन्हीं परिस्थितियों में उन्हांेने हिन्दू व्यवस्था से निकलने का विचार किया।  उनके इस विचार की नक लगते ही इस्लाम और ईसाइयत के पैरोकार उनके पास दौड़े। वे उन्हें मुसलमान या ईसाई बनने का निवेदन कर रहे थे और उनका सबसे बड़ा तर्क यही था कि आप जाति व्यवस्था से दुखी है। इस्लाम समाज या ईसाई समाज जातिविहीन समाज है। ऐसा प्रलोन दक्षिणी अफ्रीका में चर्च ने एक बार महात्मा गांधी को ी दिया था। गांधी जी ने चर्च को लताड़ा ही नहीं था बल्कि यहां तक कहा कि ईसा मसीह यदि कहीं है तो वह चर्च के अतिरिक्त कहीं ी हो सकता है। अंबेडकर पंथ परिवर्तन के पीछे के छिपे हुए दुष्परिणामों से अच्छी तरह वाकिफ थे वे जानते थे कि पंथ परिवर्तन अंततः राष्ट्रांतरण की ओर ले जाता है। इसलिए उन्होंने इस्लाम के पेरोकारों और चर्च को स्पष्ट इंकार कर दिया। वे बुद्ध की शरण में चले गए। उनका मानना था कि बुद्ध वचनों का उद्गम ारत ूमि ही है इसलिए बुद्ध की शरण में जाने से ारतीय एकता और ी सशक्त होती है। उस समय चर्च ने अंबेडकर को अपना सबसे बड़ा विरोधी  विरोधी घोषित किया था। लेकिन नेहरू के साथ ज्यादा देर न अंबेडकर टिक पाए, न डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी। गोबिंद वल्ल पंथ और पुरूषोŸाम दास टंडन की क्या गत बनी इसे सी जानते है। चर्च नेहरू के समयम से ही ईसाईकरण की प्रक्रिया में लगा हुआ है। आश्चर्य की बात तो यह है कि चर्च के पक्ष में इतना पंथ परिवर्तन अंग्रेजों के समय में नहीं हुआ जितना पंडित नेहरू द्वारा सŸाा संालने से लेकर अब तक के काल में हो गया है।

लेकिन अी ी चर्च के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बाबा साहब अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान वे प्रावधान है, जो अनुसूचित जातियों की बिरादरी को छोड़कर इस्लामी अथवा ईसाई बिरादरी में गए लोगों को आरक्षण का निषेध करते हैं। विदेशों से अरबों रूपया आने के बावजूद अी तक पूरा ारत या फिर कम से कम अनुसूचित जाति के सी लोग ईसाई क्यों नहीं बने, यह चर्च के लिए आश्चर्य का विषय है। इसलिए चर्च ने अब एक नई रणनीति इजाद की है। यदि अनुसूचित जाति के लोगों को इस्लामी समाज या ईसाई समाज में शामिल हो जाने के बाद ी सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में दलित लोगों के लिए आरक्षित स्थानों में हिस्सेदारी दे दी जाए तो चर्च को विश्वास है ईसाईकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती है। लेकिन चर्च यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ सकता। इसलिए उसने मस्जिद को ी साथ लिया है। आश्चर्य है कि शेष दुनिया में इस्लाम और ईसाइयत आमने-सामने है लेकिन ारत को कनवर्टकरने के मामले में दोनों साथ हो जाते हैं। 2004 में सोनिया गांधी के नियंत्रण वाली सरकार बन जाने के बाद चर्च को लगा कि इससे बढि़या मौका ारत में पंख फैलाने के लिए और नहीं मिल सकता। यदि अनुसूचित जातियों में से ईसाई और मुसलमान बने लोगों को पंथ परिवर्तन के बाद ी आरक्षण की सुविधा बरकरार रहें तो स्वाविक ही विदेशी धन बल के आधार पर पंथ परिवर्तन कर प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। इस मोड़ पर ारत सरकार चर्च की सहायता के लिए आगे आई । मार्च 2005 में ारत सरकार ने मजहबी और ाषाई अल्पसंख्यकों में सामाजिक और आर्थिक ॰ष्टि से पिछड़े वर्ग हेतु राष्ट्रीय आयोगकी स्थापना की। इस आयोग का अध्यक्ष उड़ीसा के रंगनाथ मिश्र को बनाया गया। ये वही रंगनाथ मिश्र हैै जो की उच्चतम न्यायालय के मुख्यन्यायधीश रहे और वहां से रिटायर हो जाने के बाद केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने उन्हें राज्यसा का सदस्य बनाया । आयोग के एक अन्य सदस्य डा0 ताहिर महमूद, जो की दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों को कानून की पढ़ाई करवाते थे। एक तीसरे सदस्य दिल्ली में चर्च द्वारा चलाए जा रहे एक काॅलेज के प्रिंसीपल थे और इसे दुर्याेग ही कहना की आयोग की रपट लिखने के तुरंत बाद उन्हें हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया। पर्दा ी बना रहे और काम ी होता रहे इसलिए सरकार ने इस आयोग से सीधे-सीधे पंथ परिवर्तित लोगों को आरक्षण देने का सुझाव तो नहीं मांगा बल्कि यह कहा कि मजहबी और ाषाई अल्पसंख्यक लोगों में से सामाजिक और आर्थिक ॰ष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान कैसे की जाए? पहचान के बाद उनके कल्याण के लिए कौन से कदम उठाए जाए और यदि ये कदम उठाने के लिए संविधान में संशोधन ी करना पड़े तो कहां-कहां संशोधन किया जाना चाहिए।