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Tuesday, 14 January 2014

कैकेयी की शिनाख्त की नरेन्द्र मोदी ने तो मची आपाधापी:न

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
गुजरात को लेकर पत्रकारिता जगत दुविधा में है। वह दो खेमों में बंटा हुआ है। एक खेमा वह है जिसकी धारा गुजरात की जनता के बीच में से होकर गुजरती है। इस कारण से उसके सुख-दुःख से आप्लावित होती है। यह धारा उन तमाम गुण दोषों को अपने साथ लेकर चलती हैजो गुण दोष गुजरात की जनता में पाए जाते है। साधारणीकरण किया जाए तो गुजरात की जनता से ारत की जनता ही अिप्रेत है। इस खेमे में पत्रकार और पत्रकारिता का वह समूह है जो अपनी ाषा में लिखता ी हैऔर अपनी ाषा में सोचता ी है।
पत्रकारों का दूसरा खेमा वह है जो ारतीय जनता के सुख-दुःख के बीच से होकर नहीं गुजरता। इसलिए इसकी अिव्यक्ति में सामान्य जनता का हर्ष-शोक, सुख-दुःख, उल्लास-निराशा ऐसा कुछ ी नहीं है। लेकिन वह चाहता कि ारतीय जन उसकी अवधारणाओं के अनुसार ही आचरण करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो इनकी दृष्टि में वह सबसे बड़ा अपराधी है। यह खेमा अपने बनाए हुए या किसी के सिखाए हुए या फिर लम्बे प्रशिक्षण से प्राप्त चिन्तन के स्वनिर्मित धरातल पर दृढ़ता से अवस्थित है। इस खेमे की कुछ अपनी निश्चित अवधारणाएं हैं, दिशाएं हैं और दृष्टि है। यह खेमा ारतीयता का ोक्ता नहीं हैंबल्कि दूर बैठा द्रष्टा है जो केवल देखता हैऔर वह ी तटस्थ ाव से । ारतीय जनता का आचरण और व्यवहार उसके लिए दोनों ही हेय हैं। इस जनता के लिए यह समूह आमतौर पर अनपढ़ ारतीय जनता, पिछड़ी हुई ारतीय जनता, अन्धविश्वासों से घिरी हुई ारतीय जनता, और कहीं ऐसे समूह को बहुत क्रोध आ गया। तो मूर्ख ारतीय जनता जैसे शब्दों का प्रयोग ी करता है। यदि इस खेमे के लिए किसी को प्रतीक के रूप में चुनना होतो नीरद चैधुरी से अच्छा प्रतीक और कोई नहीं मिलेगा। इनकी दृष्टि में ारत लोकतंत्र के काबिल है ही नहीं । लेकिन इनका दुर्ाग्य है कि इन बेचारों को लोकतंत्र झेलना पड़ रहा है। जिस प्रकार की माॅल, माॅडल टाउन और वाईट क्लब में बैठे फिरंगियों को फटे हाल ारतीय जनता को झेलना पड़ता था। लोकतंत्र का तो ये लोग कुछ बिगाड़ नहीं सकते लेकिन नरेन्द्र मोदी को तो घेर ही सकते हैं। क्योंकि नरेन्द्र मोदी इसी लोक की शक्ति से उपजा है। यदि किसी ढंग से नरेन्द्र मोदी को घेर लिया जाए तो कालांतर में लोक को मारना ी आसान हो जाएगा। ेजरा कल्पना कीजिए जब दिल्ली से ये पत्रकार वाशिंगटन पोस्ट या न्यूयार्क टाइम्स को ये खबर ेजेंगेतो वहां किस प्रकार खुशी का आलम छा जाएगा।
लेकिन इतनी बड़ी लड़ाई बोरी बंदर की बुढिया या फिर अंग्रेजी की पुडि़या अकेले थोड़े ही लड़ सकती है। गोरों का धर्म हैकि वे रणूमि में अपने सिपाहियों को अकेला नहीं छोड़ते। हर संकट में उनका साथ देते है। जब तक निता रहे तब तक पर्दे के पीछे से और जब संकट गहरा हो जाएतो टाट का पर्दा ी उठा देते है। न्यूयार्क टाइम्स के देश ने ऐसा ही किया है। अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी को वीजा देने से इन्कार कर दिया था। चाहे यह घटना पुरानी हो गई है परन्तु इसके पीछे के कारण पुराने नहीं हुए है। वे अी ी उतने प्रासंगिक हैं और शायद आने वाले समय में और ी अधिक प्रासंगिक हो जाएंगे। अमेरिका का कहना है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात में उस ढंग से राज्य नहीं कर रहे जिस ढंग से अमेरिका चाहता है। आखिर अमेरिका बड़ा देश है। वह बाकी देशों को इतना बताने का अधिकार तो रखता ही है कि उन्हें किस प्रकार से राज्य चलाना चाहिए। अमेरिका ारत के राज्यों में बने कानूनों का पुनरीक्षण करने का अधिकार ले रहा है। नरेन्द्र मोदी को वीजा न देने में एक कारण गुजरात विधानसा में पारित कुछ अधिनियमों को हवाला ी दिया गया थाऔर शायद गुजरात की पाठ्य पुस्तकों में शामिल कुछ अध्यायों पर आपŸिा ी की गई थी। आखिर अमेरिका को ारत के कानूनों के पुनरीक्षण का अधिकार किसने दिया? ारतीयों को लग रहा था कि ारत सरकार एक मत से अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दे देगी कि अमेरिका ारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे। लेकिन लोग स्तब्ध रह गए जब कांग्रेस, साम्यवादी और पत्रकार जगत की बोरी बंदर वाली लाॅबी हिजड़ों की तरह हाथ हिला-हिला कर प्रसन्नता जाहिर करने लगी - अब पता चलेगा नरेन्द्र मोदी को । अब उसका वास्ता पड़ा हैअमेरिका से । महमूद गजनबी की सेनाएं जब गुजरात में सोमनाथ मंदिर की ओर बढ़ रहीं थीं तो रास्ते के छोटे-छोटे राजा ी हिजड़ों की तरह ही तालियां बजा रहे थे- अब पता चलेगा सोमनाथ नरेश ीमपाल को ।
यदि अमेरिका केवल बंदर घुड़की ही दे रहा होता तो शायद लोग उसकी अवहेलना ी कर देते। लेकिन उसकी घुड़की के पीछे तो बम बरसाते जहाज हैं और बुश के हाथ का इंतजार कर रहे बटन हैं। अब बहुत लोगों को यह रहस्य समझ में आ रहा है कि बुश अिवादन करते हुए हाथ क्यों हिलाते हैं। जानकारों का कहना है कि हाथ दिखाते हैं। ईराक धोखा खा गया। अमेरिका ने उसे बताया कि राज्य किस प्रकार करना चाहिए। सद्दाम हुसैन नहीं माना । ईराक का जो हश्र अमेरिका ने किया है उससे अनेक देश हिलने लगे हैं। अलबŸाा यह निर्णय प्रत्येक देश को स्वयं ही करना है कि ऐसे संकट काल में उसे हिलना है या स्थिर खड़े रहना है। चीन स्थिर खड़ा है। लेकिन दुर्ाग्य से ारत हिलने लगा है। विश्वास नहीं होता कि इतना पुराना राष्ट्र जिसका इतना गौरवशाली इतिहास है, वह ेइस प्रकार हिलना शुरू कर देगा। ेअमेरिका ी यह जानता होगा इसलिए उसने इसका बंदोबस्त ी समय रहते ही कर लिया था। उसने पहले ही ऐसे समय की कल्पना करके ारत की बागडोर सोनिया गांधी के हाथों में थमा दी थी। अब यह ारत चंद्रगुप्त और चाणक्य का ारत नहीं है। विजय नगर साम्राज्य के संस्थापकों का ारत नहीं है। शिवाजी और महाराणा प्रताप का राज्य नहीं है। लचित बडफूकन और गुरू गोबिन्द सिंह का ारत नहीं है। सरदार पटेल और लाल बहादुर शाóी का ारत ी नहीं है। यह ारत सोनिया गांधी का ारत है। इसे सोनिया गांधी का ारत बनाया ही इसलिए गया है ताकि ठीक समय पर यह हिलना शुरू कर दे। सचमुच ारत हिल रहा है। अमेरिका की छाया में हिल रहा है। जब गुरू गोबिन्द सिंह और लाल बहादुर शाóी का ारत पाकिस्तान के आतंकवाद से रोज लहू-लुहान हो रहा हैऔर जी जान से उसका मुकाबला कर रहा ेहै तो सोनिया गांधी का इंडिया पाकिस्तान के परवेज मुशर्रफ के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का पाखंड ेकर रहा है। अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है, इंग्लैण्ड को ी पाकिस्तान की जरूरत है, चीन को ी पाकिस्तान की जरूरत है। इसलिए ये देश पाकिस्तान को गोद में लिए घूमेंगे। रही बात आतंकवाद की । अमेरिका ने मुशर्रफ को स्पष्ट बता दिया है कि इधर अमेरिका की ओर आतंकवादी क्यों ेजते हो? साहब की नींद में खलल पड़ता है। उधर पड़ोस में हिन्दुस्तान है न, उसमें खेलो। परवेज मुशर्रफ आदमी समझदार है। वह जानता है कि गोरों ने पाकिस्तान बनाया ही इसलिए था ताकि वह ारत के आंगन में खेल-खेलकर बम फोड़ता रहे। इसलिए उसने अंक्ल सैम के सामने कान पकड़े और फिर अपने पुराने ेखेल में मशगूल हो गया । अंक्ल सैम का दिल बहुत बड़ा है। एक बार गलती मान ली तो उन्होंने फिर गोदी में उठा लिया। उधर वह बेवकूफ सद्दाम हुसैन। अंक्ल सैम को ही आँखे दिखाने लगा । अब कम्बख्त जेल में सड़ रहा है।
साहब के बच्चे को सब प्यार करते हैं। पाकिस्तान गोरे साहिबों का बच्चा है । गोरी नस्ल के तौर तरीकों को सोनिया गांधी से ज्यादा कौन जान सकता है। इसलिए सोनिया गांधी का ारत और अंक्ल सैम की गोद में खेल रहे परवेज मुशर्रफ का पाकिस्तान मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ेंगे। लगता है अमेरिका की रणनीति ठीक उसी प्रकार चल रही है जैसे उसने बहुत साल पहले बनाई होगी। लेकिन बीच में नरेन्द्र मोदी आ गया। जब सोनिया गांधी का ारत अमेरिका के एक इशारे पर हिलता है तो नरेन्द्र मोदी सोमनाथ के आगे अटल खड़ा रहता है । अपने लोकसा वाले सोमनाथ दा नहीं बल्कि गुजरात ही नहीं, सारे ारत खंड के श्रद्धा केन्द्र सोमनाथ । वही ोले शिव बाबा । नरेन्द्र मोदी हिलता नहीं है । यह अमेरिका की समस्या ी है, इटली की सोनिया गांधी की समस्या ी हैऔर बोरी बंदर की बुढिया की समस्या ी है । नरेन्द्र मोदी आतंकवाद से सचमुच लड़ रहा है और सोनिया गांधी की योजना आतंकवाद से पाकिस्तान से मिलकर लड़ने की है। नरेन्द्र मोदी ने चोर को पहचान लिया हैऔर वह री दोपहरी में चिल्लाता हुआ सड़कों पर उतर आया है। चोर की शिनाख्त हो जाने के बाद सोनिया गांधी की सरकार उस चोर को छिपाना ी चाहती है और बचाना ी। मुम्बई के बम धमाकों में पुलिस को पाकिस्तान के शामिल होने के प्रमाण मिल रहे हैं। लेकिन अपने प्रधानमंत्री पाकिस्तान के साथ मिलकर संयुक्त रूप से आतंकवादी गतिविधियों की जांच के समझौते कर रहे है। हो सकता हैकल सोनिया गांधी की सरकार आई.एस.आई. को ही मुम्बई के बम धमाकों की जांच के लिए बुला ले। आखिर अमेरिका ने आदेश जो दिया हैकि तुम ारत और पाकिस्तान मिलजुलकर आतंकवादियों की जांच पड़ताल करो। नरेन्द्र मोदी की यही समस्या है। वे आतंकवादियों को पकड़ने के लिए आई.एस.आई. की सहायता लेने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए इस लड़ाई में जैसा कि हमने पहले ऊपर जिक्र किया है पत्रकारों के ी दो खेमे बन गए हैं। एक ऐसा खेमा जो पहले ही न्यूयार्क या मास्को की गर्मी सर्दी से नजले जुकाम का शिकार होता थाऔर दूसरा खेमा जो ारत की मिट्टी से ही मटमैला रहता है। मटमैले लोग नरेन्द्र मोदी के साथ हैं और गोरे लोग अमेरीका और सोनिया गांधी के साथ हैं । याद रखें अमेरिका पाकिस्तान के साथ है। गोरी नसलों ने ारत का जो हश्र किया है अी उसको बीते बहुत ज्यादा अरसा नहीं हुआ है। नरेन्द्र मोदी इस नई लड़ाई में व्यक्ति नहीं प्रतीक बनकर उरे हैं। दशरथ के वनगमन का प्रसंग पुनः उर रहा है। लोग कैकेयी की ेतलाश कर रहे हैं। लो इधर हल्ला मचा कि कैकेयी की शिनाख्त हो गई है। डर के मारे दलालों की एक पूरी फौज नरेन्द्र मोदी को घेरने में जुट गई है क्योंकि पक्की खबर है कि यह शिनाख्त नरेन्द्र मोदी ने ही की है। ारत की जनता पकड़ो-पकड़ो का शोर मचा रही है। चारों ओर आपाधापी मची हुई है।

(हिन्दुस्थान समाचार)

क्या कांग्रेस पंजाब मंे फिर आतंकवाद को जिंदा करना चाहती है?:

 डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
पंजाब मंे अब सी लोग प्रायः इस बात को लेकर एक मत हैं कि जरनैल सिंह िन्डरावाले को कांग्रेस ने अकालियों को सबक सिखाने के लिए पैदा किया था और फिर पाला पोसा था। कांग्रेस की इस पहल से अकालियों ने कोई सबक सीखा या नहीं यह तो अकाली ही जानते होंगे लेकिन पंजाब ने बहुत गहरे घाव खाए और बहुत नुकसान झेला।

कांग्रेस के इस स्मासुरी यज्ञ ने हजारों लोगों की बली ले ली और अंततः इंदिरा गांधी की हत्या ी इसी शृंखला में हो गई। जैसा कि ऊपर कहा गया है इस घटनाक्रम से अकालियों ने कोई शब्द सीखा है या नहीं यह अकाली जानते होंगे लेकिन एक बात अवश्व स्पष्ट हो रही है कि कम से कम कांग्रेस ने इससे कोई सबक नहीं सीखा।

पंजाब में ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आ रहे हैं त्यों-त्यों कांग्रेस फिर उन्हीं पुराने हथकंडों पर उतर रही है जिनके कारण की वारिसशाह के पंजाब की धरती लहु लुहान हो गई थी। कांग्रेस को शायद इस बात का गम है कि किसी को तनखाइया घोषित कर देने वाली शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अकाली दल के कब्जे में है। इस कमेटी का बाकायदा चुनाव होता है और दुर्ाग्य से पंजाब के लोगों ने की इसके लिए कांग्रेस को नहीं चुना। अलबŸाा कांग्रेस चाहे अपने नाम से नहीं परंतु अन्य नामों से इन चुनावों में सक्रिय रुचि लेती रहती है। लोकतंत्र का तकाजा तो यह है कि कांग्रेस अपना पक्ष लेकर पंजाब के लोगों के बीच में जाए और यदि पंजाब के लोग उसके तर्कों से सहमत हो जाएंगे तो उनके लोग ी शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य बन सकते हैं। परंतु यह रास्ता बहुत लंबा है और कष्टकारी ी। ऊपर से कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी इटली की रहने वाली हैं इसलिए शायद उन्हें पंजाबी परंपराओं और तौर-तरीकों का ज्ञान ी न हो। इसलिए कांग्रेस ने शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का मुकाबला करने के लिए एक आसाना लेकिन बहुत ही खतरनाक रास्ता अपना लिया है। उसने किसी को तनखाइया घोषित करने का कार्य पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला से करवाना शुरू कर दिया है।

पंजाब के लोग शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को कांग्रेस के कब्जे में नहीं देते लेकिन पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला तो कांग्रेस के कब्जे में है ही। पंजाब मंे कांग्रेस की सरकार है और उसमें अमरिन्दर सिंह सरदार है। अमरिन्दर सिंह ने पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के कुलपति के तौर पर श्री स्वर्ण सिंह बोपाराई को नियुक्त किया हुआ है। पिछले दिनों पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के संगीत विाग द्वारा एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था इसमंे ाग लेने के लिए गुरुमत संगीत के अनेक विद्वानों को निमंत्रित किया गया था। श्री अवतार सिंह मक्कड़ ी इसमें आमंत्रित थे लेकिन किन्हीं कारणों से वे इसमें ाग नहीं ले पाए। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला ने मक्कर को तनखाइया घोषित कर दिया और उसके लिए तनख्वाह ी नियत कर दी। कुलपति बोपाराई सरकार के कहने पर हो सकता है कुछ ी करने को तैयार हों लेकिन कांग्रेस को तो कम से कम विश्वविद्यालयों को इस प्रकार के कामांे के लिए प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। मक्कड़ शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हैं। कांग्रेस पंजाबी विश्वविद्यालय के माध्यम से पंजाब की स्थिति में एक बार फिर आग लगाना चाहती है। यह घटना उसका आगाज मात्र है।

दूसरी घटना और ी गहरा संकेत देती है। बाबा बुड्ढा स्वर्ण मंदिर के पहले ग्रंथी थे। उनकी 500वीं जयंती मनाने के लिए कत्थू नंगल में अकाली दल की ओर से एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा था जिसमें श्री प्रकाश सिंह बादल और श्री ओमप्रकाश चैटाला ाग ले रहे थे। आयोजकों ने जिला प्रशासन को बाकायदा लिखकर दिया था कि कुछ तत्व इस आयोजन में उत्पात मचा सकते हैं। आयोजकों की आशंका के अनुसार ही श्री सिमरणजीत सिंह मान अपने साथियों समेत आयोजन में आ गए और जिसकी आशंका थी वही हुआ। दोनों गुटों में फसाद हो गया। पंजाब सरकार की पुलिस ने मात्र इतना किया कि उसने सिमरणजीत सिंह मान और उनके साथियों को आयोजन स्थल पर आने से नहीं रोका अलबŸाा यह ध्यान जरूर रखा कि मान के इस कार्यक्रम में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो। यह ध्यान रहे कि श्री मान ी श्री जगजीत सिंह की ही तरह पिछले कुछ सालों से अकेले ही खालिस्तान की स्थापना के लिए अपने बलबूते पर जुटे हुए हैं।

पंजाब कांग्रेस अपने बलबूते शायद अकाली-ाजपा गठबंधन से लड़ने की स्थिति में अनुव नहीं कर रही हैऔर न ही इसके लिए जनता में जाकर प्रयास करना चाहती है। इसलिए उसने अकालियों से लड़ने का सबसे आसान रास्ता खोज लिया है। वह उन तत्वों को अकालियों से िड़ाना चाहती है जो खालिस्तान का नारा ी लगाते हैंऔर विदेशी शक्तियों के इशारे पर पंजाब में अराजकता ी फैलाना चाहते हैं। इसलिए पिछले कुछ महीनों से ऐसे तत्व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की बैठकों में ी और अकाली दल की साओं में ी हल्ला मचा रहे हैं। इससे पंजाब के वातावरण में उŸोजना फैल रही हैऔर शायद कांग्रेस ऐसा मान रही है कि यदि अकाली और उग्रवादी तत्व आपस में िड़ते हैं तो पंजाब के लोग पुराने समय के लौट आने की आशंका से कांग्रेस को फिर झुका देंगे। पंजाब में ऐसी सोच आग से खेलने के समान है और कांग्रेस इसी आग से खेल रही है। किसी ी सविधानिक सरकार का यह कर्Ÿाव्य होता है कि वह उग्रवादी और अलगाववादी तत्वों पर नकेल कसे और कानून के अनुसार उन्हें दंडित करें। परंतु कांग्रेस सरकार ऐसा करने के बजाय उनके राजनैतिक उपयोग  से अकाली-ाजपा को परास्त करने का आसान रास्ता तलाश कर रही है।

पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अमरेन्दर सिंह मान के निकट संबंधी हैं इसलिए मान के किसी अियान में किसी प्रकार की कोई बाधा उपस्थित न हो इसका बाकायदा ध्यान रखते हैं। की कोई पत्रकार इस विषय मंे कोई कड़ा प्रश्न पूछ ही लेता है तो यह कहते हैं कि मैं मान को सुधारने का प्रयास कर रहा हूं। दोनों में से कौन किसको सुधार रहा है यह तो अल्ला जाने लेकिन शायद मान की संगत का ही प्राव था कि अमरेन्दर सिंह विदेश में जाकर खालिस्तान जिंदाबाद लिखे बैनर के नीचे खड़े होकर लंबा ाषण कर आए थे। जब बबाल मचा तो मुख्यमंत्री ने यह कहकर बचना चाहा कि मैंने वह बैनर देखा ही नहीं था। लेकिन जब मुख्यमंत्री के सचिव ने यह कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री को बैनर के बारे में बता दिया था तो मुख्यमंत्री शायद उŸार देने के लिए सिमरणजीत सिंह मान से ही सलाह करने गए होंगे। कांग्रेस की छात्रछाया मंे इन दोनों रिश्तेदारों का सलाह मशविरा पंजाब को बहुत ारी पड़ सकता है। लेकिन दिल्ली में है कोई सुनने वाला? शायद नहीं। क्योंकि कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी पंजाबी नहीं समझती अलबŸाा इतालवी बखूबी जानती हैं। लेकिन पंजाब के लोगों का दुर्ाग्य है कि उन्हें इतालवी नहीं आती। इसलिए वे सोनिया गांधी को इन दोनों रिश्तेदारों के बारे में कैसे बताएं। या फिर यह ी हो सकता है कि यह पूरी तैयारी कांग्रेस के उस लंबे षडयंत्र का ही हिस्सा हो जिसमें एक बार पंजाबियों ने मात दे दी है। पंजाब के ही लोगों को कांग्रेस के इस षडयंत्र को दूसरी बार ी मात देनी होगी। इसी मंे पजाब का ी ला है और देश का ी। 


(हिन्दुस्थान समाचार)

सोहराबुद्दीन से हसीना पारकर तक-मुठेड़ की प्रक्रिया का प्रश्न


-डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

दाऊद अब्राहम की बहन हसीना पारकर की मुंबई पुलिस को तलाश है। कहा जाता है कि दाऊद अब्राहम के सारे कारोबार का मुंबई से संचालन हसीना ही करती है। दाऊद अब्राहम और हसीना पारकर कोई च्यूंटी ुनगा नहीं है कि किसी को दिखाई न दे। न ही उनका कारोबार इस प्रकार का कारोबार हैजो पुलिस की पकड़ में नहीं आ रहा है। ाई-बहन का काम और तरीका पुलिस ी जानती है, मुख्यमंत्री ी जानते हैं और सीताराम येचुरी ी जानते होंगे। ये तीनों तो दाऊद अब्राहम और हसीना पारकर को अनदेखा ी कर सकते हैं, लेकिन मुंबई की जनता उन्हें अनदेखा नहीं कर सकती । क्योंकि मुंबई निवासियों को और दाऊद अब्राहम-हसीना पारकर को एक साथ ही मुंबई में रहना है। बुद्धिजीवी किस्म के लोग प्रश्न पूछ सकते हैं और पूछ ी रहे है कि दाऊद अब्राहम तो लंबे अरसे से मुंबई से बाहर पाकिस्तान में रहते हैं। लेकिन मुंबई की जनता का काम बुद्धिजीवियों के सवालों से नहीं चलता। वे जानते हैं कि दाऊद अब्राहम पाकिस्तान में होते हुई ी मुंबई में है और हसीना पारकर मुंबई में होते हुए ी पाकिस्तान में है। मुंबई बम धमाकों को लगग पन्द्रह साल बीत गए। मुकदमे का फैसला अब आना शुरू हुआ है। हजारों गवाहियाँ हुईं। ट्रक रकर दस्तावेज पेश किए गए । वकीलों ने अपने मुवक्किलों को बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। लेकिन यह सारी प्रक्रिया चलते रहने के साथ-साथ ाई-बहन ने मुंबई का अपना धंधा बंद नहीं किया। उनका आतंक उसी प्रकार बरकरार रहा। हफ्ता वसूली, सुपारी का लेनदेन उसी प्रकार चलता रहा। पुलिस खुद स्वीकार करती हैकि दाऊद अब्राहम की ओर से मुंबई में ये सारे धंधे हसीना पारकर करती है। लेकिन कांग्रेस सरकार का आतंकवाद से लड़ने का अपना एक तरीका है। वह बीच में की कार एक आध आतंकवादी को पकड़ कर कचहरी में ले जाती हैऔर वहां से जमानत पर आने के बाद दादा किस्म के ये लोग अपना धंधा उसी प्रकार चालू कर देते हैं। आतंकवादियों और सरकार के बीच परस्पर सहयोग का यह मूल मंत्र है। यह तब तक चलता रहता है जब तक दोनों पक्ष अपने कौल करार को पक्की तरह निाते हैं। लेकिन जब एक पक्ष अपने कौल को नहीं निाता तो मामला जग जाहिर हो जाता है।
हसीना पारकर को लेकर यही हुआ है। वह इतने लंबे अरसे से सरेआम अपना धंधा चला रही थी। जब पुलिस को उसकी जरूरत पड़ी तो वह गायब हो गई है। महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार के गृह मंत्री का कहना हैकि हसीना पारकर कहाँ है, उनको नहीं मालूम । यह आतंकवाद से लड़ने का एक तरीका है। इस तरीके से मुंबई में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन इसे खुदा का फजल ही कहना चाहिएकि आतंकवादी कोई नहीं मारा गया। आतंकवादियों के न मारे जाने के पीछे कांग्रेसी सरकार का अपना तर्क है। यह तर्क सीताराम येचुरी और वृंदा करात के तर्क का ही हिस्सा है। इस तर्क के अनुसार आतंकवादियों के ी मानवाधिकार हैं, उनकी रक्षा होना लाजिमी है और सरकार इस सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धित है । इसके साथ ही किसी को पकड़ने या मारने की एक पूरी कानूनी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले आतंकवादी गोलियां और बम चलाता हैऔर उसके कारण कुछ लोगों का मरना जरूरी है और इस पूरे कांड को देखने के लिए कुछ गवाहों का होना ी जरूरी है, जो यह कहे कि उसने आतंकवादी ाई को गोलियां चलाते और लोगों को मारते हुए खुद अपनी आँखों से देखा है। सरकार का यह कहना हैकि इस प्रक्रिया के बाद ही किसी आतंकवादी को पकड़ा जा सकता हैऔर पकड़ने के बाद अदालत को सौंप दिया जाएगाऔर अदालत उसको सजा देगी। सजा देने के लिए अदालत के पास इससे ी लंबी एक प्रक्रिया हैऔर इन सब का नतीजा यह होता है कि हसीना पारकर और दाऊद अब्राहम दोनों ही खुले घूमते हैं। मरना केवल आम नागरिक के ाग्य में लिखा है।
दूसरा किस्सा एक अन्य आतंकवादी सोहराबुद्दीन का है। सोहराबुद्दीन पर अनेक राज्यों में अनेक प्रकार के मुकùें चल रहे हैं । यह मुकùे कोई आज के नहीं है। वर्षों से ये मुकùे अपने स्वाव के अनुसार सरक रहे हैं। मुकदमों की गति धीमी है लेकिन सोहराबुद्दीन के कामकाज की गति तेज है। उसका जाल अनेक राज्यों में फैलता जा रहा है। वह हसीना पारकर की ही तरह लोगों से हफ्ता वसूली करता है और अवज्ञा करने वालों को अपने तरीके से दंडित ी करता है। सोहराबुद्दीन जेल में नहीं रहता। वह स्वतंत्र घूमता हैऔर अपना काम ी स्वतंत्रतापूर्वक ही करता है। ऐसा ी कहते हैं कि वह जरूरतमंदों को हथियारों की सप्लाई ी करता था। इस देश में हथियारों की जरूरत किसे है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। गुजरात पुलिस ने सोहराबुद्दीन को एक मुठेड़ में मार दिया है। आजकल उसी की जांच चल रही है। जांच करने वालों का कहना है कि मुठेड़ की ी अपनी एक प्रक्रिया है और उस प्रक्रिया के अनुसार ही मुठेड़ हो सकती है। उससे एक इंच ी दाएं-बाएं हो जाने से पूरी की पूरी मुठेड़ ही ेगैरकानूनी हो जाती है। अंग्रेजी में कानूनदानों ने इसके लिए एक नया शब्द दिया है एक्स्ट्रा जयुडिशियल किलिंग । उनका कहना है कि सोहराबुद्दीन को जिस मुठेड़ में मार गिराया गया है, वह मुठेड़ गैर कानूनी शक्ल ले चुकी है। इसे इस देश का दुर्ाग्य कहना चाहिए कि आतंकवादियों से लड़ रही पुलिस और सेना लड़ना तो बखूबी जानती है, लेकिन मुठेड़ की प्रक्रिया को नहीं जानती। वैसे ी आतंकवादी के हाथ में बंदूक और बम होता है। आईपीसी और सीआरपीसी की प्रतियाँ नहीं । इसलिए पुलिस और सेना के लिए गोली और बम की प्रक्रिया को जानना ज्यादा जरूरी होता है और पुलिस के इसी ज्ञान से सोहराबुद्दीन जैसे आतंकवादी मारे जाते हैं। सोहराबुद्दीन और इशरतजहां जैसी आतंकवादी मारे जाते हैं। लेकिन आखिर कानून तो कानून हैऔर यह इसी कानून की करामात है कि सोहराबुद्दीन को मारने वाली पुलिस जेल में है और हसीना पारकर जेल से बाहर हैऔर निकट विष्य में उसके जेल में जाने की कोई संावना नहीं है। दाऊद अब्राहम तो शाही मेहमान है। शाही मेहमानों के लिए दस्तरखान बिछाएं जाते हैं। तिहाड़ जेल तो सेना और पुलिस के उन अधिकारियों के लिए है जो आतंकवादियों से लड़ रहे हैं । वैसे ी अपने मनमोहन सिंह कश्मीर के अलागवादियों को दिल्ली में बुलाकर उनकी खातिर तब्बजों ी करते हैं और उनसे सियासी गुफ्तगू ी । शायद इसी गुफ्तगू का नतीजा है कि संसद पर आक्रमण करने वाला अफजल गुरु सारी व्यवस्था पर ठहाके लगा रहा है। इस देश की जनता को यह तय करना है कि राष्ट्र हित में सोहराबुद्दीन का  मरना जरूरी है या हसीना पारकर का ाग जाना ? पूरी न्यायिक प्रक्रिया को अपनाते हुए मौलाना मसूद अजहर को जेल में डालना और वहां से उसे सम्मान पूर्वक कंधार में ले जाकर छोड़ देना राष्ट्र हित में है या फिर इश्रतजहां को मार देना राष्ट्र हित में है । अफजल गुरु को जेल में रखना और इस बात का इंतजार करना कि कल कब किसी का अपहरण हो जाए और अफजल गुरु को ससम्मान छोड़ने के लिए हमारे विदेश मंत्री को पाकिस्तान जाना पड़े राष्ट्र हित में है या फिर मोहम्मद इकबाल को कुपवाड़ा में पुलिस द्वारा ढेर कर दिया जानाराष्ट्रहित में है? पंजाब के पूर्व डी.जी.पी. कंवर पाल सिंह गिल ने ठीक ही कहा है कि आतंकवाद के माध्यम से पाकिस्तान ारत से छù युद्ध कर रहा हैऔर युद्ध के दौरान आईपीसी कारगर नहीं होती । युद्ध में गोली का जवाब गोली से दिया जाता है। यह बात वे ी जानते है जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों का प्रश्न उठाते हुए नहीं थकते। लेकिन वे यह ी बखूबी जानते हैं कि इस युद्ध में वे किसके साथ है? परंतु देश की जनता इतनी मूर्ख नहीं है वह इस खेमे बंदी में प्रत्येक पक्ष को अच्छी तरह पहचान न सके । सोहराबुद्दीन तो एक मोहरा है। इस पूरी लड़ाई में निशाना कहीं और साधा जा रहा है। गुजरात सिंध का पड़ोसी राज्य हैऔर इतिहास गवाह है कि सिंध के राजा दाहिर को मुहम्मद बिन कासिम ने प्रासाद पर फहरा रहे प्रतीक को नष्ट करके पराजित कर दिया था। इस बार ी इस नई लड़ाई में प्रतीक को ही गिराए जाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन ारतीयों को हर हालत में उस प्रतीक को बचाना है क्योंकि पूरी लड़ाई ही प्रतीकों के माध्यम से लड़ी जा रही है।

(हिन्दुस्थान समाचार)

भारत को घेरने का षड़यंत्र:

 डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
गुजरात के दंगों को हुए पाँच साल से ी ज्यादा हो गए हैं और दंगों के घाव धीरे-धीरे रने लगे थे। गुजरात में चर्चा वहां के विकास को लेकर हो रही थी । शायद कुछ अ॰श्य शक्तियों को यह रास नहीं आया। रात के अंधेरे में काले कपड़े पहनकर कैमरा हाथ में लेकर कुछ लोग उन घावों को दोबारा उखाड़ने में लगे हुए हैं, उन शक्तियों के निशाने पर संघ परिवार है । नरेन्द्र मोदी को तो संघ परिवार को अपराधी सिद्ध किए जाने के लिए केवल एक प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। ारत को बांटने के लिए मुसलमान एक सुविधापूर्ण हथियार है और इस देश का दुर्ाग्य ही कहना चाहिए कि मुस्लिम समाज अपने आपको इन अ॰श्य शक्तियों के हाथ हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की इजाजत देता है। अंग्रेजों ने लंबे समय तक इसी हथियार का इस्तेमाल किया और इसी हथियार से ारत को दो फाड़ कर दिया। अब वही शक्तियाँ इसी हथियार को पुनः धारदार बना रही हैं और शायद उसी पुराने उद्देश्य के लिए इसे इस्तेमाल करने की तैयारियाँ हो रही ।

पिछले दिनों एक इलेक्ट्राॅनिक चैनल ने गुजरात दंगों के कुछ पुराने ॰श्य दिखाने शुरू कर दिए और कुछ लोगों के चुने हुए बयान ी प्रसारित करने शुरू कर दिए। शायद इसकी योजना काफी समय पहले से ही बनी होगी। क्योंकि चैनल में ये ॰श्य दिखाई देने के साथ ही देश के कुछ हिस्सों में पूरी तैयारी से मुसलमानों के प्रत्यक्ष प्रदर्शन शुरू हो गए। उसी चैनल ने श्रीनगर हैदराबाद इत्यादि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हुए प्रदर्शनों को इस प्रकार प्रसारित करना शुरू कर दिया मानो सारे देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे ड़क चुके हांे। चैनल के एंकर इस प्रकार की ाषा का प्रयोग कर रहे हैं और उनकी शैली इस प्रकार की है। मानो देश के मुसलमानों को ललकार रहे हों कि ारत में मुसलमानों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं तुम अी तक सोए हुए हो। गलियों में नहीं निकल रहे। दुकानों को आग नहीं लगा रहे। बसों को जला नहीं रहे। और यदि देश में कुछ मुस्लिम बस्तियों में ऐसे प्रदर्शन हो जाते हैं तो चैनल के मुलाजिमों की खुशी देखने लायक होती है। मानो उन्हीं अ॰श्य शक्तियों को रपट दे रहे हो कि सर, दंगा शुरू हो गया।

संघ परिवार को निशाना बनाकर ारत को घेरने की यह कोशिश उसी दिन से शुरू हो गई थी जिस दिन संघ परिवार देश की राजनीति के केन्द्र बिन्दु में आ गया था । अमेरिका की खुफिया ऐजेंसी सी.आई.ए ने तो अपनी वेब साईट पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को बाकायदा हिन्दु उग्रवादी संगठन घोषित कर दिया है । अमेरिका की रणनीति में संघ परिवार को उग्रवादी बताना उसकी ारत को लेकर विषय की राजनीति का स्पष्ट संकेत है । इसी के बाद नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा देने से इन्कार किया गया था। यह केवल वीजा न देने का सामान्य केस नहीं था। बल्कि अमेरिका इसके माध्यम से संघ को उग्रवादी सिद्ध करने के विश्व व्यापी अियान में हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा था। परंतु इन शक्तियों के तमाम प्रयासों के बावजूद नरेन्द्र मोदी की छवि उग्रवादी एवं कट्टरवादी की न बनकर विकास पुरूष के रूप में बन रही थी। नरेन्द्र मोदी की छवि कमोबेश संघ परिवार की छवि से जोड़ कर देखी जाने लगी। एक बार यदि नरेन्द्र मोदी को उग्रवादी सिद्ध करदिया जाता है तो वही निष्कर्ष संघ परिवार पर लादे जा सकते हैं। जब इन शक्तियों की रणनीति असफल होने लगी तो इन शक्तियों की चिंता बढने लगी। नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार की गैर उग्रवादी छवि ारत को अपने शिकंजे में कसने की अमेरिकी रणनीति में सबसे बड़ा रोड़ा सिद्ध हो सकती थी। क्योंकि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को ारतीय राजनीति के केन्द्र में स्थापित करके अमेरिका ने लड़ाई का पहला हिस्सा जीत ही लिया है।

गुजरात विधानसा चुनावों के ऐन पहले एक पत्रकार और इलैक्ट्रानिक चैनल की मिली गत से गुजरात दंगो को स्क्रीन पर पुनः जीवित करने के प्रयासों को इसी पृष्ठ ूमि में देखा जाना चाहिए। क्योंकि यदि रात के अंधेरे में कैमरा लेकर घूमने वाले पत्रकार का उद्धेश्य केवल खोजी पत्रकारिता होतातो उसका सहवागी चैनल इस पूरे घटनाक्रम की आड़ में मोदी, विश्व हिन्दु परिषद, ाजपा और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के खिलाफ एक पक्ष के रूप में आंदोलन न छेड़ता। पत्रकारिता धर्म तथ्य का पता लगाना है न कि आंदोलन चलाना। इसलिए पत्रकार और चैनल दोनों की नीयत पर शंका होती है। जो ी शक्तियां इस पूरी रणनीति के पीछे रही होंगी। उनको शायद आशा होगी। या फिर उनका प्रयास ही होगा कि उनके इस कृत्य से देश र में हिन्दुं मुस्लिम दंगे ड़क उठेगंे और संघ परिवार को उग्रवादी सिद्ध करने में यह घटना क्रम प्रर्याप्त सहायता देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ । परंतु इसका अर्थ यह नहीं लिया जाना चाहिए कि गोरी शक्तियों ने अपनी साम्राज्यवादी मानसिकता त्याग दी है या फिर उन्होंने ारत को घेरने की अपनी साजिश को विराम दे दिया है । उनकी संघ परिवार के खिलाफ आगे की रणनीति का एक संकेत इस पूरे तहलका में स्वंय ही दिखाई दिया था। जब दक्षिणी अफ्रिका की ारतीय मूल की एक महिला एन.पिल्लै जो अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय की न्यायाधीश ी हैं, ने कहना शुरू कर दिया कि नरेन्द्र मोदी और विश्व हिन्दु परिषद से जुड़े दूसरे नेताओं पर अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस प्रकार के न्यायालय किन शक्तियों के मोहरे हैं यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। लेकिन जो लोग पिल्लै की इस मांग पर हिजड़ों की तरह तालियां बजा रहे हैं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि कल अमेरिका से कोई ऐसी मांग ी कर सकता है कि दिल्ली में 1984 में पंजाबियों का कत्ले-आम करने वाले अपराधियों पर ी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए। ध्यान रहे अमेरिका इत्यादि शक्तियां ारत को लातीनी देशों जैसा बनाना रिपब्लिकबना देना चाहती हैं। संघ परिवार को आपराधिक और उग्रवादी सिद्ध करना उनका पहला कदम है और बाद में शासको को प्रत्येक नीति गत निर्णयों के लिए वाशिंगटन की दौड़ लगवाना दूसरा कदम होगा। परंतु देश का दुर्ाग्य है कि शायद दूसरे कदम के लिए देश के शासक पहले ही तैयार हो चुके हैं अन्यथा दिल्ली मंे अमेरिका के राजदूत डेविड मलफोर्ड खुले आम देश के राजनैतिक नेताओं से मिलकर ारत की राजनीति को अमेरिका के पक्ष में मोड़ने के सफल-असफल प्रयास न करते।