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Tuesday, 14 January 2014

देश के संकट में कम्युनिस्टों की भूमिका

: डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

वंदे मातरम के गान को लेकर देश में बहस गहराती जा रही है। सोनिया गांधी की सरकार अड़ी हुई है, यदि कोई ारत माता की वंदना नहीं करना चाहता, तो उसे पूरा अधिकार है। किसी से जबरदस्ती वंदे मातरम नहीं कहलवाया जा सकता। कम्युनिस्ट इस स्थिति से प्रसन्न हैं। वे कांग्रेस से ी ऊंचे स्वर में बोल रहे हैं-वंदे मातरम साम्प्रदायिक है। कम्युनिस्टों का पूरा इतिहास देश के संकट काल में देश के खिलाफ खड़े हो जाने और शत्रु पक्ष का स्तुति गान करने का रहा है। ारत ने 1950 से लेकर 1962 तक वििन्न प्रकार से चीन के आक्रमण को झेला था। इस पूरे काल में कम्युनिस्ट चीन के साथ खड़े दिखाई दे रहे थे।

माओ ने 1949 में चीन की सŸाा पर कब्जा कर लिया। माओ के इस मुक्ति .युद्ध में वैचारिक ूमिका में महात्मा बुद्ध नहीं थे बल्कि कार्ल माक्र्स थे । वही कार्ल माक्र्स जिन्होंने कहा था कि धर्म अफीम होता है । चीन में माओ के नेतृत्व में कार्ल माक्र्स ने एक प्रकार से बुद्ध वचनों को परास्त किया था । बीजिंग के थ्यानमेन चैक में माओ ने घोषणा की-चीन अब उठ खड़ा हुआ है। माओ की इस घोषणा से बहुत अरसा पहले स्वामी विवेकानन्द कह चुके थे कि चीन एक सोया हुआ राक्षस है। उसे सोया ही रहने दो। यदि वह उठ खड़ा हुआ तो सारी दुनिया के लिये खतरा पैदा हो जाएगा। लेकिन ारत की कम्युनिस्ट पार्टी शायद विवेकानन्द के साथ नहीं थी। उस ने माओ द्वारा चीन में सŸाा संलने से पूर्व ही उसे अपना मसीहा मान लिया था और उसके रास्ते को अपना कर ारत की सŸाा को उखाड़ फेंकने का संकल्प ी दोहरा दिया था। फरवरी 1948 में कोलकाता में एशियाई कम्युनिस्ट कांग्रेस का सम्मेलन हुआ। जिसमें दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में हिंसक जनांदोलन और गृह युद्ध प्रारं करने का निर्णय लिया गया। जाहिर है ारत में यह शुरुआत कम्युनिस्टों को ही करनी थी।

तेलंगाना में सशó क्रांति में संलग्न आंध्र प्रदेश के कम्युनिस्टों की रणनीति के अनुसार तो ‘‘सी.पी.आई को ारत में माओ की रणनीति के आधार पर सŸाा पर कब्जा कर लेना चाहिये। ारतीय कम्युनिस्टों को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के रास्ते का ही अनुसरण करना होगा । ऐतिहासिक चीनी मुक्ति संघर्ष के नेता माओ ने नये लोकतंत्र का सिद्धांत सूत्र बद्ध किया हैऔर वही उपनिवेशों और अर्ध उपनिवेशों के लिये अनुसरण योग्य है।’’(हेमन राय, पीकिंग एण्ड दी इंडियन कम्युनिस्ट, पृष्ठ-8) ध्यान रहे कि कम्युनिस्टों की दृष्टि में स्वतंत्र ारत की सरकार सामंतवादी और अर्ध उपनिवेशवादी थी। सी.पी.आई के महासचिव बी.टी. रणदिवे ने चीनी जनगणतंत्र की स्थापना पर 1 अक्तूबर 1949 को माओ कोलिखा-ारतीय जनता आपकी विजय से हर्ष विोर है क्योंकि इससे उसे अपनी मुक्ति की आशा बंधती है।(पीकिंग एण्ड दी इंडियन कम्युनिस्ट, पृष्ठ-16) जाहिर है कि ारत के कम्युनिस्ट, चीन और माओ के माध्यम से सŸाा पर कब्जा जमाने के स्वप्न देख रहे थे और इसी राष्ट्रघाती रणनीति को वे लोक मुक्ति का नाम दे रहे थे।

1959 में तिब्बत में स्वतंत्रता के दीवानों ने जन विद्रोह किया। दलाई लामा को ारत में शरण लेनी पड़ी। इसका विरोध करने वालों में ारत के कम्युनिस्ट सबसे आगे थे । उनको चीन का आक्रमण दिखाई नहीं दे रहा था । ारत में दलाईलामा के रहने पर आपŸिा हो रही थी । चीन ारतीय सीमा में ी घुसपैठ कर रहा था। लेकिन ारत के कम्युनिस्ट यही प्रचार कर रहे थे कि ारतीय सेना चीन पर आक्रमण कर रही है। सी.पी.आई की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक 1959 में मेरठ में हुई। सारे देश की आंखे इस बैठक पर ही लगी हुई थीं। उस बैठक में क्या हुआ, उसका वर्णन बाद में परिषद् के एक सदस्य रमेश सिन्हा ने किया , ‘‘मेरठ में राष्ट्रीय कोंसिल की बैठक हुई। तमाम ाषण हुये । साथी पी. सुन्दरैया जैसे बड़े नेता ने सामने दीवार पर एक बड़ा नक्शा लगाकर एक लम्बी स्केल की सहायता से यह बताने की चेष्टा की थी कि हमला चीनियों ने नहीं बल्कि हिन्दुस्थानी सैनिकों ने किया है।’’(जीवन संघर्ष, रमेश सिन्हा, पृष्ठ-189)। जाने-माने कम्युनिस्ट नेता मोहित सेन ने इसी प्रसंग पर लिखा है-‘‘ारत ूमि पर चीनी दावे की वैधता को उचित ठहराने के लिए सुंदरैया ने काफी संख्या में मानचित्र और अिलेखागारीय सामग्री एकत्रित की थी और वे इस बात पर जोर दे रहे थे कि साम्यवादी चीन की हमला कर ही नहीं सकता। बुर्जुआवादी ारत सरकार यह कर सकती है ताकि वह अपने साम्राज्यवादी आकाओं से ला ले सके।’’ (ए ट्रेवलर एंड दी रोड-द जर्नी आॅफ एन इंडियन कम्युनिस्ट, मोहित सेन, पृष्ठ 201)

31 मार्च, 1959 को सी.पी.आई ने चीन को इस बात के लिये बधाई दी कि उसने तिब्बत को मध्य युगीन अंधेरे से बाहर निकाला है। सी.पी.आई के अनुसार तिब्बत में हुए जन विद्रोह के लिये ू-स्वामी उŸारदायी हैं, जिनकी सहायता ारत की प्रतिक्रियावादी शक्तियां और पश्चिमी साम्राज्यवादी कर रहे हैं।(न्यू एज, नई दिल्ली, 5 अप्रैल, 1959) सी.पी.आई के महासचिव अजय घोष ने तिब्बत के जन विद्रोह को निर्दयता पूर्वक कुचलने के चीनी दमन का खुला समर्थन किया। घोष ने कहा-‘‘गिने चुने प्रतिगामियों द्वारा किये गये विद्रोह का हश्र उसकी पराजय में हो गया है और तिब्बत के लोग अब प्रगति पथ पर अग्रसर हो सकते हैं।(न्यू एज, नई दिल्ली, 10 मई, 1959) बी.टी. रणदिवे तो एक कदम और आगे बढ़ गये उनके अनुसार ारत के सांसद चीन पर दोषारोपण कर रहे हैं और उसे आक्रांता कह रहे हैं, ‘‘यदि ारतीयों को विस्तारवादी कहा जाता है तो उन्हें ठेस पहुंचती है। तो क्या चीनियों को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिये जब उनकी सरकार को आक्रमणकारी कहा जाता है।’’ (न्यू एज, नई दिल्ली, 3 मई, 1959)

6 मई 1959 को चीन सरकार के अखबार पीपुल्स डेली ने ‘‘तिब्बती क्रांति और नेहरू का दर्शन’’ नामक एक लम्बा आलेख प्रकाशित किया, जिसमें ारत पर तिब्बत में दखलंदाजी का आरोप लगाया। सी.पी.आई के मुख्य पत्र न्यू एज ने अपने 17 मई के अंक में इसका अनुवाद प्रकाशित किया और देशर में इसको बांटा। 25 अगस्त, 1959 को लांगजु की घटना हुई। अरूणाचल प्रदेश में चीनी सेना लांगजु में घुस आई और वहां उसने असम राइफल्ज के तीन जवानों को मार दिया। इस घटना की सी.पी.आई के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहित सेन ने निम्न प्रकार से व्याख्या की। ‘‘ारत जिस मैकमहोन रेखा को (ारत-तिब्बत के बीच) वैधानिक सीमा बता रहा है उसकी की ी निशान देही नहीं हुई। वैसे ी उसकी रचना एक तरफा मनमाने तरीके से की गई थी। इसलिये लांगजु की घटना के लिये चीन सरकार उŸारदायी नहीं है।(न्यू एज, नई दिल्ली, 13 सितम्बर, 1959) ए. के. गोपालन और पी. राममूर्ति ने तो सी सीमाएं लांघ दीं। उन्होंने कहा-‘‘हमें लांगजु की इस घटना पर ही विश्वास नहीं है। यह ारत सरकार ने गढ़ी है।’’(पीकिंग एण्ड दी इंडियन कम्युनिस्ट, पृष्ठ-60) उधर कम्युनिस्ट, तिब्बत पर चीनी आक्रमण के पक्ष में खुल कर आ गये थे। ‘‘दस सितम्बर, 1959 को सी.पी.आई ने कोलकाता में एक जनसा की जिसमें खुल्लमखुल्ला चीन का समर्थन किया। सा की अध्यक्षता ज्योति बसु ने की । बसु ने कहा कि चीन को आक्रमणकारी नहीं कहा जा सकता। साम्यवादी कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे कि चीन आक्रमणकारी नहीं है। (आर्गेनाइजर, 28 दिसम्बर, 1959)

कम्युनिस्ट पार्टी के इसी अारतीय स्वरूप पर तत्कालीन ारतीय जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय ने टिप्पणी की। ‘‘तिब्बत की घटनाओं और उस संबंध में ारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बनाई गई नीति ने इस पार्टी के अारतीय रूप को ही एक बार पुनः प्रकट कर दिया है। चाहे तिब्बत में जो ी आर्थिक या राजनीतिक पद्धति प्रचलित हो, किसी ी बाहरी देश को उसे जबरदस्ती परिवर्तित करने का अधिकार नहीं है। अगर ारत के कम्युनिस्ट चीनी राग में स्वर मिलाते हुए इस आधार पर तिब्बत पर चीनी आक्रमण को उचित ठहरा सकते हैं कि दलाई लामा की सरकार प्रतिक्रियावादी है, तो वे ारत पर चीनी आक्रमण का ी स्वागत कर सकते हैं। यह विशुद्ध विश्वासघात के सिवा और कुछ नहीं है।’’ (कमल किशोर गोयनका, पंडित दीनदयाल उपाध्याय व्यक्ति दर्शन, पृष्ठ 200)

सारा देश चीन के विस्तार वादी रवैये की निन्दा कर रहा था लेकिन कम्युनिस्ट अी ी अपनी उसी 1942 वाली रणनीति पर आगे बढ़ रहे थे। वे अंतर्राष्ट्रियवाद के झंडाबरदार बनकर घूम रहे थे और इसमें वे ारत की बजाए चीन के साथ स्वयं को ज्यादा नजदीक पा रहे थे। सीपीआई के हरे कृष्ण कोनार अक्टूबर 1960 में वियतनाम होते हुए चीन गए और वहां चेयर मैन माओ से मिले। ‘‘और वहां से लौटने के बाद वे सबसे मुखर चीन समर्थक सिद्ध हुए और ारत चीन युद्ध में उन्होंने खुलकर चीन का समर्थन किया। कोनार के माध्यम से ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने पश्चिमी बंगाल के चीन समर्थक धड़े से प्रत्यक्ष संपर्क बनाए रखा। (हेमन राय, पृष्ठ 73) और चीन के इसी आक्रमण की पृष्ठूमि में जाने माने कम्युनिस्ट नेता रमेश सिन्हा ने अपने जीवन संघर्ष मंे लिखा जो साथी माक्र्सवादी पार्टी में गए थे उन्होंने चीनी पार्टी की रीति नीति को पूरे तौर पर मान लिया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सीपीएम के सामने मुख्य तौर पर तीन काम रखे जिनमें प्रमुख थे-प्रथम ारत सरकार की सŸाा और शक्ति को कमजोर करना, द्वितीय यदि हो सके तो जवाहरलाल नेहरू को उसी तरह कैद कर लेना जिस तरह च्यांग काई शेक को चीनियों ने एक जमाने में किया था।

इस असाईनमेंट के चार दशकों बाद कम्युनिस्ट ारत सरकार में ागीदारी निाने की स्थिति में आ गए हैं। वंदे मातरम का विरोध क्या उस अधूरे काम को पूरा करने की दिशा में उठा हुआ महत्वपूर्ण कदम तो नहीं है।

(हिन्दुस्थान समाचार)


चीनी राष्ट्रपति का आगमन: भारतीय हितों पर प्रश्न चिन्ह्ः

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
यूपीए का प्रमुख घटक साम्यवादी टोला धीरे-धीरे अपने असली एजेंडे को लागू करने के लिए एक सोची समझी योजना के अंतर्गत सधे हुए शिकारी की तरह आगे बढ़ रहा है। सीपीएम चीन के हितों की रक्षा के लिए लोक लाज त्याग कर सीधे-सीधे गोटियाँ बिछाने लगा है।
यह तो सी के ध्यान में है ही की सीपीएम की स्थापना ही ारत चीन युद्ध के पश्चात चीन की पक्षधरिता की पुष्टि के लिए हुई थी। उन दिनों में ी जब ारत युद्ध ूमि में चीन से जूझ रहा था। तो सीपीएम के शीर्ष पुरूष सुन्दरैया, हरे कृष्ण कोनार और अन्य प्रतिष्ठित कामरेड़ चीन के पक्ष में नारे लगाते घूम रहे थे। सीपीएम के लोगों को माओ और उनके चीन पर ज्यादा विश्वास था ,ारत और ारत के लोगों पर कम। शायद इसीलिए वे चीन की सहायता से सशó क्रांति को अंजाम देने में लगे थे और चीन के हाथों तिब्बत मुक्ति की तरह ही ारत मुक्ति का रास्ता देख रहे थे। इसे देश का दुर्ाग्य कहना चाहिएऔर सीपीएम का सौाग्य की 1962 की लड़ाई में ारत हार गया और चीन जीत गया। चीन ने ारत की हजारों किलोमीटर ूमि पर कब्जा ी कर लिया इतना ही नहीं वह अी ी अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के अधिकांश क्षेत्रों को चीनी क्षेत्र ही मानता है।
14 नवंबर 1962 को ारत की संसद में सर्वसम्मति से एक संकल्प पारित किया गया था जिसमें ारत की जनता ने और संसद ने संकल्प लिया था कि जब तक चीन के कब्जे से एक-एक इंच ारतीय ूमि छुड़ा नहीं ली जाती तब तक सरकार चैन से नहीं बैठेंगे।
इसे इतिहास की त्रासदी ही कहना चाहिएकि लगग पाँच दशक बाद उसी चीन के राष्ट्रपति हू जिन ताओ नवंबर मास में ही ारत की यात्रा पर आ रहे हैंऔर ारत में इस समय सीपीएम की ही अप्रत्यक्ष सरकार है, ऐसा माना जा सकता है। चीन ने अी तक ारत की जमीन छोड़ी नहीं है और न ही ारतीय ूमि पर अपने दावों को त्यागा है। लेकिन फिर ी सीपीएम की अगवाई में ारत सरकार हू जिन ताओ के लिए पलक पाँवड़े बिछा कर तैयार बैठी है। सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी अी पिछले दिनों ही चीन की यात्रा कर आए  हैं। 1962 की लड़ाई के पहले ी कम्युनिस्ट पार्टी के ही हरे कृष्ण कोनार बीजिंग गए थे और वापिसी में आकर अंत काल तक चिल्लाते रहे कि ारत ने चीन पर आक्रमण कर दिया है और चीन जिस ारतीय ूमि पर अपना कब्जा जता रहा है वह ूमि वास्तव में चीन की ही है। चीन सरकार हरे कृष्ण कोनार का प्रयोग ारत में अपने समर्थकों से संवाद बनाने में करती रही। अब हू जिन ताओ की यात्रा से पहले सीताराम येचुरी बीजिंग की गलियों का चक्कर लगा आए हैं और वापिस आकर उन्होंने ी उसी शैली में कहना शुरू कर दिया है कि ारत सरकार चीन की कंपनियों को ारत में अपना जाल बिछाने की अनुमति क्यों नहीं देती ? ारत सरकार में शायद अी ी कुछ पुराने लोग मौजूद होंगे जिन्होंने नेहरू के हिन्दी चीनी ाई-ाई के दौर के बाद चीनी आक्रमण को झेला था और देखा था। इसलिए वे लोग चीनी कंपनियों का इस आधार पर विरोध कर रहे हैंकि उनके जाल से ारत में सुरक्षा संबंधी कई समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। पर सीताराम येचुरी को इस सुरक्षा से कुछ लेना देना नहीं है क्योंकि वे शायद अी ी मानते हैैं कि चीन से ारत को कोई खतरा नहीं है । जहाँ तक चीन द्वारा कब्जे में की गई ारतीय ूमि का प्रश्न है, सीताराम येचुरी और उनकी पार्टी के लिए न तो 1962 में यह मुद्दा था और न ही आज 2006 में है।
सीपीएम के लोग यह चाहते हैं कि चीन के राष्ट्रपति को ारतीय संसद को संबोधित करने के लिए निमंत्रित किया जाए और इसके लिए वे दबाव ी बना रहे हैं। ारत के लोगों को खतरा हैकि सोनिया गांधी की कांग्रेस इस दबाव में या बिना दबाव के ी हू जिन ताओ को संसद में बुलाने का राष्ट्रीय अपमान कर सकती है। जिस संसद ने यह संकल्प पारित किया हुआ है कि चीन से एक-एक इंच ूमि वापिस छुडाएंगे, उसी संसद को चीन के राष्ट्रपति क्या संबोधित करेंगे? ऊपर से और अपमानजनक बात यह है कि चीन उसी कब्जाई गई ूमि को छोड़ने की बात तो दूर अतिरिक्त ारतीय ूमि पर ी दावा कर रहा है। हमारे साम्यवादी मित्र इसी बात पर तालियाँ बजा-बजाकर नाच रहे हैं कि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति रखना स्वीकार कर लिया है। जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा का अर्थ है - ारतीय ू-ाग चीन के हवाले कर देना और अरुणाचल प्रदेश व लद्दाख को विवादास्पद स्वीकार कर लेना। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सीपीएम की बैसाखियों पर चलने वाली कांग्रेस की सरकार ी क्या अब वास्तविक नियंत्रण रेखा को ही स्वीकार करने के स्तर पर उतर आई है? जब तिब्बत गुलाम हुआ था तो किसी ने राममनोहर लोहिया से पूछा था कि क्या अब तिब्बत की आजाद हो पाएगा? तो लोहिया ने उŸार दिया था कि दिल्ली की गद्दी पर सदा नपुंसकों का ही राज नहीं रहेगा। लगता है लोहिया की यह विष्यवाणी तिब्बत के साथ-साथ ारत पर ी लागू हो रही है। प्रश्न यह है कि क्या चीन के कब्जे में गया हुआ ू-ाग की स्वतंत्र हो पाएगा? दिल्ली की गद्दी ने न जाने कितने परिवर्तन देखे हैं, लेकिन लोहिया की इच्छा शायद अी ी अधूरी है। राष्ट्रीय अपमान का विषय तो यह है कि कांग्रेस और सीपीएम दोनों मिलकर हू जिन ताओ को ारतीय संसद में सम्मानित करने के मंसूबे बना रहे हैं। यदि ऐसा होता हैतो इसे ारतीय इतिहास का अपमान पर्व कहा जाएगा और इसके लिए केवल मात्र कांग्रेस ही जिम्मेवार होगी। क्योंकि सीपीएम ने ारत के मान-अपमान से की अपने आप को बाँधा नहीं है । उनका मान-अपमान अपने जन्मकाल से ही चीन से बँधा हुआ है। बंगाल की सड़कों पर लाल सलाम चिल्लाते हुए ‘‘चीन का चैयरमैन हमारा चेयरमैन’’ का नाद करते हुए साम्यवादियों को जिन लोगों ने सुना और देखा है वे इसे अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन सŸाा के लालच में कांग्रेस के नेताओं ने ी अपने आँख, कान और मुँह बंद कर लेने का संकल्प कर लिया है-यही दुःख का कारण है।
14 नवंबर को पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन है और इसी दिन संसद ने ारतीय ू-ाग को चीनी कब्जे से मुक्त करवाने का संकल्प लिया था। चीन के हाथों हुए इसी अपमान से पंडित नेहरू की मृत्यु ी हो गई थी। सोनिया गाँधी अपने आप को इसी नेहरू विरासत की सबसे बड़ी पहरेदार बता रही है और विरासत के बल पर उन्होंने सैकड़ों वर्ष पुरानी कांग्रेस पर कब्जा करने की अपनी योजना में सफलता ी प्राप्त की हैऔर उसी विरासत के बल पर वे पर्दे के पीछे से सŸाा के समस्त सूत्रों का नियंत्रण कर रही हैं। क्या उन्हें नहीं लगता कि इसी विरासत का तकाजा है कि जिस चीन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को अपमानित कर निराशा और हताशा की स्थिति में यमपुरी पहुँचा दिया, उस चीन के राष्ट्रपति से वे खरी-खरी बात करें, तिब्बत के मसले पर ी और कब्जाई गई ारतीय ूमि के मसले पर ी। लेकिन ऐसा ती हो सकता है यदि वह सचमुच हृदय से इस विरासत से जुड़ी हुई हों । फिलहाल तो लगता है कि वह सीपीएम के माध्यम से चीन के ज्यादा नजदीक दिखाई दे रही हैं और नेहरू की विरासत के कम। ारत सरकार चीन के राष्ट्रपति के लिए अूतपूर्व स्वागत की तैयारियों में जुटी हुई है। इसलिए इस समय न उसे नेहरू दिखाई दे रहा है, न तिब्बत, न अरुणाचल प्रदेश और न ही लद्दाख ।
(हिन्दुस्थान समाचार)


मदनी अब्दुल नसीर है कांग्रेस और सीपीएम के नये नायक

: डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 3 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
कोयम्बटूर की एक विशेष अदालत ने अब्दुल नसीर मदनी को रिहा कर दिया है। उन पर 14 फरवरी 1998 में कोयम्बटूर में हुए बम धमाकों  की साजिश का आरोप था। इन धमाकों में 58 लोगों की मौत हो गई थी। आरोप इतने गंीर थे और मामला इतना संवेदन शील था कि पिछले 9 सालों से जेल में बंद मदनी अनेक अदालतों में जमानत की गुजार लगाते रहे। लेकिन 2005 में सर्वाेच्च न्यायालय तक ने उसकी जमानत की अर्जी को खारिज कर दिया था। ऐसा प्रायः कम मामलों में ही होता है लेकिन जब सर्वाेच्च न्यायाल ी लंबे अरसे से रिमांड पर ही जेल में रह रहे अपराधी की जमानत याचिका खारिज कर दे तो मान लेना चाहिए आरोप गंीर ी है और तथ्यपरक ी।
लेकिन मदनी निर्दाेष छूट गए है। इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआक्योंकि इससे पहले ी जेसिका लाल हत्याकांड केस में मनु शर्मा निर्दाेष करार दिए गए थे। प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड में संतोष सिंह निर्दाेष करार दिए गए थे। यदि मदनी इसी परंपरा मे निर्दाेष पाए जाते तो शायद इसको लेकर किसी को आश्चर्य ी न होता लेकिन मदनी के निर्दाेष पाए जाने का जो खुलासा केरल सीपीएम के सचिव ने किया है वह चैंकाने वाला है। कन्नूर में संवाददाताओं से मदनी के जेल से छूटने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सीपीएम के सचिव विजयन ने रहस्योद्घाटन किया कि मदनी की रिहाई केरल और तमिलनाडु  में सरकारों के बदलने के कारण ही संव हो पाई है। इसका अर्थ यह हुआ कि तमिलनाडु सरकार और केरल सरकार ने न्यायालय के निर्णय को प्रावित किया है। ऐसा नहीं है कि इस देश में राजनैतिक दल और राजनैतिक पुरुष न्यायालय के निर्णय को प्रावित नहीं करते। मनु शर्मा और संतोष सिंह का किस्सा ऐसा ही है । लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है किसी राजनैतिक दल ने खुलेआम इस बात की घोषणा की हो कि सरकार के बदलने के कारण किसी अपराधी की रिहाई संव हो पाई है। यह ठीक है कि केरल में कांग्रेस और सीपीएम दोनों ही एक लंबे अरसे से मदनी को छुड़ाने की जुगते बिठा रहे थे। जहां तक कि इन दोनों दलों ने मिलकर मदनी की रिहाई के लिए 2005 में विधानसा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव ी पारित किया था। विजयन कहते हैं कि रिमांड पर जेल पर रहने का मदनी का किस्सा करोड़ों में से एक है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि विधानसा द्वारा किसी अपराधी को मुक्त करवाने के लिए प्रस्ताव पारित करने का किस्सा ी करोड़ों में से एक ही है।
यदि इन बातों को गंीरता से लिया जाए और इसे लेना ी चाहिए क्योंकि सीपीएम पार्टी केरल में राज्य कर रही है और केन्द्र में राज्य करने वालों को आॅक्सीजन मुहैया कर रही है। तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कडगम ी केन्द्र की यूपीए सरकार का हिस्सा है। इसका अर्थ यह हुआ कि मदनी की रिहाई में डीएमके सरकार और केरल की साम्यवादी सरकार ने पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण ूमिका अदा की है। जज को डराया धमकाया होगा ऐसा तो कोई नहीं कह सकता। क्योंकि न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास अी ी अडिग है। लेकिन अब इतना तो मानना ही पड़ेगा कि डीएम सरकार ने मदनी का केस ही कचहरी में इस ढंग से प्रस्तुत किया होगा कि न्यायाधीश के पास उसको छोड़ने के अलावा और कोई चारा न रहे। कचहरियों में ऐसा पहले ी होता रहा है जब न्यायाधीश ने स्वयं ही कहा कि वे जानते हैं कि छूटने वाला अपराधी पाक साफ नहीं है लेकिन जांच करने वाली एजेंसी यदि उसके खिलाफ सबूत प्रस्तुत नहीं करेगी तो यह काम न्यायपालिका स्वयं तो नहीं कर सकती। तमिलनाडु के अध्यक्ष गणेशन ने ठीक ही कहा है, ‘इस निर्णय के लिए न्यायापालिका को उŸारदायी नहीं ठहराया जा सकता। सरकार ने ही मदनी के खिलाफ कमजोर केस तैयार किया और उसके छूटने का रास्ता साफ कर दिया।
प्रश्न है मदनी केरल की राजनीति में इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं? उसका प्रमुख कारण यह है कि उन्होंने केरल में कट्टरवादी मुस्लिम आतंकवाद को जन्म दिया है। उन्होंने 1980 में इस्लामी संघ की स्थापना की । जब सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया तो उसने उसके स्थान पर पीडीपी नामक राजनैतिक दल की स्थापना कर दी। वह मुसलमानों ने यह विश्वास दिलाने को कामयाब हो गया कि हिन्दुस्तान में दारूल हरब है। यानि उन लोगों का साम्राज्य जो ईश्वर
की नजरों में अच्छे लोग नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में दारूल इस्लाम की स्थापना करना हर मोमिन का फर्ज हैऔर यह ऐसा काम है जो उसे अल्लाह ने सौंपा है। इस फर्ज को अदा करने पर हर मोमिन जन्नत नसीब होगी और जन्नत में उसे क्या मिलेगा यह हर मोमिन पहले से ही जानता है। लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है। इसके लिए हथियार उठाना पड़ता है और दुर्ाग्य से मदनी के कहने पर केरल में मोमिनों न हथियार उठा लिए। मदनी पर आरोप था कि कोयम्बटूर के जिस बम विस्फोट में 58 लोग मारे गए उसको अंजाम देने वाले अलउम्मा के सदर एस.ए. बाशा और उसके अनुयायियों के तार मदनी से जुड़े हुए थे और मदनी ने ही उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की थी। यह प्रशिक्षण बौद्धिक ी था और हथियारों का ी। जाहिर है दारूल इस्लाम की खोज में मदनी के सैनिक तिरुवनंतपुरम की ओर से तमिल प्रदेश की ओर चल पड़े थे। न्यायालय में मदनी का दोष सिद्ध नहीं हो पाया, यह अलग बात है, लेकिन इस पूरे आंदोलन में मदनी ने यह अरसा पहले ही सिद्ध कर दिया था कि केरल के मुसलमानों के वोट उसकी झोली में है। वह जिसकेे पक्ष में चाहेगा उसके पक्ष में यह झोली उलटा सकता है। यह अलग बात है कि बंबों से खेलते खिलाते एक बम विस्फोट में उसकी अपनी एक टांग ी उड़ गई थी। परंतु मदनी जानता है कि ारत में दारूल इस्लाम की स्थापना के लिए खुदा के दरबार में यह ेंट तुच्छ ही मानी जाएगी। इसलिए वह दूसरे नायाब ताहफों की तलाश में रहता है। 1998 में जब केरल सरकार ने मदनी को राज्य में अशांति फैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया तो मदनी ने चुनावों में अपनी शक्ति दिखा दी और अगले चुनावों में मुसलमानों के वोट न मिलने कारण कांग्रेस पिट गई। केरल में अब कांग्रेस और सीपीएम दोनों को ही मुसलमानों के वोटों की चिंता है। इसलिए मदनी को रिझाने में लगे हुए हैं। वैसे एक दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस और सीपीएम मुस्लिम आतंकवादियों को रिझाने का प्रयोग पूरे देश में ही एक सोची समझी रणनीति के तहत कर रही है। कश्मीर से सेना वापिस बुलाई जा रही है। पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने का सांझा साथी घोषित किया जा रहा है। अफजल गुरु को फांसी के फंदे से लगग उतार ही दिया गया है उसके लिए जम्मू कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री की ूमिका काबिले गौर है। अलबŸाा मदनी की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उसने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वह मुसलमानों की कट्टरपंथी नीति से जुड़ा रहा है और उससे गल्तियाँ ी हुई है। लेकिन उसे यह नहीं मालूम की उसकी इन  गलतियों में 58 लोगों की जान चली गई है। कांग्रेस और सीपीएम के लिए इस देश के नायक अफज़ल गुरु है, सोहराबुद्दीन है, प्रो. गिलानी है और अब अब्दुल नसीर मदनी है। बाकी देश में तो ये दोनों दल यह रणनीति मानवाधिकारों के नीचे चला रहे हैं लेकिन केरल में दोनों ने वह लोक लाज ी त्याग दी है और सीधे-सीधे मदनी के पक्ष में उतर आए हैं । सीपीएम और कांग्रेस की दृष्टि में इस देश के दुश्मन वे सैनिक है, वे सिपाही है और वह जांबाज जनता है जो आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो रही है। जो कहीं बच ी जाते हैं तो वे आतंकवादियों के मानवाधिकार  हनन केस में जेल ेज दिए जाते हैं। बन्दे मातरम कहने वाले जेल में है और मदनी जेल से बाहर है। केरल में कांग्रेस और सीपीएम मिलकर मदनी के लिए वंदनबार सजा रहे हैं। उसके आगे कोर्निश कर रहे हैं माथे पर कार्लमाक्र्स का चित्र लगाकर हाथ में लाल झंडा लेकर मदनी के विजयोत्सव में नाच-नाच कर पसीने से सराबोर हो रहे हैं। लेकिन देश के सामने एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या तमिलनाडु की सरकार मदनी को रिहा करने के विशेष न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ अगले न्यायालय में अपील दायर करेगी या नहीं? या फिर वह ी केरल के साम्यवादी और कांग्रेसियों की तरह मदनी के विजयोत्सव में हिजडों की तरह नाच-नाच कर अपने कर्Ÿाव्य की इतिश्री मान लेगी।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

कामरेडों का विधवा विलाप:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दिनांक: 10 अगस्त 2007
स्थान: नई दिल्ली
सोनिया गांधी की सरकार और उसके मनोनीत प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ जो परमाणु करार किया है वह केवल ारत के हितों के विपरीत नहीं है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से ारत को अमेरिका का पुच्छल्ला राष्ट्र ही बना रहा है। अमेरिका के पड़ोस में बस रहे लातीनी देशों की जो स्थिति और हैसियत है इस करार के बाद परमाणु क्षेत्र में लगग वही स्थिति ारत की होने वाली है । सोनिया गांधी और मनमोहन के माध्यम से अमेरिका ने ारत से आत्मसमर्पण करवाया है और इन दोनों ने अत्यंत निर्लज्जता से ऐसा करके ारत को शर्मसार किया है। लेकिन यह ऐसा कार्य नहीं है जिससे किसी को आश्चर्य हो। क्यांेकि ारत में सोनिया गांधी को इस पद तक पहुंचाने के उपरांत और बकौल अशोक मित्रा मनमोहन सिंह को ारत के मंत्रिमंडल में फिट करवाने के बाद यह सोचना कि ये दोनों अमेरिका के हितों की रक्षा नहीं करेंगे, दिवास्वप्न के सिवा और कुछ नहीं होगा।
ारतीय जनता पार्टी ने इस करार का तार्किक आधार पर विरोध किया है। इस करार के बाद ारत के लिए परमाणु परीक्षण करना मुश्किल होगा ऐसा सरकार ी जानती है और अमेरिका ी जानता है । केवल इतना ही नहीं इससे ारत की पूरी की पूरी विदेशी नीति ी प्रावित होगी। जो देश अमेरिका के शत्रु हैं या फिर अमेरिका जिन्हें अपना शत्रु मानता है ारत को ी उनके साथ वैसा व्यवहार करना पड़ेगा। ईरान के मुद्दे पर तो अमेरिका ने ारत पर अी से दबाव बनाना शुरू कर दिया है। मनमोहन सिंह सबसे ज्यादा इस बात पर फूले नहीं समा रहे हैं कि इस समझौते से ारत की ऊर्जा की आवश्यकता पूरी हो जाएगी। लेकिन मनमोहन सिंह यह नहीं बताते कि यदि अमेरिका नाराज़ हो जाएगा तो ऊर्जा के स्रोत बंद होने से ारत की क्या स्थिति होगी? इससे जुड़ा हुआ एक और प्रश्न ी है। ारत में जल के इतने ंडार हैं कि जल विद्युत से ही ारत में ऊर्जा की सारी मांग को पूरा किया जा सकता है। उन सस्ते साधनों को छोड़कर मनमोहन सिंह अमेरिका के पीछे ाग रहे हैं और केवल  ऊर्जा की पूर्ति के लिए ारत के हितों की बलि चढ़ा रहे हैं। यह ठीक है कि सोनिया गांधी की पीठ तो गोरे देश थपथपाएंगे ही क्योंकि गोरे देशों की एक बेटी ने अकेले ही वह कर दिखाया जो अमेरिका अब तक नहीं कर सका था। लेकिन मनमोहन सिंह की पीठ का क्या होगा?
इस मरहले पर कामरेडों का विधवा विलाप देश का मनोरंजन कर रहा है। ए.बी. वर्धन से लेकर सीताराम येचुरी से होते हुए प्रकाश कारत और वृंदा कारत की जोड़ी सम्वेत स्वरों में रूदन कर रही हैकि यह समझौता देश के लिए घातक है। वे सरकार को चेतावनी ी दे रहे हैंकि इस समझौते से अमेरिका ारत के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने की स्थिति में पहुंच गया है। कामरेडों का गुस्सा देखने लायक है। वैसे ी लाल सलाम कहते-कहते उनका चेहरा लाल ही रहता है। लेकिन अब की बार गुस्से से इतने लाल पीले हो रहे हैं कि पहचान में आने मुश्किल हो रहे हैं। सीताराम येचुरी तो ारत अमेरिका मैत्री संसदीय संघ के उपाध्यक्ष ी हैं और गाली निकालने में सबसे आगे ी हैं। प्रधानमंत्री को लाल-लाल चेहरा करके डरा रहे हैं। अब अपने प्रधानमंत्री ी कोई ऐसे वैसे शख्स तो हैं नहीं । तमाम उम्र अमेरिका की गलियों में और इसी लाल सेना के अंग संग गुजारी है। इसलिए वे कामरेडों के गुस्से की असलियत को ी अच्छी तरह जानते हैं । जब प्रधानमंत्री से कामरेडों के गुस्से के बारे में पूछा गया तो उन्होंने हंसना ही बेहतर समझा । वैसे ी वे जानते हैं कि जब ये लाल सेना सोनिया गांधी द्वारा बुलाए गए ब्रह्म ोज में जीमने के लिए बैठ जाएगी तो फिर तृप्त होकर नारा तो जय संघर्ष का लगाएगी लेकिन लाल वन में जाकर एसी कमरे में सो जाएगी।
कामरेड इस छोटी सी बात को नहीं समझते कि यदि उनकी दृष्टि में यह समझौता देश के लिए घातक है तो जिस सरकार ने इस समझौते को किया है उस सरकार की पालकी वे क्यों ढो रहे हैं? समझौता इस देश के लिए घातक है इसमें कोई शक नहीं है और जिस  सरकार ने यह समझौता किया वह इस देश के लिए कितनी घातक सिद्ध हो सकती है-इसका अनुमान ी लगाया जा सकता है। परंतु कामरेड इस घातक सरकार को गिराएंगे नहीं बल्कि वे इसके हिस्सेदार ही बने रहेंगे। लेकिन देश के लोगों को कैसे रमाया जाए? क्योंकि ारत के लोग इस बात को जानते हैं कि यह समझौता देश को अमेरिका के आगे गिरवी रखने के लिए ही है।  इतना ही नहीं इस सरकार ने यह समझौता 40 साल के लिए किया है और यह ी प्रावधान किया गया है कि इसको एक तरफा निरस्त नहीं किया जा सकता।  सोनिया गांधी जाते-जाते इस देश को सदा के लिए अमेरिका का बंधक बनाकर रखना चाहती हैं। कामरेड इस मामले में उनके साथ हैं। शायद उनको इतना ही गम रहा होगा कि बंधन की यह डोरी बीजिंग के दरवाजे से बंधनी चाहिए थी वाशिंगटन के दरवाजे से कैसे बंध गई?
परंतु कामरेडों का इस विषय पर विधवा विलाप देखने लायक है। वे सी दोनों हाथों से रूदाली की औरतों की तरह छातियाँ पीट रहे हैं। विधवाओं की तरह लंबा-लंबा अलाप ले रहे हैं। लेकिन साथ ही साथ स्वर और लय का ी ध्यान रख रहे हैं। स्वर और लय में उनका यह माक्र्सवादी रूदन संसद वन के अंदर  और बाहर एक अजीब समां बांध रहा है। कामरेड शायद विश्वास कर रहे हैं कि उनके इस विधवा विलाप से देश की जनता सचमुच द्रवित हो जाएगी और आने वाले समय में वोट का कै प्सूल उनके गले में उतार देगी। लेकिन वे शायद ूल गए हैं कि उनका यह विधवा विलाप देशवासियों का मनोरंजन तो कर सकता है  उनकी विश्वसनीयता को नहीं बढ़ा सकता। जहां तक परमाणु करार की बात है, उसके खिलाफ लड़ाई ारत की जनता को ही लड़नी होगी। उसके लिए न इटली के सहयोग की जरूरत है न चीन के सहयोग की।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)


सोनिया और करात दोनों ही कर रहे हैं अमेरीकी लीला

- डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
दिनांक: 18 अक्टूबर 2007
स्थान: नई दिल्ली

सीपीएम के महासचिव  प्रकाश करात ने सोनिया गांधी को एक महत्वपूर्ण प्रश्न किया है । करात के अनुसार यदि ारतीय जनता पार्टी एनडीए सरकार को बचाने के लिए अपना हिन्दुत्व का मुद्दा छोड सकती है तो सोनिया गांधी यूपीए सरकार को बचाने के लिए अमेरिका के साथ कि या गया परमाणु समझौता क्यों नहीं छोड सकती  यह प्रश्न अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है । इससे ी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रकाश करात इसका उŸार जानते हुए ी अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं । लेकिन इस बात के लिए तो करात को धन्यवाद दिया ही जा सकता है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि एनडीए सरकार में ारतीय जनता पार्टी का कोई छुपा हुआ एजेंडा नहीं था । आज तक करात की टोली यह आरोप लगाती रही है कि ारतीय जनता पार्टी एऩडीए की  ढाल के पीछे अपना हिन्दुत्व का एजेंडा लागू कर रही है और एनड ीए सरकार क्यों टूटनी चाहिेए  इसका सबसे बडा कारण प्रकाश करात के साथी ाजपा के इसी हिन्दू एजेंडा को बताते थे । जब प्रकाश करात एंड कंपनी ने सोनिया गांधी की सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा की तब ी उन्होंने इसका मुख्य कारण यही बताया था कि यदि सोनिया गांधी की सरकार न बनी तो एनडीए की सरकार बन जाएगी जिसका अर्थ होगा ाजपा का छिपा हुआ हिन्दुत्व एजेंडा ।
अब प्रकाश करात स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि ाजपा ने एनडीए राज में अपना हिन्दुत्व का एजेंडा स्थगित कर दिया था। तब एक प्रश्न करात से ही पूछा जा सकता है यदि ऐसा उन्हें पता था तो उनकी पार्टी ने सोनिया गांधी की सरकार बनाने में सहायता क्यों की ? यदि प्रकाश करात अपने दिल के ीतर झांक कर ईंमानदारी से इस प्रश्न का उŸार दे देते हैं तो उन्हें उस प्रश्न का उŸार ी अपने आप ही मिल जाएगा जो वे इस समय़ सोनिया गांधी से कर रहे हैं । इस देश का सबसे बडा दुर्ाग्य यह है कि सीपीएम के लोगों ने सोनिया गांधी की इतिहास के उस मोड पर सहायता की जब अमेरिका सोनिया गांधी को ारत में स्थापित करने की अपनी महत्वपूर्ण रणनीति पर काम कर रहा था । ऐसा एक अवसर पहले ी आया था । जब सोनिया गांधी और उसके पीछे छिपे हुए एजेंडा पर काम कर रहे रणनीतिकारों ने 1999 में यह कोशिश की थी कि सोनिया गांधी का इस देश पर कब्जा हो जाए , इसके लिए सोनिया गांधी इतना आगे बढ गई कि  उन्होंने कैमरों के सामने खडे हो कर बिना कि सी संकोच के झूठ बोल दिया कि  उन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए लोक सा में बांछित बहुमत हासिल है । देश को इस बात के लिए मुलायम सिंह का आारी होना पडेगा कि उन्होेंने अत्यंत साहसपूर्वक देश पर कब्जा करने के इस षडयंत्र को असफल कर दिया । यदि मुलायम सिंह ऐसा न करते तो शायद उसी वक्त देश के सŸाा सूत्र पर सोनिया गांधी और उसके छिपे हुए रणनीतिकारों का कब्जा हो जाता । तब शायद सोनिया गांधी की सरकार उसी समय सीटीबीटी तथा एनपीटी पर हस्ताक्षर कर देती । तब श़ायद अमेरिका को आगे की लंबी रणनीति न बनानी पडती । परंतु मुलायम सिंह ने अमेरिका के सारे खेल को अपनी जमीनी बुद्धिमता से पराजित किया ।
अमेरिका ने उसी समय ारत के लिए अपनी रणनीति को बदल लिया था और यह ी निर्णय कर लिया लगता है कि वह ारत को किसी न किसी ढंग से अपना उपनिवेश बना कर ही छोडेगा । ऐसा अवसर 2004 में पुनः उपस्थित हुआ ़। इस वक्त मुलायम सिंह पर किसी ने दाँव नहीं लगाया और सीधा सीधा सोनिया गांधी ने सीपीएम से ही बात की । सीपीएम ने ी सोनिया गांधी को इतनी सहजता से समर्थन दिया कि लगता है कि परदे के पीछे काफी समय से दोनों की खिचडी पक रही थी । अब यह खिचडी इसी परमाणु समझैते के रुप में बाहर आयी है । देश जानता है कि इस  परमाणु समझौते से ारत को अमेरिका का बंधक बनाया जा रहा है । अप्रत्यक्ष रुप से अब अमेरिका ही ारत की नीतियां तय करेगा । ारत को किस देश से दोस्ती रखनी है और किस देश से नहीं इसका फैसला ी अमेरिका ही करेगा । संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी प्रस्ताव पर ारत को किस पक्ष में वोट देना है और किसके विरोेध में इसका फैसला ी अमेरिका ही करेगा । अमेरिका ने इतनी रुचि लेकर जिस उद्देश्य से ारत वर्ष के लिए सोनिया गांधी को मजबूत किया है उसकी पूर्ति में एक हिस्सा सीपीएम का ी बनता है । अब इस बात का उŸार को प्रकाश करात को ही देना होगा कि यह ूमिका उन्होंने जान बूझ कर निाई  या फिर अनजाने में । रहा प्रश्न यह कि सोनिया गांधी सरकार बचाने के लिए  परमाणु करार को क्यों नहीं छोड देती ?़। प्रकाश करात अच्छी तरह जानते हैं कि परमाणु करार को पूरा करने के लिए ही यह सरकार बनाई गई है ।़ इसको बनाने वालों ने जो जिम्मेदारी इस सरकार पर सौंपी थी यह सरकार उसे पूरा करने में पूरी इमानदारी से जुटी है । प्रकाश करात इतने ोले नहीं है कि वे अमेरिका की मंशा को नहीं जानते । इसके विपरीत प्रकाश करात और उनकी पार्टी का दावा तो यह है कि अमेरिका की मंशा को सबसे ज्यादा वही जानते हैं । इसलिए इस देश को अमेरिका के आगे गिरबी रखने की जितनी जिम्मेदारी सोनिया गांधी पर आती है उससे कहीं ज्यादा सीपीएम पर आती है जिसने उस ऐतिहासिक क्षण में अमेरिका की रणनीति में ागीदारी निाई । अलबŸाा इतना जरुर है कि आने वाले चुनावों में करात और उनके साथी अपने पापों को बुरके में छुपाएंगे और लोगों को धोखा देने के लिए अमेरिका को गालियां देते रहेंगे । रहा प्रश्न सोनिया गांधी का , उन्हें यह पाखंड करने की जरुरत ी नहीं है क्योंकि परमाणु करार के मुद्दे में कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका के हितों में ही ारत क ा हित है ।

धर्म परिवर्तन को रोकने वाले बिलों की शामत - 
छŸाीसगढ विधानसा ने पिछले दिनों धन, बल, य या धोखे से धर्मपरिवर्तन को रोकने वाला एक बिल विधानसा में पारित किया था । बिल पारित होने के बाद हस्ताक्षर के लिए राज्यपाल के पास गया । लेकिन सी को आश्चर्य  हुआ जब राज्य पाल ने उस पर हस्ताक्षर करने के बजाए उस पर ारत सरकार के विधि विशेषज्ञों की राय मांग ली । इससे पहले ऐसा किस्सा राजस्थान में ी हो चुका है । ऐसा ही बिल राजस्थान विधानसा ने पारित कि या था । लेकिन राज्यपाल ने उस पर अपनी आपŸिायां लगा कर उसे वापस विधानसा को ेज दिया था । विधानसा ने उसे पुनः पारित कर हस्ताक्षर के लिए राज्यपाल के पास ेजा । राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर करने के बजाए उसे राष्ट्पति की राय के लिए ेज दिया । राजस्थान की उस समय की राज्यपाल प्रतिा पाटिल अब खुद ही राष्ट्रपति बन गई हैं । इसलिए उनकी राय क्या है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है । ऐसा ही किस्सा गुजरात में हुआ है । यहां की विधानसा ने गलत तरीके से किये गये धर्मपरिवर्तन पर  रोक लगाने के लिए गुजरात अधिनियम में कुछ संशोधन पारित किये थे। राज्यपाल ने उस अधिमियम पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया । सी जानते हैं कि पिछले  10-15 सालों में ईसाई मिशनरियों व गैरसरकारी संस्थाओं को अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों से करोडों रुपये मिल रहे हैं और बडी तेजी से धर्म परिवर्तन हुआ है । ऐसा समय में राज्यपालों का यह व्यवहार संदेह उत्पन्न करता है । अंदर के स्रोतों का कहना है कि जबसे पोप ने ारत के राजदूत को धर्म परिवर्तन रोकने के लिए वििन्न विधान साओं में पारित किये जा रहे बिलों को लेकर सार्वजनिक रुप से फटकार लगाई है तब से सोनिया गांधी ने संकेतों में ही राज्यपालों को समझा दिया है । या फिर राज्यपाल ही इतने होशियार हो गये हैं कि वे बिना कुछ कहे सुने सब समझ गये हैं ।

और अंत में -

देश र में रामलीलाओं का जोर चलने  वाला है और बेचारे कांग्रेसी संकट में फंसे हुए हैं । न रामलीला में जाते बनता है और न बिना जाए रहा जाता है । दिल्ली की कुछ रामलीलाओं में तो पूजा के लिए राम सेतु की रामशिलाएं ी रखी जाने वाली  हैं । रामशिला का नाम ही सुन कर  कांग्रेसी ऐसे ागते हैं मानों सांप पर पैर पड गया हो । पता चला है कि कांग्रेस के ीतर की लडाई ी इस संकट को गहरा कर रही है । दिल्ली क्योंकि सŸाा का केन्द्र है इसलिए उसका संकट और ी गहरा है । आज ज्यों ही रामपूजन शुरु हुआ दिल्ली के  एक बडे कांग्रेसी नेता ी उसमें पहुंच गये । विरोधी ने तुरंत सोनिया गांधी के खेमे में खबर कर दी । इधर रामपूजन करने वाले कांग्रेसी नेता ने ी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं । इस चुगली का शक तो उन्हें पहले ही था । वे ी तुरंत 10 जनपथ पहुंचे और बताया कि रामपूजन बगैरा कुछ नहीं था । बच्चे मेले में मिठाई की जिद्द कर रहे थे । इसलिए उन्हें लेकर चला गया था । जब तक रामलीलाएं चलती रहेगी तब तक इस प्रकार के कांग्रेसी लीला ी होती ही रहेंगी । यही मानना चाहिए ।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)


सीपीएम का साम्प्रदायिक चेहरा बेनकाब


                                                       डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री


सीपीएम का व्यक्तित्व शुरू से ही दोहरा रहा है । यह सीपीएम का दोष नहीं है बल्कि उसके हार्ड वेयर का ीतरी दोष ही है । सीपीएम स्वंय का प्रगतिशील और प्रगतिवादी कहता है । उसका मानना है कि प्रगतिवाद के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा सम्प्रदाय अथवा मजहब है । इसलिए जहाँ ी साम्यवादियों की सŸाा आती है तो वे सबसे पहले वहाँ के वििन्न मजहबों अथवा सम्प्रदायों को नष्ट करने का प्रयास करते हैं । माक्र्सवादी ऐसा स्वीकार करते है कि मजहब अथवा सम्प्रदाय के आधार पर व्यक्ति की जो पहचान बनती है  वह प्रगति के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा होती है । इसके विपरीत व्यक्ति की पहचान उसके वर्ग के आधार पर होनी चाहिए । वर्ग की यह पहचान संघर्ष की धार को तेज करती है जिससे प्रगतिवादी समाज की स्थापना होती है ।

ारत के माक्र्सवादी ी मोटे तौर पर इस सिद्वांत को स्वीकार करते हैं  और उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार ी है । ारत की मिट्टी की यही खूबी है कि यहाँ वििन्न विचारधाराओं, और दर्शन शाóों को विकसित होने का पूरा अधिकार है । परन्तु सीपीएम की यह दिक्कत है  िकइस वैचारिक आधार पर वे इस देङ्घा की सŸाा हासिल नहीं कर सकते । यही कारण है कि साम्यवादी आंदोलन सिकुड़ता सिकुड़ता अन्ततः पङ्घिचमी बंगाल और केरल तक सीमित हो गया है । पङ्घिचमी बंगाल में ी कामरेडों के ्रष्टाचार और जनविरोधी आचरण के कारण, उनका दुर्ग हिलने लगा है । केरल में तो पहले ही वे पाॅच साल के अन्तराल के बाद सŸाा में आ पाते हैं । सŸाा प्राप्त करने की हड़बड़ी में सीपीएम ने अब विशुद्व अवसरवादी रास्ता अख्तियार करने का निर्णय कर लिया लगता है । यही कारण है कि सीपीएम लोकसा के होने वाले चुनावों में केरल में मुस्लिम आतंकवादी संस्थाओं के साथ चुनाव समझौता कर रही है । सीपीएम ी जानती है कि यदि कट्रतावादी मुस्लिम संस्थाओं  और आतंकवादी मुस्लिम संगठनों की मदद ली जाती है तो शायद कुछ सीटें तो पार्टी की झोली में आ जायेगी परन्तु उससे देशा को बहुत नुकसान होगा । साम्प्रदायिकता के जहर से राष्ट्ीयता खंडित होती है- ऐसा कामरेड ली ांति जानते हैं  । परन्तु लगता है दिल्ली की सŸाा में अपनी ागीदारी सुनिङ्घिचत करने की सीपीएम को इतनी व्याकुलता है कि वह साम्प्रदायिकता के इस अजगर को साथ लेने से ी गुरेज नहीं कर रही ।

प्रसंग केरल का है । केरल में सीपीएम ने अबदुल निसार मदनी की पीपुल्स डेमोक्रेटिक  पार्टी से चुनावी समझौता किया है । मदनी कोयम्बटुर बम बलास्ट के मुख्य अियुक्त थे । उनके लश्कर और इंडियन मुजाहदीन से गहरे रिङ्घते हैं । वैचारिक स्तर पर उनकी पार्टी मुसलमानों को अलग राष्ट् के रूप में मानती है और वे स्वंय को ारत का विजेता मानने का स्वप्न पालते हैं । मदनी और उनकी पार्टी मानती  है कि मुसलमानों ने ारत को जीता था और इस पर अपना राज्य स्थापित किया था । मुसलमानों से अंग्रेजों ने ारत का राज्य छीन लिया लेकिन दो सौ साल बाद वे यहाँ से जाते समय राज्य ारतीयों को सौंप कर चले गये, मुसलमानों को नहीं । मदनी और उनके अनुयायी अब यह राज्य आतंक और शó बल से प्राप्त करना चाहते हैं । यह अलग बात है कि मदनी और उन जैसे दूसरे लोग ारत पर आक्रमणकारी मुसलमानों की सन्तान नहीं हैं बल्कि वे ारतीयों में से ही परिवर्तित हुए हैं । परन्तु मदनी अपनी पहचान उन आक्रमणकारी मुस्लिम आक्रांताओं से ही जोड़ते है। सीपीएम इसी मदनी से चुनाव में समझौता कर रही है । इससे केरल का सम्पूर्ण राजनैतिक परि॰श्य साम्प्रदायिक विष से विषाक्त हो जायेगा । परन्तु कामरेड तमाम सिद्वांतों को ूल कर साम्प्रदायिकता का वर्जित सेब खाना चाहते है। यह अलग बात है कि यह सेब खाने के बाद वे ारत के स्वर्ग से बाहर धकेल दिये जायेंगे । लेकिन सŸाा के सेब के लालच ने उनकी आॅखों पर पट्टी बांध रखी है ।

ऐसा नहीं कि मदनी और उनकी पार्टी के इस सम्प्रदायिक चेहरे को सीपीएम वाले पहचान नहीं रहे । यहाँ तक कि मदनी से समझौता करने के प्रङ्घन पर सीपीएम के ही कुछ तपे तपाये और सिद्वांतवादी लोग खिन्न चिŸा हैं । केरल के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानन्दन इसका विरोध कर रहे हैं । उन्होंने तो यहाँ तक कहा है कि केरल सरकार मदनी के आतंकवादियों से सम्बन्धों की जाॅच ी करवा रही है । उनका मानना है कि मदनी जैसे साम्प्रदायिक आतंकवादियों से समझौते से सीपीएम की मूल पहचान समाप्त हो जायेगी और वह सŸाा लोलुप राजनैतिक दल के रूप में परिवर्तित हो जायेगी  । परन्तु जैसा की राजनीति में होता है सŸाा के लालच में जब कोई ी राजनैतिक दल अपने सिद्वांत छोड़कर बाजार में निकल आता है तो उसके लिए मर्यादा की सी सीमाएं अपने आप ही समाप्त हो जाती हैं । इसी के चलते सीपीएम ने सबसे पहले ्रष्टाचार और ्रष्टाचारियों से समझौता किया । केरल के सीपीएम के महासचिव विजय पिन्यारी कनाडा की किसी कम्पनी के साथ करोड़ों के घोटाले में संलिप्त पाये गये । प्रदेश के मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन ने इसकी जाॅच ी करवानी चाही , लेकिन सारी पोलित ब्यूरो विजय के साथ खड़ी हो गई । शायद एक कारण यह ी रहा होगा कि विजय की जाॅच के बाद पता नहीं कितने चेहरे बेनकाब हो जायेंगे ।


्रष्टाचार से समझौता करने के बाद दूसरा पड़ाव अब्दुल निसार मदनी की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ समझौते का ही बचता था, जो सीपीएम ने पूरा कर दिखाया है । गाँव की एक कथा है कि मेरा बेटा जुआ तब खेलता है जब शराब पी लेता है । शराब ती पीता है जब मीट खा लेता है और मीट ती खाता है जब उसे वेश्यालय में जाना होता है । वैसे बेटे में कोई दोष नहीं है । लगता है कार्ल माक्र्स के इस ारतीय बेटे की यही दशाा हो रही है । माक्र्स ी सीपीएम के इस साम्प्रदायक चेहरे को देखकर कब्र में अपने बाल नोच रहे होंगे ।

तसलीमा नसरीन की नजरबंदी से बेनकाब हुए अनेक चेहरे:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
तसलीमा नसरीन को दिल्ली में ारत सरकार ने एक प्रकार से सरकार ने उसके घर में ही नजरबंद कर दिया है। वैसे नसरीन के बंगाली ाई विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी इस नजरबंदी की बात को नकार रहे हैं। प्रणव बाबू खुद की नजरबंद रहे हैं या नहीं इसका किसी को ज्यादा ज्ञान नहीं है। लेकिन जो लोग जेल यात्रा करते रहते हैं, उनको पता है कि किसी ऐसी जगह पर किसी को बैठा देना जहां से वह अपनी इच्छानुसार कहीं जा न सकता हो, कोई उसे मिल न सकता हो, अपनी इच्छानुसार वह अपनी बात कह न सकता हो और न ही अपनी इच्छानुसार लिख सकता हो इसी को नजरबंदी कहते हैं। तसलीमा नसरीन बंगाली कन्या है। साम्यवादियों ने, कांग्रेस ने और अंग्रेजों ने मिल-मिलाकर उस बंगाल के बीच में क्या-क्या लकीरें खींच दी । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। संव है कि आगे ी कौन सी नई लकीरें खींच जाएं, इस पर अब अविश्वास नहीं किया जा सकता? परंतु इन लकीरों का खामियाजा तसलीमा नसरीन को ुगतना पड़ रहा है। बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन ने ऐसी गाथाएं लिखनी शुरू कर दी, जिससे वहां रह रहे हिन्दुओं की  अंतरव्यथा ध्वनित होती थी। ारतवर्ष में, जिसमें इस विश्लेषण के लिए बांग्लादेश और पाकिस्तान को ी शामिल किया गया है, कुछ-कुछ ऐसी स्थिति बनती जा रही है कि जो ी हिन्दू की बात करता है, वह तुरंत फायरिंग जोन में आ जाता है। तसलीमा नसरीन बांग्लादेश मंे इसी प्रकार के फायरिंग जोन में फंस गई थी। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि इस फायरिंग जोन में बंदूक सिर्फ कट्टरपंथी चला रहे हैं परंतु तसलीमा के केस को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह बंदूक कट्टरपंथियों के हाथ में ी है और इस क्षेत्र की सरकारों के हाथ में ी। जो हिन्दुओं की बात करता है उसको इन दोनों के ही कोप का ाजक बनना पड़ता है। तसलीमा नसरीन बांग्लादेश से ारत मंे आई थी। दुर्ाग्य से उसने यहां आकर ी इस्लाम के कट्टरपंथी चेहरे को बेनकाब करना नहीं छोड़ा। उसका साहस देखिए कि उसने द्विखंडिता लिख दी। खंडित ारत में द्विखंडिता ! जाहिर था कि जो लोग ारत को 1947 में खंडित करवाने में सफल हो चुके थे उन्होेंने 2007 मंे ी तसलीमा नसरीन को घेर लिया। सीपीएम को नंदीग्राम का ालू नोंच रहा था। इसलिए सीपीएम ने मुस्लिम सांप्रदायिकता से हाथ मिला लिया। इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए और तसलीमा नसरीन को पश्चिमी बंगाल से गा दिया। पूर्वी बंगाल की इस कन्या को न ढाका में सुख है और न कोलकाता में। क्योंकि यह बंग कन्या सत्य बोलती हुई ढाका और कोलकाता की सड़कों पर घूमती रही है। कोलकाता से आते ही उसे दिल्ली सरकार ने पकड़ लिया और उसे घर में नजरबंद कर दिया। इतना ही नहीं यदि उसने जबान खोली तो उसे ‘आर्यवर्त’ की धरती से बाहर कर दिया जाएगा, ऐसी धमकी ी सोनिया गांधी की सरकार ने दे डाली। सीपीएम को नंदीग्राम के ूत से पीछा छुड़ाना था इसलिए उसने मुस्लिम सांप्रदायिकता से समझौता किया और कांग्रेस को गुजरात में मुसलमानों के वोट लेने थे इसलिए उसने इस्लामी कट्टरता से हाथ मिला लिया और दोनों ने मिलकर तसलीमा नसरीन को बीच बाजार में फांसी के तख्ते पर लटका दिया। यह फांसी उसके विचारों की फांसी है। उसकी आस्था की फांसी है। उसके विश्वास की फांसी है।
लेकिन उसके बाद वे सी चेहरे धीरे-धीरे बेनकाब होते गए जो इतने सालों से मानवाधिकारों का मुखौटा पहनकर घूम रहे थे। बडौदा विश्वविद्यालय में देवी-देवताओं का अपमान करने वाले एक छात्र के निलंबन को लेकर जिन लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया था, तसलीमा नसरीन के हश्र को देखकर उनकी जी तालु से चिपक गई। जावेद अख्तर मौन हो गए। शबाना आजमी शायद नमाज़ पढ़ने चली गई हो। तीस्ता सीतलवाड़ तीस्ता नदी की लहरें गिनने में ही व्यस्त हो गई लगती हैं। तारकुंडे के चेले अपनी गुफाओं में छिप गए लगते हैं। राजेन्द्र सच्चर सच को शायद इतना नजदीक देखकर अपने बंगले में छिप गए लगते हैं । मुसलमानों के विकास के लिए विशेष बजट का प्रावधान करने वाले और उनके लिए आरक्षण का ढोल पीटने वाले तसलीमा नसरीन से आँखें चुराकर निकल रहे हैं। सैय्यद शहाबुद्दीन अपने सैय्यद होने की गुरुता मंे ही शायद दब गए लगते हैं। पता कर लिया जाए तसलीमा नसरीन सैय्यद है या नहीं। ये वे चेहरे हैं जो तसलीमा नसरीन के इस प्रकरण में बेनकाब हो गए हैं । परंतु ारत की जनता तसलीमा नसरीन के साथ है क्योंकि न उसने  सीपीएम का नंदीग्राम में पीछा करना छोड़ा है और न ही उसने कांग्रेस की आशाओं के  अनुरूप गुजरात में उसे विजयी ही बनाया है।
तसलीमा नसरीन की इस लड़ाई में वे चेहरे ी बेनकाब हुए हैं जो मजहब परिवर्तन करके बने मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए दिनरात एक कर रहे है। रंगनाथ मिश्रा आयोग के सदस्य मौन है। लोगों के मानवीय अधिकारों की आड़ में राजनीति की रोटियां सेंकने वाले चुप हैं। की ारतेन्द्र हरिश्चन्द्र ने लिखा था-‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न वति।’ शायद मुसलमानों के दुःखों को लेकर काल्पनिक हो-हल्ला मचाने वाले ये वीर इस बात को नहीं समझते कि एक चिंतनशील प्राणी का सबसे बड़ा दुःख तब होता है। जब उसकी आवाज को बंद कर दिया जाए। तसलीमा नसरीन के मामले में ऐसा ही हुआ है और दुर्ाग्य से इस पूरे प्रश्न को सांप्रदायिकता के रंग में देखा जा रहा है। इस देश का यही दुर्ाग्य है कि यहां मानवाधिकार के प्रश्न को ी सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जा रहा है। यहां हिन्दू का दर्द, दर्द नहीं माना जात है और मुसलमान का दर्द ही सही दर्द है। यदि इसी मानसिकता से राज्य चलेगा तो दरारें बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी। 1947 से पहले की अंग्रेज सरकार ी दरारें बढ़ा रही थी और आज की कांग्रेस और सीपीएम की सरकार ी यही धंधा कर रही है। सरकार राज धर्म का पालन नहीं कर रही , लगता है वह इस्लाम धर्म का पालन कर रही है जिसके अनुसार मोमिन की मानसिकता पर उंगली उठाना ही कुफ्र है। तसलीमा नसरीन ने यह कुफ्र किया है और ारत सरकार उसे इस कुफ्र का दंड दे रही है। मुसलमानों को जश्न मनाना चाहिए कि अंततः हिन्दुस्तान दारूल इस्लाम बन गया है। जिसमें कांग्रेस और सीपीएम मौलवी की ूमिका में उतर आए हैं।

और अंत में:- करवाचैथ का दिन था। श्रीमती जी ने तड़के ही उठकर रसोई में खटर-पटर शुरू कर दी। तड़के उठने के कारण वह स्वयं ी दुःखी थी। ऊपर से सारे दिन का व्रत रखना था और पूजा की वह तैयारी कर ही रही थी। पतिदेव की ी नींद टूटी । ब्रह्म मुहूर्त की नींद टूटने से जो कष्ट होता है वह जाहिर है कि पतिदेव को हुआ। उसने गुस्से से पत्नी को कहा-‘यह क्या खट-खट लगा रखी है, सोने ी नहीं देती।’ पत्नी तो पहले ही गुस्से में थी। उसने तुनक कर कहा-‘तुम्हारा ही स्यापा कर रही हूँ।’ पति ने कहा- ‘तब ठीक है, करती रहो।’

दिनांक: 25 दिसंबर 2007, बुधवार


बेनकाब हुआ सीपीएम का सांप्रदायिक चेहरा:

 डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
कहते हैं चीता अपनी धारियाँ नहीं छुपा सकता लेकिन सीपीएम की दाद देनी पड़ेगी कि उसने 30 साल तक न केवल न अपनी धारियाँ छिपा कर रखीं बल्कि अपने चीता होने का प्रमाण ी छिपाए रखा। अब जब पर्दा हटा है तो उसके खूंखार पंजे पैने दांत स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। सीपीएम की पूंजीवादी धारियाँ तो पिछले 6-7 सालों से तेजी से प्रकट होनी शुरू हो ही गई थीं। लेकिन वे पूंजीवादियों के दलाल ही बन जाएंगे ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। नंदीग्राम को देखकर लगता है कि वहां सीपीएम के लोग नहीं लड़ रहे बल्कि किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के प्रशिक्षित गुंडे आम जनता पर अत्याचार ढा रहे हैं। नंदीग्राम में पूंजीपतियों के पक्ष में सीपीएम का बंदूक लेकर गांव-गांव में निकल पड़ना और विरोध के हर स्वर को गोली से शांत कर देना। उसका एक पक्ष था। लेकिन पिछले दिनों उसका जो दूसरा सांप्रदायिक पक्ष सामने आया है वह उसके पूंजीवादी पक्ष से ी ज्यादा खतरनाक है। अी तक नंदीग्राम के संघर्ष को किसी ने सांप्रदायिक ॰ष्टिकोण से मूल्यांकित नहीं किया था। नंदीग्राम में जो लड़ रहे हैं, वे किसान हैं । न वे हिन्दू हैं, न वे मुसलमान हैं। वे किसान अपनी जमीन के लिए लड़ रहे हैं। उनमें से ज्यादातर किसी राजनैतिक दल से ताल्लुक ी नहीं रखते । वे अपनी रोजी रोटी के लिए अपने अधिकारों के लिए उस राज्य सरकार से लड़ रहे हैं जो राज्य सरकार जाहिर तौर पर इन्हीं के हितों का पोषण करने की बात कहती रही हैं। लेकिन पिछले दिनों कोलकाता में जो कुछ हुआ उसने सीपीएम को बीच चैराहे में नंगा कर दिया। किसी अखिल ारतीय अल्पसंख्यक फ्रंट के लोगों से नंदीग्राम को लेकर प्रदर्शन करवाया गया। वह सीपीएम के संप्रदायिक चेहरे को बेनकाब करता है। सीपीएम नंदीग्राम को हिन्दू-मुस्लिम समस्या का रूप देना चाहती है । इतना ही नहीं। उसने इसी अल्पसंख्यक फ्रंट के माध्यम से नंदीग्राम के साथ ही तसलीमा नसरीन के वीजा के प्रश्न को नत्थी कर दिया। अल्पसंख्यक फ्रंट के लोगों का कहना है कि नंदीग्राम में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है। सरकार मूल रूप में ही मुसलमानों के खिलाफ है। इसका एक और सबूत यह है कि पश्चिमी बंगाल सरकार ने तसलीमा नसरीन को कोलकाता में रखा हुआ है। उसे तुरंत बंगाल से निकाला जाना चाहिए । अन्धा क्या मांगे दो आँखे। सारी की सारी सीपीएम क्या बुद्ध देव ट्टाचार्य और क्या विमान बोस, क्या सीताराम येचुरी और क्या प्रकाश करात सब तसलीमा के पीछे लठ लेकर पड़ गए हैं। अल्पसंख्यक फ्रंट को खुश करने के लिए सीपीएम की सरकार ने तसलीमा नसरीन को जबरदस्ती विमान में बिठचकर राजस्थान रवाना कर दिया। यहां तक कि उसे नित्य प्रयोग के कपड़े ी उठाने नहीं दिए। सीपीएम का यह निर्लजतापूर्ण सांप्रदायिक आचरण यद्यपि ऊपर से स्तंित कर देने वाला है लेकिन जो इस दल के इतिहास से वाकिफ  हैं वे जानते हैं कि सŸाा में बने रहने के लिए सीपीएम की ी घनघोर घंघोर सांप्रदायिक व्यवहार कर सकती है। नंदीग्राम में सर्वहारा की एकता को तोड़ने के लिए सीपीएम द्वारा चलाया गया यह घृणित सांप्रदायिक हथियार है। सबसे बड़ी बात यह है कि तसलीमा नसरीन मूल रूप से बंग ाषी ही है। यदि वह किसी और प्रांत की होती तो शायद अल्पसंख्यक फ्रंट को खुश करने केलिए सीपीएम के लोग उसे खुद ही रात के अंधेरे में बांग्लादेश की सीमा में धकेल देते। सर्वहारा के लिए संघर्ष करने का दम रने वाली सीपीएम किसी दिन सŸाा सुख के लिए अपनी सांप्रदायिक जी से ही दंश मारेगी ऐसा कम से कम बंगाल के किसानों ने और नंदीग्राम में अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों ने नहीं सोचा होगा। अलबŸाा सीपीएम के पक्ष में इतना जरूर जाता है कि उसकी दार्शनिक आधार ूमि शुरू से ही यह मानती है कि सŸाा बंदूक की नली से निकलती है। वक्त पड़ने पर उन्होंने नंदीग्राम के माध्यम से बता ी दिया है कि पिछले 30 सालों से इसी बंदूक की नली से पश्चिमी बंगाल की सŸाा पर कब्जा जमाए हुए हैं। अब जब नंदीग्राम के लोगों ने साहस करके बंदूक की नली को ही पकड़ लिया हैतो सीपीएम वालों ने उनकी सफों में सांप्रदायिकता का सांप छोड़ा है। इस आशा के साथ कि शायद वह सर्वहारा की एकता को तोड़ दे या कम से उनको डरा ही दे। इसके लिए सीपीएम तसलीमा नसरीन को  बली का बकरा बनाना चाहती है।
सोनिया गांधी का रसोईया:- हिमाचल प्रदेश के विधानसा के उपाध्यक्ष सकते में है। चुनावों में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। उनकी जगह जिसको टिकट दिया गया है, उसका नाम कोई नहीं जानता और नाम जानने की शायद किसी को जरूरत ी नहीं है। क्योंकि बिना नाम के ही उसकी पहचान क्षेत्र में बन गई है वह सोनिया गांधी के रसोईये का बेटा है। रसोईया पुराना है। इंदिरा गांधी के वक्त से ही चैका चूल्हा संालता रहा है। दालाजी सब्जी सब बनाता है। मुर्ग मुसल्लम ी बनाता होगा। दालसब्जी बनाते-बनाते बेचारा बूढ़ा हो गया। अब सोनिया गांधी इनाम इकराम बांट ही रही हैं। बेचारे रसोइये ने कुछ माँगा, लेकिन जो उसे मिला शायद उसने स्वप्न में ी कल्पना नहीं की होगी। सोनिया ने कहा - जाओ । तुम्हारे बेटे को हिमाचल प्रदेश में अरकी नाम की रियासत का राजा बना दिया है। यदि लोकतंत्र की ाषा में बात की जाए तो अरकी विधानसा से उसे कांग्रेस का टिकट दे दिया गया है। पता चला है कि वह रसोईया अब जब ी किसी से मिलता हैतो एक ही बात कहता है कि इटली के लोग बड़े दरियादिल हैं। जब खुश होते हैं तो राजा बना देते हैं। किसी ने कहा- अरे ाई। यह नई बात नहीं है जब अंग्रेज यहां राज करते थे तो सेवा करने वालों को रायबहादुर या रायसाहब बना देते थे।
और अंत में:- दोनों में से एक मित्र की शादी हो गई । दो तीन महीने के बाद शादी शुदा मित्र के घर गैर शादीशुदा मित्र पहुँचा। उसे आश्चर्य हुआ कि उसका मित्र रसोईघर में ोजन बना रहा था और उसकी पत्नी पास खड़ी गप्पे हाँक रही थी। मित्र ने व्यंग्य से कहा - क्यों ाई। रसोई का काम तुम्हें ही करना पड़ता है? ाीजी नहीं करती क्या? शादीशुदा मित्र ने उसी उत्साह से जवाब दिया-नए युग में पुरूष और óी सब बराबर है। एक दूसरे के काम में सहायता की जानी चाहिए। जब घर के कपड़े धुलवाने में तेरी ाी मेरी सहायता करती है तो मैं ला रोटी बनाने में मैं उसकी सहायता क्यों न करूँगा।


(27 नवंबर 2007,  मंगलवार द्ध

सलवा जुडुम माओवादियों के असली चेहरों को नंगा करता है:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
नक्सलवाद को जन्म देने वाले दो शख्स थे। चारू मजूमदार और कानू सान्याल। उŸारी बंगाल के सिलगढ़ी के पास के एक गांव नक्सलवाड़ी से यह आंदोलन शुरू हुआ था। सान्याल और मजूमदार ने ज्योति बसु के नेतृत्व में पश्चिमी बंगाल में बनी पहली साम्यवादी सरकार को चुनौती दी थी। जिन दिनों  बंगाल में साम्यवादियों की सरकार आई उन दिनों वहां की युवा पीढ़ी को लगता था कि अब पश्चिमी बंगाल की तमाम समस्याओं का हल हो जाएगा। उन्हें ज्योति बसु में विश्वास था या कार्लमाक्र्स के सिद्धांतों में यह अी ी विवादास्पद है। ज्योति बसु की सरकार के सŸाा में आने के कुछ अरसा बाद ही नक्सलवाड़ी से उठी इस आवाज ने साम्यवादी कुनबे को चुनौती दी। उनका गंीर आरोप था कि सीपीएम ने कार्ल माक्र्स की राह छोड़ दी है। वे सŸाा के सुख में लिप्त हो गए हैंऔर इतना ही नहीं वे अपने विरोधियों को ‘इलिमीनेट’ कर रहे हैं। सीपीएम का टोला पश्चिमी बंगाल की जनता से टूट चुका है। परंतु इससे जुड़ा एक और प्रश्न है। यदि सीपीएम और उसके टोले के साथी जनता से टूट चुके हैं तो आखिर पिछले तीस सालों से वे राइटरस बिल्डिंग में अपनी पकड़ कैसे बनाए हुए हैं? नक्सलवाडी से जो स्वर उठे थे और उनमें से जो कुछ अी ी बचे हैं उनका कहना है कि सीपीएम कार्ल माक्र्स को तो नहीं समझ पाया लेकिन वह हिंसा के जोर पर चुनाव जीतने की कला में पारंगत हो गया है।

चारू मजूमदार तो ज्योति बसु की जेलों में दम तोड़ गए। कानू सान्याल अी ी बुढ़ापे में कार्ल माक्र्स के सूत्रों के अर्थ समझने के प्रयास में लगे हुए हैं। उन्होंने पिछले दिनों एक अखबार को दिए साक्षात्कार में कहा ज्योति बाबू तो कार्ल माक्र्स को सŸाा के शुरुवाती दौर में अलविदा कह गए थे। लेकिन उसके बाद नक्सलवाड़ी के नाम पर कार्लमाक्र्स के सूत्रों की जो व्याख्याएं हुईं वे शायद दोषपूर्ण ी थीं और जनसाधारण के लिए अलाकारी ी । कानू सान्याल का मानना है कि नक्सलवाड़ी का नया संस्करण माओवाद अपने आप को माक्र्सवादी नहीं कहलवा सकता। ारत में माओवादी दरअसल  अराजकतावादी कहे जा सकते हैं। व्यक्तिगत हिंसा से निजाम नहीं बदला जा सकता।
परंतु माओ ने एक बार कहा था सŸाा बंदूक की गोली से निकलती है। कार्ल माक्र्स की व्याख्या के लिए जब लोगों ने इस सूत्र का प्रयोग किया तो शायद उसका अर्थ यह निकाल लिया कि हिंसा और अराजकता ही सŸाा प्राप्ति का रास्ता है। परंतु प्रश्न यह है कि हिंसा किसके प्रति? राज्य के प्रति अथवा जनता के प्रति? जनता में ी हिंसा का निशाना कौन सा वर्ग होना चाहिए? शोषित सर्वहारा वर्ग अथवा शोषक वर्ग? रणूमि में जाकर विवेक अंधा हो जाता है और नियम ताक पर रख दिए जाते हैं। रहा सवाल कार्ल माक्र्स के सूत्रों का उनकी उतनी ही व्याख्याएं हैं जितने उसके शिष्य हैं। प्रत्येक साम्यवादी कार्ल माक्र्स का अनुयायी होने का दावा करता है और दूसरे अनुयायी को संशोधनवादी करार दे रहा है। शायद यही कारण है कि नक्सलवाड़ी से कार्लमाक्र्स के सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए उठा आंदोलन इस बुरी तरह बंटा कि इससे उसके टुकड़ों की संख्या सैकड़ों में हो गई। छŸाीसगढ़ में चल रहा माओवादी आंदोलन उन्हीं टुकड़ों में से एक टुकड़ा है।
छŸाीसगढ़ में नक्सलवादी आंदोलन एक ऐसे विरोधाास में से गुजर रहा है जो देर सबेर इसको विखंडित करेगा और इसके अंतर्विरोधों को अधिक तीव्रता से जागृत करेगा। मुख्य प्रश्न यह है कि नक्सलवादी आंदोलन के इस वर्ग संघर्ष में ये कौन से वर्ग हैं जो आपस में संघर्षरत है? माक्र्स ने दो वर्गों की कल्पना की है। एक सर्वहारा वर्ग और दूसरा पूंजीपति वर्ग । माक्र्स मानते हैं कि इन दोनों वर्गों के रास्ते एक दूसरे को काटते हुए गुजरते हैं। पूंजीपति वर्ग सर्वहारा के श्रम का शोषण करता है। माक्र्स की कल्पना थी कि धीरे-धीरे स्थितियां ऐसे मोड़ पर आ जाती हैं कि सर्वहारा वर्ग पूंजीपति वर्ग के खिलाफ संघर्ष में जुट जाता है। माक्र्स की यह ी विष्यवाणी थी कि इस संघर्ष में अंत में विजय सर्वहारा वर्ग की ही होती है और सर्वहारा वर्ग की तानाशाही स्थापित हो जाती है। माक्र्सवादी साहित्य में इसके लिए केन्द्रीयकृत लोकतंत्र शब्द का प्रयोग किया जाता है। जिस समय कार्ल माक्र्स पूंजीपतियों द्वारा सर्वहारा वर्ग के श्रम के शोषण के सिद्धांत को गढ़ रहे थे उन दिनों शायद उनके मन में यूरोप में नई उर रही औद्योगिक व्यवस्था रही होगी। औद्योगिक क्षेत्रों में एक स्थान पर पूंजी का ारी निवेश होता है और श्रमिकों के श्रम का दोहन ी और शोषण ी होता है। लेकिन कार्ल माक्र्स ने स्थानीय  अनुवों के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों को सार्वौमिक और सर्वकालिक घोषित कर दिया। ारत में जहां नक्सलवादी आंदोलन बढ़ रहा है, विशेषकर छŸाीसगढ़ में, वहां औद्योगिक प्रगति के नाम पर कुछ उत्साहजनक है-ऐसा कहा नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में वह पूंजीपति वर्ग जिसकी कल्पना कार्लमाक्र्स करते हैं छŸाीसगढ़ में विद्यमान नहीं हैै। जहां छŸाीसगढ़ शब्द का प्रयोग हम केवल केस स्टडी के लिए कर रहे हैं। अन्यथा इसकी जगह झारखंड, आंध्र प्रदेश, बिहार और नेपाल शब्द का प्रयोग ी किया जा सकता है। तब प्रश्न पैदा होता है कि छŸाीसगढ़ में नक्सलवादी किस वर्ग का नेतृत्व करते हैं और किस वर्ग के साथ वह संघर्षरत हैं। वर्ग संरचना को लेकर जब तक यह कोहरा छंट नहीं जायेगा तब तक यह संघर्ष  माक्र्सवादी संघर्ष न होकर व्यक्तिगत दुस्साहसिक अराजकतावाद ही कहा जाएगा। शायद इसी कारण कानू सान्याल ने ी नक्सलवादियों की इस हिंसा को वैचारिक संघर्ष न कहकर अराजकतावाद का ही नाम दिया है।
छŸाीसगढ़ में नक्सलवादी आंदोलन की वर्ग संघर्ष की बात को आगे बढ़ाने से पहले इस आंदोलन में एक दूसरे पक्ष पर विचार करना ी महत्वपूर्ण है। माओवादी जंगलों में और गांवों में वनवासी क्षेत्रों के युवाओं को हथियारों की ट्रेनिंग दे रहे हैं। जाहिर है हथियार के साथ-साथ वे उन्हें माक्र्सवाद की घुट्टी ी पिला रहे होंगे। यह अलग बात है कि इस घुट्टी का ब्रांड वही होगा जो इस समूह ने प्राप्त किया होगा। माओ ने ी कार्लमाक्र्स की अपने ढंग से व्याख्या की थी और कार्लमाक्र्स की सर्वहारा की तानाशाही को प्राप्त करने के लिए उसकी तकनीकों पर ी विचार किया था। माओ ने कहा था कि गांव के लोगों को इकट्ठे होकर शहरों को घेरना होगा। जब गांव में लोग वैचारिक रूप से संघर्ष के लिए परिपक्व हो जाएंगे तो वे नगरों को घेर लेंगे। इसके लिए उन्हें हथियारों की कमी नहीं पड़ेगी क्योंकि वे परंपरागत हथियारों का ही प्रयोग करेंगे और सरकारी हथियारगृहों से हथियारों को लूटेंगे। गांवों द्वारा की जाने वाली इस प्रकार की घेराबंदी से सŸाा के केन्द्र नगर ढह जाएंगे और सŸाा सूत्र सर्वहारा वर्ग के हाथ में आ जाएंगे। माओ को कार्लमाक्र्स के रास्ते से हटकर ये तकनीकें इसलिए अपनानी पड़ीं क्योंकि माओ वस्तुतः किसी वर्ग के खिलाफ संघर्ष नही कर रहे थे। वे अपने देश की उस सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे जिसका स्वरूप न लोकतांत्रिक  था और न ही प्रतिनिधि प्रकार का, बल्कि इसके विपरीत वह सरकार अमेरिका की पिट्ठु होने के कारण चीनियों में इस हद तक अलोकप्रिय थी कि चीनी उसे एक प्रकार से विदेशी सरकार ही समझते थे। अमेरिका जिस प्रकार खुले रूप में च्यांगकाई शेक की मदद कर रहा था उससे यह धारणा और ी पुख्ता होती थीकि च्यांगकाई शेक और उसकी ईसाई पत्नी एक प्रकार से अमेरिका के प्रतिनिधि के रूप में ही चीन की सरकार चला रहे थे। माओ ने कार्लमाक्र्स और उसके सिद्धांत को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया। वास्तव में वे देश में हान राष्ट्रवाद की आग सुलगा रहे थे। राष्ट्रवाद की यह आग तब ज्वालामुखी बन गई जब द्वितीय विश्वयुद्ध में माओ के लड़ाकों ने जापान की आक्रांता सेना के साथ लोहा लिया। इसलिए माओ का संघर्ष मूलतः हान राष्ट्रवाद का संघर्ष था जिसमें उन्हें सफलता मिली।
छŸाीसगढ़ के नक्सलवादी माओ की इस तकनीक को छŸाीसगढ़ में अपना रहे हैं। परंतु वे ूल रहे हैं कि वे जाने में या अनजाने में विदेशी शक्तियों के पिट्ठु बनते जा रहे हैं। इस प्रकार उनका रास्ता वास्वत में माओ की विपरीत दिशा में जाता है। जो शक्तियाँ ारत को शक्तिशाली नहीं देखना चाहतीं वे सी शक्तियाँ नक्सलवादियों की पीठ के पीछे दिखाई दे रही हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि माओवादियों के संरक्षण में कुछ ऐसी शक्तियां ी सक्रिय हैं जो वैचारिक धरातल पर माक्र्सवाद के खिलाफ हैं। नक्सलवादी यदि इन शक्तियों के साथ मसलन मिशनरियों, इस्लामी आतंकवादियों के साथ एक मंच पर खड़े दिखाई देते हैं तो जाहिर है कि उनका उद्देश्य ारत विरोध या फिर ारत को कमजोर करना तो हो सकता है, उनका उद्देश्य माक्र्स के वर्ग संघर्ष को उसकी अंतिम परिणति तक पहुंचाना नहीं हो सकता। इस ॰ष्टि से छŸाीसगढ़ में या देश में अन्यत्र ी नक्सलवाद माओ का नकार ही कहा जा सकता है, उसका अनुकरण नहीं। माओ का आंदोलन माक्र्स की आड़ में राष्ट्रवादी आंदोलन था और छŸाीसगढ़ के नक्सलवादियों का आंदोलन माक्र्सवाद और माओवाद दोनों की आड़ में अराष्ट्रीय आंदोलन ही माना जाएगा। इसके प्रमाण यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध हैं।
अब हम पुनः उसी मूल प्रश्न पर आते हैं कि छŸाीसगढ़ का नक्सलवादी आंदोलन किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है और इसकी दशा और दिशा क्या है? यह नक्सलवादी आंदोलन पूंजीवादी वर्ग के खिलाफ संघर्षरत न होकर सर्वहारा वर्ग के ही उन लोगों को निशाना बना रहा है जो लोग इस आंदोलन के नेतृत्व के थीसीस और आंदोलन में अपनाई जाने वाली तकनीकों के विरोधी हैं। कायदे के मुताबिक तो नक्सलवादियों को सर्वहारा के ीतर के अपने वैचारिक विरोधियों को ‘डाइलैक्टिकल क्रिटीसिजिम’ के आधार पर अपने पक्ष में करना चाहिए थाऔर तकनीक के प्रति ी तार्किक आधार ही अपनाया जाना चाहिए था। परंतु नक्सलवादी आंदोलन के ये अगुवा नेता सर्वहारा वर्ग के ीतर तर्क को समाप्त करने के लिए बंदूूक का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह अपने आप में माक्र्सवाद का नकार है। इतना ही नहीं ये नक्सलवादी नेतृत्व छोटे स्तर के शास्कीय कर्मचारियों की हत्या को क्रांति के नाम से महिमामंडित कर रहा है जबकि कायदे से ये कर्मचारी उसी सर्वहारा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं जिसके उत्थान के लिए कार्लमाक्र्स ने ‘दास कैपिटल’ का बड़ा ग्रंथ लिखा । कार्ल माक्र्स सर्वहारा वर्ग द्वारा सŸाा सूत्रों पर कब्जा करने के सिद्धांत को एक वैज्ञानिक प्रणाली के रूप में विकसित करते हैं और माओ इसी को आगे बढ़ाते हुए सŸाा बंदूक की नली से निकलती है इस सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं। परंतु  दुर्ाग्य से छŸाीसगढ़ में नक्सलवादी आंदोलन का नेतृत्व प्रदेश के विकास की आधारूत संरचना को नष्ट करने में ही अपनी बहादुरी समझ रहा है। इस संरचना के नष्ट होने से अंततः नुकसान सर्वहारा वर्ग का ही होगा। जाहिर है कि यह नक्सलवादी आंदोलन सर्वहारा वर्ग के हितों की उतनी चिंता नहीं कर रहा है जितनी चिंता उन्हें उन विदेशी शक्तियों के हितों की हैजो ारत को ीतर से तोड़ना चाहती हैं।  नक्सलवादियों ने जो कार्य बस्तर क्षेत्र में विद्युत और अन्य संस्थानों से जुड़ी आधारूत संरचनाओं को नष्ट करके किया है वह हमारे इस विश्लेषण का सबसे बड़ा प्रमाण है। प्रदेश के पिछड़े और वनवासी क्षेत्रों में थोड़ी बहुत उपलब्ध सुविधाओं को नष्ट करने का नुकसान पूंजीपती वर्ग को हो रहा है या सर्वहारा वर्ग को, यह चिंतन का विषय है। नक्सलवादी ी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि अंततः उनकी इन गतिविधियों का शिकार सर्वहारा वर्ग ही होता है। परंतु उनके लंबे एजेंडा में सर्वहारा वर्ग की चिंता नहीं है। बल्कि ारतीय स्टेट को नष्ट करने की है क्योंकि उन्हें इस कार्य के लिए सहायता ारत विरोधी शक्तियों से ही मिल रही है।
नक्सलवादी दरअसल वर्ग संघर्ष के नाम पर सर्वहारा वर्ग को ही मार रहे हैं। स्वााविक है कि इसकी जनप्रतिक्रिया होती । छŸाीसगढ़ के वनाचलों और गांवों के रहने वाले लोगों ने माक्र्सवाद के नाम पर नक्सलवादियों के एक गिरोह द्वारा जन साधारण पर किए जा रहे अत्याचारों के विरोध में हथियार उठा लिए । इसे नक्सलवादियों के मुँह पर तमाचा ही कहना चाहिए कि माओ ने जन क्रांति के लिए जिन देसी हथियारों की वकालत की थी वे हथियार उन लोगों के पास है जो लोग नक्सलवादियों से लोहा ले रहे हैं और देसी हथियारों की वकालत करने वाले नक्सलवादियों के हाथों में विदेशी हथियार हैं । छŸाीसगढ़ में नक्सलवादियों का मुकाबला करने के लिए उठे इस जनविद्रोह को ‘सलवा जुडुम’ के नाम से जाना जाता है। जाहिर है जनता हथियार तब उठाती है जब सरकार जनसुरक्षा के अपने कर्Ÿाव्य को ूल जाती है या फिर उसमें असफल हो जाती है। छŸाीसगढ़ में लगग 10 जिले नक्सलवादियों की चपेट में है। कुछ जिले तो ऐसे है जहां दिन में सरकार का प्रशासन है और रात में नक्सवादियों का शासन है। कुछ स्थान ऐसे ी है,जहां दिन हो या रात सरकारी प्रशासन मृत प्रायः हो गया है। इस पूरी स्थिति के लिए सरकार के पास अपने कारण हो सकते हैं, तर्क हो सकते हैं और शायद बहाने ी हो सकते हैं। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि राज्य प्रशासन पिछले दशक से धीरे-धीरे अपने कर्Ÿाव्य को निाने में असफल होता जा रहा है। इतना तो सी मानते हैं कि राज्य का निर्माण ही जन सुरक्षा की ावना को लेकर हुआ था। यदि राज्य इसी जन की सुरक्षा में असफल होता है तो जन को अपनी सुरक्षा के लिए हथियार उठाने के सिवा क्या विकल्प है? सलवा जुडुम इसी मानसिकता से जुड़ा नक्सलवाद के खिलाफ जनांदोलन है। नक्सलवादियों और सलवा जुडुम के बीच यदि माक्र्सवादी शब्दावली में वर्ग की पहचान करना ही जरूरी हो तो कहा जा सकता हैकि सलवा जुडुम सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हैऔर नक्सलवादियों का वर्ग क्या है? यकीनन उन्हें पूंजीपति वर्ग तो नहीं कहा जा सकता । तब क्या वे बुर्जुआ वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं? शायद ऐसा ी नहीं कहा जा सकता। कानू सान्याल के शब्दों में ही कहना हो तो वे अराजक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैसे ज्योति बसु शायद उन्हें संशोधनवादी मानते हों। जाहिर है ज्योति बसु की नजरों में सीपीएम ही दास कैपिटल की पालकी वैज्ञानिक तौर-तरीके से ढो सकता है और ढो रहा है। यदि नक्सलवादी सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करते और वे जन संघर्ष और जनकल्याण से ी नहीं जुड़े हुए हैं तो आखिर उनके इस पूरे आंदोलन के पीछे निहित उद्देश्य क्या है? क्या सŸाा हथियाना या फिर व्यवस्था में परिवर्तन करना? शायद ये दोनों ही  उद्देश्य नक्सलवादियों के एजेंडे में नहीं है क्योंकि वे इतना तो जानते ही है कि ारत जैसे बड़े देश में इक्का-दुक्का स्थानों पर छिटपुट हिंसा के बल पर सŸाा नहीं हथियाई जा सकती। व्यवस्था परिवर्तन की बात तो बहुत दूर की है । माक्र्सवाद को अपने वैचारिक प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम मानने वाले नक्सलवादी माक्र्सवाद के उद्देश्यों और उसके तरीकों से दूर हटकर आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं?  वास्तव में सर्वहारा क्रांति के रास्ते पर नक्सलवाड़ी से निकला सान्याल और मजूमदार का यह आंदोलन अंततः टकता-टकता विदेशी हथियारों से लैस एक आतंकवादी समूह में परिणित हो गया है। हिंसा का प्रयोग उसके लिए अब साधना ी है और साध्य ी ।

इस मोड़ पर सलवा जुडुम की प्रासंगिकता और उपादेयता पर चर्चा करना अनिवार्य हो जाता है। सलवा जुडुम का विरोध नक्सलवादियों के साथ-साथ कांग्रेस ी कर रही है । पिछले दिनों राजनंद गांव में हुए लोकसा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने प्रत्याशी के चुनाव अियान में विधानसा में कांग्रेस के विधायक और विपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा को नहीं बुलाया। महेन्द्र कर्मा नक्सलवादियों के खिलाफ सलवा जुडुम को समर्थन दे रहे हैं। कांग्रेस के ही अजीत जोगी जो छŸाीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अरसा पहले उन्होंने ारतीय धर्म छोड़कर चर्च की शरण ग्रहण कर ली थी वे की प्रत्यक्ष तो की अप्रत्यक्ष नक्सलवादियों का समर्थन करते हैं। आंध्र प्रदेश में पिछले विधानसा चुनावों में कांग्रेस का मुख्य चुनावी मुद्दा नक्सलवादियों के खिलाफ पुलिस अियान को बंद करना था। ध्यान रहे आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सेम्युल राज शेखर रेड्डी ने ी ारतीय धर्म को त्याग कर चर्च की शरण ग्रहण कर ली थी। जैसे सबूत मिल रहे हैंऔर परिस्थितिजन्य प्रमाण जुट रहे हैं उससे लगता है कहीं न कहीं कांग्रेस और नक्सलवादी आपस में ीतर से जुड़े हुए हैं। पिछले कुछ अरसे से चर्च ने नक्सलवादियों और राज्य सरकारों के बीच अपने आप को मध्यस्थ की ूमिका में ी उपस्थित करना शुरू कर दिया हैऔर नक्सलवादियों का चर्च पर विश्वास गहरा होता जा रहा है। यह अजीब विरोधाास है कि कार्लमाक्र्स की ॰ष्टि में चर्च सर्वहारा वर्ग का सबसे बड़ा शत्रु था और आज ारत में उसी कार्लमाक्र्स का नाम लेने वाले नक्सलवादी समूह चर्च पर ही सबसे ज्यादा विश्वास कर रहे हैं।
आज नक्सलवादियों की संपूर्ण शक्ति छŸाीसगढ़ में क्यों केन्द्रित हो रही है? इसका मुख्य कारण यह है कि छŸाीसगढ़ से ही जनांदोलन सलवा जुडुम का प्रारं हुआ है । सलमा जुडुम नक्सलवाद के थीसिस के ीतर का एंटी थीसिस है जो माक्र्स के अपने विश्लेषण के अनुसार ही देर सबेर अपने थीसिस याने नक्सलवाद को नष्ट करेगा। इसलिए नक्सलवादी शक्तियाँ अपनी तमाम शक्ति छŸाीसगढ़ में सलवा जुडुम के खिलाफ केन्द्रित कर रही हैं। द्वितीय सलवा जुडुम आंदोलन क्योंकि अपने मूल प्रारूप में सर्वहारा का आंदोलन है इसलिए यह नक्सलवाद के ीतर के अंर्तविरोधों को नंगा करता है । नक्सलवादी इस सत्य का सामना न कर पाने के कारण किसी ी हालत में सलवा जुडुम को नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं। सलवा जुडुम को लेकर केन्द्रीय सरकार के गृह राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल ने एक प्रश्न उठाया है जिसकी यहां चर्चा कर लेना अत्यंत संगत होगा। प्रकाश जायसवाल कहते हैं कि यदि छŸाीसगढ़ की सरकार सलवा जुडुम के कार्यकर्ताओं की प्राण रक्षा नहीं कर सकती तो उसे सलवा जुडुम आंदोलन के पीछे से अपना हाथ खींच लेना चाहिए। प्रकाश जायसवाल के इस वक्तव्य का क्या निहितार्थ है? नक्सलवादियों से प्रदेश का सर्वहारा वर्ग लड़ रहा है। ऐसी स्थिति में सरकार का क्या कर्Ÿाव्य बनता है ? उसके सामने तीन विकल्प हो सकते हैं । पहला विकल्प है कि वह नक्सलवादियों की मदद करें। दूसरा विकल्प है कि वह सर्वहारा वर्ग सलवा जुडुम की मदद करें। तीसरा विकल्प है कि वह इन दोनों वर्गों के झगड़े मे तटस्थ रहे। प्रकाश जायसवाल राज्य सरकार को सलवा जुडुम का समर्थन करने से मना करते हैं तो इसका अर्थ है कि सरकार के पास बाकी के दो विकल्प बचते हैं। क्या प्रकाश जायसवाल छŸाीसगढ़ सरकार को इन दोनों विकल्पों में से किसी एक विकल्प को चुनने की सलाह दे रहे हैं? प्रकाश जायसवाल की यह सलाह बड़ी खतरनाक है । यह नक्सलवाद को लेकर कांग्रेस के ीतर की सोच और रणनीति को स्प्ष्ट करती है और निश्चय ही यह रणनीति देश के लिए ी घातक है और इस देश के सर्वहारा वर्ग के लिए ी। इसका ला देश के पूंजीपति वर्ग को ही मिल सकता है।
छŸाीसगढ़ में नक्सलवादियों द्वारा अपनी समस्त शक्ति छोंक देने के पीछे एक और कारण ी है। ारतीय जनता पार्टी का नक्सलवाद से वैचारिक विरोध है। ारतीय जनता पार्टी देश के ीतर की राष्ट्रीय शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैऔर उसका वैचारिक आधार दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद में है। वह एक ओर नक्सलवादी समस्या को कानून व्यवस्था की समस्या मानती है और दूसरी ओर इसे एक वैचारिक युद्ध ी स्वीकारती है । कांग्रेस के लिए ऐसा कोई वैचारिक संकट नहीं है। क्योंकि सर ह्यूम रोज के वक्त से चली कांग्रेस अपने जन्मकाल में ी वैचारिक धरातल से शून्य थी और अब अपने जीवन की चैथ में ी वैचारिक धरातल से शून्य है। कांग्रेस की स्थापना करने वाले अंग्रेज सर ह्यूम रोज एक प्रशासक थे, चिंतक नहीं। उन्होंने कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजों की प्रशासकीय सुविधा के लिए की थी वैचारिक युद्ध लड़ने के लिए नहीं। बीच में गांधी नेहरू के कालखंड में कांग्रेस का वैचारिक आधार पनपा था लेकिन पिछले दो दशकों से कांग्रेस पर उसी यूरोपीय विरासत की सोनिया गांधी का कब्जा हो गया है जिसके बारे में ज्योति बसु ने की कहा था कि वे मात्र एक गृहिणी है, राजनीतिज्ञ नहीं। नक्सलवादियों से बेहतर सोनिया गांधी के इस रहस्य को कौन जानता है? इसलिए वे ी ाजपा के खिलाफ कांग्रेस से हाथ मिलाने के लिए तत्पर है और कहीं-कहीं मिला ी रहे हैं। छŸाीसगढ़ और आंध्र प्रदेश इसका ज्वलंत उदाहरण है। 1968 में नक्सलवाड़ी से चले नक्सलवादी आंदोलन को 2005 में छŸाीसगढ़ में सलवा जुडुम के रूप में सर्वहारा वर्ग ने पहली बार वैचारिक चुनौती दी है । आज तक सरकारें नक्सलवाद का सामना कानून व्यवस्था की बेहतर रणनीति से करती रही हैं लेकिन पहली बार नक्सलवाद को सलवा जुडुम की वैचारिक चुनौती मिली है। सबसे बड़ी बात यह कि चुनौती उसे सर्वहारा वर्ग ने ही दी है। इस पूरी लड़ाई में नक्सलवाद सर्वहारा वर्ग के खिलाफ खड़ा नजर आ रहा है। नक्सलवाद की इससे बड़ी पराजय और क्या हो सकती है। लेकिन यह लड़ाई लंबी चलेगी क्योंकि इस लड़ाई में तर्क और गोली दोनों एक साथ इस्तेमाल हो रहे हैं। लेकिन इस लड़ाई का एक ला ही है कि पर्दे के पीछे छिपे प्रकाश जायसवाल, अजीत जोगी, सेम्युलर राज शेखर रेड्डी, सोनिया गांधी, सीताराम जयचुरी, वृंदा करात और न जाने और कितने लोग दिन के उजाले में नंगे हो रहे हैं।



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